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Mahendra Kumar
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Mahendra Kumar commented on Mahendra Kumar's blog post ग़ज़ल : कैसे बनता है कोई शख़्स तमाशा देखो
"हृदय से आभारी हूँ आदरणीय तेज वीर सिंह जी. बहुत-बहुत शुक्रिया. सादर."
6 hours ago
Mahendra Kumar commented on Mahendra Kumar's blog post ग़ज़ल : अशआर मेरे जिनको सुनाने के लिए हैं
"लिखना सार्थक रहा आदरणीय अजय जी. बहुत-बहुत शुक्रिया. हार्दिक आभार. सादर."
6 hours ago
Mahendra Kumar commented on Mahendra Kumar's blog post ग़ज़ल : अशआर मेरे जिनको सुनाने के लिए हैं
"बहुत-बहुत शुक्रिया आदरणीय तेज वीर सिंह जी. हृदय से आभारी हूँ. सादर."
6 hours ago
Mahendra Kumar commented on Mahendra Kumar's blog post ग़ज़ल : अशआर मेरे जिनको सुनाने के लिए हैं
"सादर आदाब आदरणीय समर कबीर सर. इस प्रयास की सराहना के लिए हृदय से आभारी हूँ. यदि आप यह भी इंगित कर देते कि किन अशआर में रवानी की कमी महसूस हो रही तो बड़ी कृपा होती. आपका बहुत-बहुत शुक्रिया. सादर."
6 hours ago
Mahendra Kumar commented on Tasdiq Ahmed Khan's blog post ग़ज़ल (दिल ने जिसे बना लिया गुलफाम दोस्तो)
"लाए हैं अंजुमन में किसी अजनबी को वहदिल में न यूँ उठा मेरे कुहराम दोस्तो l ...वाह!  बहुत ख़ूबसूरत ग़ज़ल हुई है आदरणीय तस्दीक़ जी. हार्दिक बधाई स्वीकार कीजिए. तीसरे शेर में तकाबुल-ए-रदीफ़ है. देख लीजिएगा. सादर."
6 hours ago
Mahendra Kumar commented on Naveen Mani Tripathi's blog post ग़ज़ल
"बढ़िया ग़ज़ल हुई है आदरणीय नवीन जी. हार्दिक बधाई स्वीकार कीजिए.  1. //दिया था जो वसीयत में तुम्हें वो ।     अभी तक वह खज़ाना चल रहा है ।।// इस शेर के ऊला में "वो" और सानी में "वह" आपस में टकराने के कारण खटक रहे…"
6 hours ago
Mahendra Kumar commented on Samar kabeer's blog post 'वतन को आग लगाने की चाल किसकी है'
"खड़े हुए हैं सर-ए-राह आइना लेकर हमारे सामने आए मजाल किसकी है ....वाह! ग़ज़ब का शेर! इस शानदार ग़ज़ल के शेर दर शेर दाद के साथ ढेर सारी बधाई क़ुबूल कीजिए सर. सादर."
7 hours ago
Mahendra Kumar commented on Maheshwari Kaneri's blog post मातृ भूमि के लिए ..
"बढ़िया लगी आपकी रचना आदरणीया माहेश्वरी कनेरी जी. हार्दिक बधाई स्वीकार कीजिए.  कुछ टंकण त्रुटियाँ हैं : 1. //पावन मातृ भूमि ये, वीरों और शहीदों की// 2. //ये बेमिसाल देश है संस्कृति भी विशेष है// देख लीजिएगा. सादर."
7 hours ago
Mahendra Kumar commented on सुरेन्द्र नाथ सिंह 'कुशक्षत्रप''s blog post जागो उठो हे लाल तुम (मधुमालती छंद)
"बहुत ख़ूब रचना हुई है आदरणीय सुरेन्द्र जी. हार्दिक बधाई स्वीकार कीजिए. सादर."
7 hours ago
Ajay Tiwari commented on Mahendra Kumar's blog post ग़ज़ल : अशआर मेरे जिनको सुनाने के लिए हैं
"आदरणीय महेंद्र जी, जाँ निसार अख़्तर की ज़मीन में ख़ूबसूरत अशआर हुए हैं. हार्दिक बधाई. "
9 hours ago
TEJ VEER SINGH commented on Mahendra Kumar's blog post ग़ज़ल : कैसे बनता है कोई शख़्स तमाशा देखो
"हार्दिक बधाई आदरणीय महेंद्र कुमार जी। बेहतरीन गज़ल । लोग जितना ही सुधरने को हमें कहते थे हमने उतना ही यहाँ ख़ुद को बिगाड़ा देखो मैंने भी छोड़ दिया ख़ुद को तो अब दुख कैसा तुमने चाहा ही यही था मुझे तन्हा देखो"
yesterday
TEJ VEER SINGH commented on Mahendra Kumar's blog post ग़ज़ल : अशआर मेरे जिनको सुनाने के लिए हैं
"हार्दिक बधाई आदरणीय महेंद्र कुमार जी।बेहतरीन गज़ल। जी करता है दुनिया को जला दूँ मैं इन्हीं से ये दीप जो मन्दिर में जलाने के लिए हैं"
yesterday
Samar kabeer commented on Mahendra Kumar's blog post ग़ज़ल : अशआर मेरे जिनको सुनाने के लिए हैं
"जनाब महेन्द्र कुमार जी आदाब,ग़ज़ल का प्रयास अच्छा है,बधाई स्वीकार करें । कुछ अशआर में रवानी की कमी महसूस हो रही है ।"
yesterday
Mahendra Kumar posted blog posts
yesterday
Mahendra Kumar commented on Nilesh Shevgaonkar's blog post ग़ज़ल नूर की- सँभाले थे तूफ़ाँ उमड़ते हुए
"ख़ूबसूरत ग़ज़ल है आदरणीय नीलेश जी। हार्दिक बधाई स्वीकार कीजिए। सादर।"
yesterday
Mahendra Kumar commented on विनय कुमार's blog post अपनों का दर्द- लघुकथा
"अच्छी व्यंग्यात्मक लघुकथा कही है आपने आदरणीय विनय कुमार जी। हार्दिक बधाई स्वीकार कीजिए। सादर।"
yesterday

Profile Information

Gender
Male
City State
Allahabad
Native Place
Fatehpur

Mahendra Kumar's Blog

ग़ज़ल : अशआर मेरे जिनको सुनाने के लिए हैं

बह्र : 221 1221 1221 122

अशआर मेरे जिनको सुनाने के लिए हैं

वो लोग किसी और ज़माने के लिए हैं

कुछ लोग हैं जो आग बुझाते हैं अभी तक

बाकी तो यहाँ आग लगाने के लिए हैं

यूँ आस भरी नज़रों से देखो न हमें तुम

हम लोग फ़क़त शोर मचाने के लिए हैं

हर शख़्स यहाँ रखता है अपनों से ही मतलब

जो ग़ैर हैं वो रस्म निभाने के लिए हैं

अब क्या किसी से दिल को लगाएँगे भला हम

जब आप मेरे दिल को दुखाने के लिए…

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Posted on January 16, 2019 at 4:00pm — 6 Comments

ग़ज़ल : कैसे बनता है कोई शख़्स तमाशा देखो

बह्र : 2122 1122 1122 22

कैसे बनता है कोई शख़्स तमाशा देखो

आओ बैठो यहाँ पे हश्र हमारा देखो

कैसे हिन्दू को किया दफ़्न वहाँ लोगों ने

एक मुस्लिम को यहाँ कैसे जलाया देखो

जिस तरह लूटा था दिल्ली को कभी नादिर ने

उसने लूटा है मेरे दिल का ख़ज़ाना देखो

आदमी वो नहीं होता जो दिखा करता है

जो नहीं दिखता हो जैसा उसे वैसा देखो

नूर से जल के, फ़लक से कोई साज़िश करके

चाँद को कैसे सितारों…

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Posted on January 13, 2019 at 7:30pm — 16 Comments

ग़ज़ल : वो ज़हर का प्याला है, उठाना ही नहीं था

बह्र : 221   1221   1221   122

वो ज़हर का प्याला है, उठाना ही नहीं था

दुनिया की तरफ़ आपको जाना ही नहीं था

कानों में यहाँ रूई सभी बैठे हैं रख के

ऐसे में तुम्हें शोर मचाना ही नहीं था

खेतों में लहू देख के करते हो शिकायत

हथियार ज़मीनों में उगाना ही नहीं था

ये कौन जगह है कि जहाँ होश में सब हैं

हम रिन्द हैं हमको यहाँ लाना ही नहीं था

ताउम्र उसी शहर में ही भटका किया मैं

रहने को जहाँ कोई ठिकाना ही नहीं…

Continue

Posted on January 4, 2019 at 8:00pm — 12 Comments

ग़ज़ल : रात भर मुझको नचाती, जानते हो?

बह्र : 2122 2122 2122

याद आ आ कर तुम्हारी, जानते हो?

रात भर मुझको नचाती, जानते हो?

 

प्यार करने वाला होता है जमूरा

इश्क़ होता है मदारी, जानते हो?

 

शाइरी में चाँद को कहते हैं सूरज

आग को कहते हैं पानी, जानते हो?

 

हर किसी को मैं समझ लेता हूँ अपना

मुझ में है ये ही ख़राबी, जानते हो?

 

बन्द कमरे की तरह अब हो गया हूँ

मुझमें दरवाज़ा न खिड़की,…

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Posted on January 1, 2019 at 2:30pm — 10 Comments

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"आ. ऊषा जी, अच्छी रचना हुयी है । हार्दिक बधाई ।"
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लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' commented on राज़ नवादवी's blog post राज़ नवादवी: एक अंजान शायर का कलाम- ९१
"आ. भाई राजनवादवी जी, अच्छी गजल हुयी है। हार्दिक बधाई ।"
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