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Mahendra Kumar
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Sheikh Shahzad Usmani commented on Mahendra Kumar's blog post धार्मिक पशु (लघुकथा)
"शुक्रिया मेरी टिप्पणी के अनुमोदन और पुनर्विचार कर बढ़िया तनिक बदलाव के लिए आदरणीय महेंद्र कुमार साहिब।"
22 hours ago
Mahendra Kumar commented on Mahendra Kumar's blog post धार्मिक पशु (लघुकथा)
"आदरणीया बबिता जी, मुझे खेद है कि रचना आप तक नहीं पहुँच सकी। लड़का कट्टर नहीं था। रही बात धर्म परिवर्तन की तो उससे मैं इत्तेफ़ाक़ नहीं रखता क्योंकि प्रेम में धर्म परिवर्तन का अर्थ हुआ कि धर्म प्रेम से बड़ा है। इस पर अलग से कभी कुछ लिखूँगा। रचना पर…"
Thursday
Mahendra Kumar commented on Mahendra Kumar's blog post धार्मिक पशु (लघुकथा)
"आदरणीय शेख़ शहज़ाद उस्मानी जी, आपकी समीक्षात्मक टिप्पणी के लिए हृदय से आभारी हूँ। वांछित सुधार कर दिया है। एक बार देख लीजिएगा। बहुत-बहुत धन्यवाद। सादर।"
Thursday
Mahendra Kumar commented on Mahendra Kumar's blog post धार्मिक पशु (लघुकथा)
"सादर आदाब आदरणीय समर कबीर सर। लघुकथा को पसन्द करने के लिए आपका हृदय से आभार। बहुत-बहुत धन्यवाद। सादर।"
Thursday
Mahendra Kumar posted a blog post

धार्मिक पशु (लघुकथा)

उसका सपना था कि दुनिया ख़त्म हो जाए और दुनिया ख़त्म गयी। अब अगर कोई बचा था तो सिर्फ़ वो और उसकी टूटी-फूटी मोहब्बत।"अब तो इसे मुझसे बात करनी ही पड़ेगी।" खण्डहर बन चुके शहर की वीरान सड़क पर खड़े उस शख़्स ने कहा।वह उससे बेपनाह मुहब्बत करता था। वह चाहता था कि वो उसे देखे, उसे समझे, उससे बात करे मगर वो हमेशा ही किसी न किसी और को ढूँढ लेती थी। वह इस बात से हमेशा दुःखी रहता था कि उसे छोड़कर वो बाकी सबसे बात करती है मगर उससे नहीं। उसने कहीं पढ़ा था कि मनुष्य सामाजिक प्राणी है। इसलिए उसने सोचा कि दुनिया अगर ख़त्म…See More
Thursday
babitagupta commented on Mahendra Kumar's blog post धार्मिक पशु (लघुकथा)
"दोनों ही कटटर धार्मिक निकले,अगर मोहब्बत को सर्वोपरि माना था तो लड़के को धर्म परिवर्तन करके ज़िंदा रखके मशाल देनी थी समाज को। बेहतरीन रचना के लिए हार्दिक बधाई स्वीकार कीजियेगा आदरणीय सरजी।"
Wednesday
Sheikh Shahzad Usmani commented on Mahendra Kumar's blog post धार्मिक पशु (लघुकथा)
" उम्दा कथानक और कथ्य के साथ बढ़िया सृजन। हार्दिक बधाई आदरणीय महेंद्र कुमार साहिब। आप बेहतरीन लघुुकथा कहने जा रहे थे।  लेकिन पोस्ट करने से पहले पाठकीय अवलोकन में कहीं कुछ कमी रह गई। आशय यह कि रचना तनिक. संपादन/परिमार्जन/स्पष्टता मांग रही है।…"
Aug 10
Samar kabeer commented on Mahendra Kumar's blog post धार्मिक पशु (लघुकथा)
"जनाब महेन्द्र कुमार जी आदाब, अच्छी लघुकथा हुई है,इस प्रस्तुति पर बधाई स्वीकार करें ।"
Aug 10
Mahendra Kumar commented on Mahendra Kumar's blog post धार्मिक पशु (लघुकथा)
"मुझे नहीं लगता कि रचना कहीं से भी उलझी हुई है। यदि आप बता सकें कि कहाँ पर आपको ऐसा लगा तो शायद मैं उसे स्पष्ट कर सकूँ। अरस्तू ने मनुष्य को सामाजिक प्राणी कहा था। इस रचना में उसका खण्डन करते हुए मैंने उसे धार्मिक पशु कहा है। रचना पर उपस्थित हो कर…"
Aug 10
pratibha pande commented on Mahendra Kumar's blog post धार्मिक पशु (लघुकथा)
"धर्मान्धता  सभ्यता के विनाश का कारक है  शायद ये ही कहना चाह रहे हैं आप इस रचना के माध्यम से। रचना कई जगह उलझ गई है या शायद मै ही नहीं समझ पाई। शीर्षक के लिये विशेष बधाई"
Aug 10
Mahendra Kumar posted a blog post

धार्मिक पशु (लघुकथा)

उसका सपना था कि दुनिया ख़त्म हो जाए और दुनिया ख़त्म गयी। अब अगर कोई बचा था तो सिर्फ़ वो और उसकी टूटी-फूटी मोहब्बत।"अब तो इसे मुझसे बात करनी ही पड़ेगी।" खण्डहर बन चुके शहर की वीरान सड़क पर खड़े उस शख़्स ने कहा।वह उससे बेपनाह मुहब्बत करता था। वह चाहता था कि वो उसे देखे, उसे समझे, उससे बात करे मगर वो हमेशा ही किसी न किसी और को ढूँढ लेती थी। वह इस बात से हमेशा दुःखी रहता था कि उसे छोड़कर वो बाकी सबसे बात करती है मगर उससे नहीं। उसने कहीं पढ़ा था कि मनुष्य सामाजिक प्राणी है। इसलिए उसने सोचा कि दुनिया अगर ख़त्म…See More
Aug 10
सतविन्द्र कुमार राणा commented on Mahendra Kumar's blog post जलियांवाला बाग़ (लघुकथा)
"उत्तम कथा, हार्दिक बधाई"
Aug 6
Mahendra Kumar replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-40 (विषय: दृष्टि)
"रचना पर उपस्थित हो कर अपनी टिप्पणी से उसे मान देने के लिए सभी का बहुत-बहुत शुक्रिया। व्यस्तता के कारण न तो मैं सभी रचनाओं पर उपस्थित हो पा रहा हूँ और न ही अपनी रचनाओं पर आयी टिप्पणियों पर। इस हेतु मैं सभी से क्षमा प्रार्थी हूँ। एक-दो बात में इस रचना…"
Jul 31
Mahendra Kumar replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-40 (विषय: दृष्टि)
"प्लेटो की गुफ़ा प्लेटो की हैरानी का ठिकाना नहीं था। बदन पर चमकदार जीन्स, टी-शर्ट, सर पे उल्टी टोपी, आँखों में रंगीन चश्मा और कानों में हेडफ़ोन! क्या यही उसका सुकरात है? "तुम यहाँ बैठे हो? मैंने तुम्हें कहाँ-कहाँ नहीं ढूँढा।" सुकरात को…"
Jul 31
Mahendra Kumar commented on Sushil Sarna's blog post विषाक्त उजाले :
"बहुत ही उम्दा कविता है आदरणीय सुशील सरना जी। हार्दिक बधाई स्वीकार कीजिए। सादर। "
Jul 2
Mahendra Kumar replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-39 (विषय: समीकरण")
"संक्षिप्त लेकिन उम्दा लघुकथा। हार्दिक बधाई इस उत्कृष्ट प्रस्तुति पर आदरणीया प्रतिभा जी। सादर। "
Jun 30

Profile Information

Gender
Male
City State
Allahabad
Native Place
Fatehpur

Mahendra Kumar's Blog

धार्मिक पशु (लघुकथा)

उसका सपना था कि दुनिया ख़त्म हो जाए और दुनिया ख़त्म गयी। अब अगर कोई बचा था तो सिर्फ़ वो और उसकी टूटी-फूटी मोहब्बत।

"अब तो इसे मुझसे बात करनी ही पड़ेगी।" खण्डहर बन चुके शहर की वीरान सड़क पर खड़े उस शख़्स ने कहा।

वह उससे बेपनाह मुहब्बत करता था। वह चाहता था कि वो उसे देखे, उसे समझे, उससे बात करे मगर वो हमेशा ही किसी न किसी और को ढूँढ लेती थी। वह इस बात से हमेशा दुःखी रहता था कि उसे छोड़कर वो बाकी सबसे बात करती है मगर उससे नहीं। उसने कहीं पढ़ा था कि मनुष्य सामाजिक प्राणी है।…

Continue

Posted on August 10, 2018 at 8:30am — 9 Comments

कवि (अतुकान्त कविता)

संवेदनाओं की पथरीली चोटी पर बैठकर

अपने रिसते हुए घावों को देखता हुआ

ये कौन है

जो कभी कुत्ते की तरह

जीभ से उन्हें चाटता है

तो कभी मुट्ठी में नमक भर कर

उनमें उड़ेल देता है

और फिर एक तपस्वी की तरह

ध्यान लगाकर सुनता है

अपनी आहों और कराहों को?

पत्थरों को उठा कर

अपने लहू में डुबा कर

भावनाओं की लहरों पर बैठे हुए

कौन लिख रहा है उनसे

अपना मृत्यु लेख?

किसी फन्दे पर लटक कर

एक पल में शान्ति से गुज़र जाने की अपेक्षा…

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Posted on June 27, 2018 at 9:03am — 4 Comments

शहीद (लघुकथा)

संसद भवन के बाहर भूख हड़ताल पर बैठे हुए उन युवाओं को दो महीनों से अधिक का समय हो गया था पर न तो किसी अख़बार में इसकी कोई ख़बर थी और न ही न्यूज़ चैनल्स पर चर्चा। 

“इन बेरोज़गार लौंडों के पास अब कोई काम नहीं रह गया है।” बड़ी-बड़ी मूँछों वाले उस स्थानीय बुज़ुर्ग ने अपने पास खड़े अधेड़ से कहा। “कुछ नहीं मिला तो सरकार को ही बदनाम करने में लग गए।”

“कह क्या रहे हैं ये लोग?” अधेड़ ने जिज्ञासा व्यक्त की।

“कह रहे हैं कि जब देश की जनता भूखों मर रही है तो कोई…

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Posted on June 25, 2018 at 4:30pm — 9 Comments

मानव सभ्यता का इतिहास (लघुकथा)

“कितने हसीन थे वो दिन जब पूरे आसमान पर अकेले मेरा राज हुआ करता था।” अपनी पतंग को माँझे से बाँधते हुए छोटा सा वह लड़का अपने सुनहरे अतीत में खो गया। 

अपने मोहल्ले में तब वो अकेले ही पतंग उड़ाने वाला हुआ करता था। न तो उसे कोई रोकने वाला था और न ही टोकने वाला। वह पूरी तरह से स्वतंत्र था। उस वक़्त उसकी बस एक ही हसरत होती, “एक दिन अपनी पतंग चाँद तक ले जाऊँगा।”

मगर यह ज़्यादा दिन चला नहीं। धीरे-धीरे उसके मोहल्ले में दूसरे पतंगबाज़ भी आने लगे। उनके आते ही आसमान में…

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Posted on June 22, 2018 at 5:37pm — 8 Comments

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