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Mahendra Kumar
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Mahendra Kumar replied to Admin's discussion खुशियाँ और गम, ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार के संग...
"वो चाँद मेरा आता है बस ईद के ही दिन दुनिया के जिसने सीख लिए हैं चलन तमाम ईद के मुक़द्दस अवसर आपको और पूरे ओबीओ परिवार को दिली मुबारकबाद."
10 hours ago
Mahendra Kumar replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-84
"आ. समर कबीर सर, सादर आदाब। आपकी ग़ज़ल मुशायरे में देख कर कितनी ख़ुशी हुई, शब्दों में बयाँ नहीं कर सकता। ग़ज़ल भले ही फिलबदीह हो मगर शेर एक से बढ़कर एक हैं। इस ख़ूबसूरत ग़ज़ल के लिए हार्दिक बधाई स्वीकार कीजिए। ईद की अग्रिम शुभकामनाएँ। सादर।"
yesterday
Mahendra Kumar replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-84
"आपकी मुक्तकण्ठ प्रशंसा का हृदय से आभारी हूँ आदरणीय मोहम्मद आरिफ़ जी। बहुत-बहुत धन्यवाद। सादर।"
yesterday
Mahendra Kumar replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-84
"जी आदरणीय तस्दीक़ जी। मैं देखता हूँ क्या हो सकता है। आपका बहुत-बहुत आभार। सादर।"
yesterday
Mahendra Kumar replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-84
"आपका हार्दिक आभार आ. राजेश मैम. बहुत-बहुत धन्यवाद. सादर."
Saturday
Mahendra Kumar replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-84
"बहुत-बहुत धन्यवाद आ. दिनेश जी. मैं नहीं समझ पा रहा हूँ कि इसमें कैसे शुतुरगुरबा का दोष आ रहा. आपका हार्दिक आभार सादर."
Saturday
Mahendra Kumar replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-84
"हार्दिक आभार आ. लक्ष्मण जी. बहुत-बहुत धन्यवाद. सादर."
Saturday
Mahendra Kumar replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-84
"आ. तस्दीक़ जी, मेरा उत्साह बढ़ाने और इस्लाह देने का बहुत-बहुत शुक्रिया. शेर 8 के उल मिसरे की तक़्तीअ इस प्रकार है: दुनि या के रं ग मं च पे अभि नय दि खा ना था   2   2  1  2 1 2  1 1    2    2   1  …"
Saturday
Mahendra Kumar replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-84
"आ. मजाज़ सुल्तानपुरी जी, बहुत ही शानदार ग़ज़ल से मंच को नवाज़ा है आपने. हर शेर लाजवाब है. दिल से ढेर सारी मुबारक़बाद क़ुबूल कीजिए. सादर."
Saturday
Mahendra Kumar replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-84
"बढ़िया ग़ज़ल है आ. अमित जी. हार्दिक बधाई स्वीकार कीजिए. सादर."
Saturday
Mahendra Kumar replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-84
"लम्बे सफ़र की रात में दुनिया सराय है, हम भी यहाँ पे रात बिता कर चले गये ...वाह! बहुत ख़ूब ग़ज़ल कही है आपने आ. निलेश सर. हार्दिक बधाई प्रेषित है. सादर."
Saturday
Mahendra Kumar replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-84
"वाह! वाह!! क्या ख़ूब मज़ाहिया ग़ज़ल कही है आपने आ. राजेश मैम. ढेर सारी बधाई स्वीकार कीजिए. सादर."
Saturday
Mahendra Kumar replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-84
"बढ़िया ग़ज़ल है आ. राम अवध जी. हार्दिक बधाई स्वीकार कीजिए. //लत्ता को लोग साँप बनाकर चले गये।// क्या यहाँ "लत्ते" होना चाहिए? देख लीजिएगा. सादर."
Saturday
Mahendra Kumar replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-84
"माफ़ कीजिएगा आ. लक्ष्मण जी. मैंने छठवें शेर की जगह चौथा शेर लिख दिया था. आपके चौथे शेर का उला पूरी तरह से बह्र में है. मेरे हिसाब से छठवें शेर के उले की तक़्तीअ इस प्रकार होगी : चर् चा है हर त रफ कि (?) बे ढ़ब अ जब थे वो  2   2 1  2…"
Saturday
Mahendra Kumar replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-84
"हम यूँ चराग़-ए-इश्क़ जला कर चले गए लौ आँधियों के पास बिठा कर चले गए मेले से हाथ ख़ाली उठा कर चले गएहम लोग वक़्त यूँ ही बिता कर चले गए तूफ़ाँ से लाए थे कभी कश्ती निकाल कर साहिल पे आज उसको डुबा कर चले गए मेरी तरह ही ढूँढते फिरते थे इश्क़ कोमेरी तरह ही…"
Saturday
Mahendra Kumar replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-84
"अपनी रवायतों को निभा कर चले गए / फिर से पुराने दर्द रुला कर चले गए ...वाह! बढ़िया ग़ज़ल है आ. अजय जी. हार्दिक बधाई स्वीकार कीजिए. आ. तस्दीक़ जी की बात पे ध्यान दीजिएगा. सादर."
Saturday

Profile Information

Gender
Male
City State
Allahabad
Native Place
Fatehpur

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दायरा

"तेरे पिता उस संगठन से जुड़े हैं जो इन्हें देखना तक नहीं चाहता और तू कहता है कि इससे कोई फ़र्क नहीं पड़ता?" कार्तिक आज भी उसी रेस्टोरेंट में बैठा था जहाँ सुमित ने कभी उससे ये बातें कही थीं। उसके हाथ में परवीन शाकिर की किताब थी तो ज़ेहन में ये ग़ज़ल, तुझसे कोई गिला नहीं है, क़िस्मत में मेरी सिला नहीं है।

"क्या ख़ूब ग़ज़ल सुनाई तुमने। किसकी है?" न्यू ईयर की पार्टी में लोगों ने ज़ोया से पूछा जिसने अभी हाल ही में ऑफिस ज्वाइन किया था।

"परवीन शाकिर की।" यह पहली बार था…

Continue

Posted on June 8, 2017 at 10:30am

एक महान जासूसी लेखक

करार के अनुसार उसने उस महान जासूसी लेखक की चाकू से गोद कर हत्या की और तेजी से घर के बाहर निकल गया।



आज से कुछ दिन पहले हत्यारे के घर में। "तुम अपनी ही हत्या क्यों करवाना चाहते हो? तुम पागल तो नहीं हो?" हत्यारे ने चौंकते हुए कहा।



"नहीं। मैं एक महान जासूसी लेखक हूँ।" उस आदमी ने अपना परिचय दिया।



"पर अपनी हत्या क्यों?" उसने उत्सुकता ज़ाहिर की।



"क्योंकि मैं चाहता हूँ कि लोग मेरी कहानियों की क़द्र करें। मैंने उन्हें रहस्य से भरी हुई अद्भुत और शानदार कहानियाँ… Continue

Posted on April 9, 2017 at 10:05am — 6 Comments

एक ख़तरनाक आतंकवादी

ढूँढो किसी मुफ़लिस को

ग़ुमनाम तंग गलियों से

और फिर मुफ़ीद जगह पर

कर दो एनकाउण्टर

मगर आहिस्ते से

इतने आहिस्ते

कि चल सके पूरे दिन

दहशत का लाइव शो

इस बात को ध्यान में रखते हुए

कि उसे करना है घोषित

भोर की पहली किरण से ही

एक ख़तरनाक आतंकवादी

और फिर रख देना है

उसकी लाश के पास

एक झण्डा

कुछ किताबें

नक़्शे और नोट

व थोड़े से हथियार

जिससे ये डर पुख़्ता होकर

बदल जाए मज़हबी वोटों में

और बना दे अपनी… Continue

Posted on March 8, 2017 at 8:30pm — 14 Comments

मेरे प्यारे-प्यारे वैज्ञानिकों

सीलन भरी छत पर बैठकर

चाँद की ख़ूबसूरती को निहारने वाले

मेरे प्यारे-प्यारे वैज्ञानिकों

यदि संभव हो

तो अगली बार

भूख़, ग़रीबी, शोषण

और अत्याचार के साथ

इस नफ़रत भरी

विषैली बेल को भी

अपने उपग्रहों में लपेट कर

इस पृथ्वी से दूर

बहुत दूर

सुदूर अन्तरिक्ष में

छोड़ देना तुम

जहाँ से फिर कभी लौटना

संभव न हो

और हाँ

अगर तुम्हारे यान में

थोड़ी सी जगह और बचे

तो बिठा लेना मुझे भी

और फेंक देना रास्ते में

जहाँ कहीं… Continue

Posted on February 19, 2017 at 11:30am — 23 Comments

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