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Mahendra Kumar's Blog (22)

मृत्यु : पूर्व और पश्चात्

मृत्यु...

जीवन का वह सत्य

जो सदियों से अटल है

शिला से कहीं अधिक।

मृत्यु पूर्व...

मनुष्य बद होता है

बदनाम होता है

बुरी लगती हैं उसकी बातें

बुरा उसका व्यवहार होता है।

मृत्यु पूर्व...

जीवन होता है

शायद जीवन

नारकीय

यातनीय

उलाहनीय

अवहेलनीय।

मृत्यु पूर्व...

मनुष्य, मनुष्य नहीं होता

हैवान होता है

हैवान, जो हैवानियत की सारी हदें

पार कर देना चाहता…

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Added by Mahendra Kumar on October 22, 2017 at 9:33am — 17 Comments

ग़ज़ल - वक़्त कुछ ऐसा मेरे साथ गुज़ारा उसने

बह्र : 2122-1122-1122-112/22

फिर मुहब्बत से लिया नाम तुम्हारा उसने

वार मुझ पर है किया कितना करारा उसने

मेरी कश्ती को समन्दर में उतारा उसने

और फिर कर दिया तूफ़ाँ को इशारा उसने

डूबते वक़्त दी आवाज़ बहुत मैंने मगर

बैठ कर दूर से देखा था नज़ारा उसने

आप कहते थे इसे बख़्श दो, देखो ख़ुद ही

मुझ में ख़ंजर ये उतारा है दुबारा उसने

ग़ैर भी कोई गुज़ारे न किसी ग़ैर के साथ 

वक़्त…

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Added by Mahendra Kumar on September 26, 2017 at 10:00am — 30 Comments

ग़ज़ल - वफ़ाओं के बदले वफ़ा चाहता हूँ

बह्र : 122 122 122 122



वफ़ाओं के बदले वफ़ा चाहता हूँ

सभी की तरह मैं ये क्या चाहता हूँ



दिवानों का मुझ पर असर हो गया है

ख़ता तो नहीं की सज़ा चाहता हूँ



ख़ुदा ही सही पर हटो सामने से

मैं थोड़ी सी ताज़ा हवा चाहता हूँ



वही बस वही बस वही चाहिए बस

नहीं कुछ भी उसके सिवा चाहता हूँ



यहाँ है, वहाँ है, कहाँ है मुहब्बत

बताओ मैं उसका पता चाहता हूँ



वो कैसा था ये जानने के लिए ही

वो कैसा है ये जानना चाहता हूँ



ज़माने… Continue

Added by Mahendra Kumar on September 12, 2017 at 6:34pm — 30 Comments

ग़ज़ल - ढोते फिरेंगे आप मुहब्बत कहाँ कहाँ

बह्र : 221/2121/1221/212



इस दोस्ती के बीच तिजारत कहाँ कहाँ

तुमने लगायी है मेरी कीमत कहाँ कहाँ



तुम मुझ से कह रहे हो कि मैं होश में रहूँ

नासेह दे रहे हो नसीहत कहाँ कहाँ



सब कुछ हमें ख़बर है नुमाइश के दौर में

करता है कौन कितनी सियासत कहाँ कहाँ



हैं आप जो ख़ुदा तो मुझे पूछना है ये

पहुँची है मुफ़लिसों की इबादत कहाँ कहाँ



गंगा में ले के जाइए और फेंक आइए

ढोते फिरेंगे आप मुहब्बत कहाँ कहाँ



तुम पूछ तो रहे हो मगर क्या… Continue

Added by Mahendra Kumar on September 3, 2017 at 12:39pm — 6 Comments

दायरा

"तेरे पिता उस संगठन से जुड़े हैं जो इन्हें देखना तक नहीं चाहता और तू कहता है कि इससे कोई फ़र्क नहीं पड़ता?" कार्तिक आज भी उसी रेस्टोरेंट में बैठा था जहाँ सुमित ने कभी उससे ये बातें कही थीं। उसके हाथ में परवीन शाकिर की किताब थी तो ज़ेहन में ये ग़ज़ल, तुझसे कोई गिला नहीं है, क़िस्मत में मेरी सिला नहीं है।

"क्या ख़ूब ग़ज़ल सुनाई तुमने। किसकी है?" न्यू ईयर की पार्टी में लोगों ने ज़ोया से पूछा जिसने अभी हाल ही में ऑफिस ज्वाइन किया था।

"परवीन शाकिर की।" यह पहली बार था…

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Added by Mahendra Kumar on June 8, 2017 at 10:30am — 8 Comments

एक महान जासूसी लेखक

करार के अनुसार उसने उस महान जासूसी लेखक की चाकू से गोद कर हत्या की और तेजी से घर के बाहर निकल गया।



आज से कुछ दिन पहले हत्यारे के घर में। "तुम अपनी ही हत्या क्यों करवाना चाहते हो? तुम पागल तो नहीं हो?" हत्यारे ने चौंकते हुए कहा।



"नहीं। मैं एक महान जासूसी लेखक हूँ।" उस आदमी ने अपना परिचय दिया।



"पर अपनी हत्या क्यों?" उसने उत्सुकता ज़ाहिर की।



"क्योंकि मैं चाहता हूँ कि लोग मेरी कहानियों की क़द्र करें। मैंने उन्हें रहस्य से भरी हुई अद्भुत और शानदार कहानियाँ… Continue

Added by Mahendra Kumar on April 9, 2017 at 10:05am — 6 Comments

एक ख़तरनाक आतंकवादी

ढूँढो किसी मुफ़लिस को

ग़ुमनाम तंग गलियों से

और फिर मुफ़ीद जगह पर

कर दो एनकाउण्टर

मगर आहिस्ते से

इतने आहिस्ते

कि चल सके पूरे दिन

दहशत का लाइव शो

इस बात को ध्यान में रखते हुए

कि उसे करना है घोषित

भोर की पहली किरण से ही

एक ख़तरनाक आतंकवादी

और फिर रख देना है

उसकी लाश के पास

एक झण्डा

कुछ किताबें

नक़्शे और नोट

व थोड़े से हथियार

जिससे ये डर पुख़्ता होकर

बदल जाए मज़हबी वोटों में

और बना दे अपनी… Continue

Added by Mahendra Kumar on March 8, 2017 at 8:30pm — 14 Comments

मेरे प्यारे-प्यारे वैज्ञानिकों

सीलन भरी छत पर बैठकर

चाँद की ख़ूबसूरती को निहारने वाले

मेरे प्यारे-प्यारे वैज्ञानिकों

यदि संभव हो

तो अगली बार

भूख़, ग़रीबी, शोषण

और अत्याचार के साथ

इस नफ़रत भरी

विषैली बेल को भी

अपने उपग्रहों में लपेट कर

इस पृथ्वी से दूर

बहुत दूर

सुदूर अन्तरिक्ष में

छोड़ देना तुम

जहाँ से फिर कभी लौटना

संभव न हो

और हाँ

अगर तुम्हारे यान में

थोड़ी सी जगह और बचे

तो बिठा लेना मुझे भी

और फेंक देना रास्ते में

जहाँ कहीं… Continue

Added by Mahendra Kumar on February 19, 2017 at 11:30am — 23 Comments

पहली भेड़

वो देखो

जा रहा है भेड़ों का झुण्ड

फटी हुई धोती को पहने

और नंगे पाँव

उस एक भेड़ के पीछे

जो है झुण्ड में

सबसे आगे

मगर

क्या वह पहली भेड़

असली है?

अगर तुम्हें याद हो

तो पिछले चुनाव में

अन्तिम नतीजे आते ही

जीत गया था मीडिया

उस पार्टी की जीत के साथ ही

जिसे अपने जनमत सर्वेक्षणों में

दिखाया था उसने

सबसे पीछे होने के बावजूद भी

सबसे आगे

यही वो पहली भेड़ थी

जिसके पीछे चलते हुए तुम

गिर गए थे खाई में

हर… Continue

Added by Mahendra Kumar on January 6, 2017 at 3:30pm — 7 Comments

आख़िरी चाँद

सीनियर अफसर के साथ हुई बातचीत अभी भी उसके कॉकपिट में गूँज रही थी। "तुम्हें बम उन पहाड़ियों के बीच स्थित दुश्मन के अड्डे पर गिराना है।"



और देशवासियों की भी। "उन पापियों का नामोनिशान मिटा दो!"



अजय बचपन से ही वायुसैनिक बनना चाहता था और इलिशा एक शिक्षिका। साथ पढ़ते-पढ़ते दोनों कब एक दूसरे के प्यार में डूब गए उन्हें पता ही नहीं चला। "तुम हमेशा मुझे ऐसे ही चाहोगे?"



"हाँ।" अजय ने इलिशा को गले लगाते हुए कहा।



पर होनी को कुछ और ही मंज़ूर था। इलिशा अपने घर वालों के… Continue

Added by Mahendra Kumar on January 2, 2017 at 7:00pm — 19 Comments

मैं भुला देना चाहता हूँ

मैं भुला देना चाहता हूँ

झिलमिल सितारों को

झूमती बहारों को

सावन के झूलों को

महकते हुए फूलों को

मौसमी वादों को

पक्के इरादों को

नर्म एहसासों को

बहके जज़्बातों को

सोंधी सी ख़ुशबू को

कोयल की कू को

नाचते हुए मोर को

नदियों के शोर को

चाँदनी रातों को

मीठी-मीठी…

Continue

Added by Mahendra Kumar on December 28, 2016 at 1:30pm — 10 Comments

नया साल

आएगा नया साल

खिलेंगे नये फूल

उगेगा नया सूरज

फैलेगी नयी रौशनी

छंटेगा अँधेरा

सजेगी महफ़िल

गायेंगी वादियाँ

बजेंगी चूड़ियाँ

झूमेगा आसमाँ

नाचेगी धरती

उड़ेगा आँचल

हँसेगा बादल

सच होंगे सपने

मिलेंगी ख़ुशियाँ

मुड़ेंगी राहें

आएगी मंज़िल

मगर...

सिर्फ औरों के लिए

मेरे लिए

तो अब भी वही साल है

कई सालों बाद भी

सड़न और सीलन से युक्त

दुर्गन्ध से भरा हुआ

तड़पता

उदास

बीमार

और बोझिल…

Continue

Added by Mahendra Kumar on December 26, 2016 at 9:00pm — 6 Comments

सैंटा क्लॉज़ (अतुकान्त कविता)

टाँग देना दरवाज़े पर अपने मोज़े

रख देना खिड़कियों पे चमका कर जूते

और फिर

सो जाना जल्दी

अच्छे बच्चों की तरह

क्योंकि

आने वाला है सैंटा क्लॉज़

ले कर अपने झोले में

ढेर सारे गिफ्ट्स

जैसे...

रोटिनुमा केक

शिक्षारूपी कैण्डी

टॉफ़ी का घर

चिकित्सा की चॉकलेट

रोज़गार का बिस्कुट

सुरक्षा, सम्मान व न्याय के

रंग-बिरंगे खिलौने

ख़ुशियों की टोपी

और अच्छे दिनों का

झुनझुना

तुम्हारे मोज़ों और जूतों में

भरने के… Continue

Added by Mahendra Kumar on December 21, 2016 at 10:30am — 10 Comments

आदमी (अतुकान्त कविता)

गौर से देखो...
यह खाता है
पीता है
चलता है
फिरता है
उठता है
गिरता है
हँसता है
रोता है
देखता है
सुनता है
बोलता है
सोचता है
इसके पास
हाथ है
पैर है
दिल है
जिगर है
गुर्दा है
आँख है
नाक है
कान है
जीभ है
त्वचा है
और साथ ही
वह सब है
जो होना चाहिए
मगर फिर भी
यह आदमी नहीं है
क्योंकि
आदमी वह है
जो दो मुँहा हो!

(मौलिक व अप्रकाशित)

Added by Mahendra Kumar on December 18, 2016 at 8:31am — 8 Comments

चौथा बन्दर

एक चौथा बन्दर भी है

जिसने हटवा दिए हैं हाथ

उन तीनों बन्दरों के

आँख, कान और मुँह से

अब

वो सुन सकते हैं

बोल सकते हैं

देख सकते हैं

वह सब

जो चौथा बन्दर

सुनता है

बोलता है

देखता है

साथ ही

तीनों बन्दर

लगे हैं अपने जैसे

और भी बन्दर बनाने में

जो वही सुनें

वही बोलें

वही देखें

जो चौथा बन्दर

चाहता है

और जब

कोई बन्दर

कर देता है इंकार

उन तीनों जैसा

बनने से

तो वो तीनों… Continue

Added by Mahendra Kumar on December 6, 2016 at 3:52pm — 18 Comments

लोकतंत्र

लोकतंत्र में
लोक नहीं होता
होता है
तो सिर्फ तंत्र
जो करता है शासन
पूँजीपतियों के लिए
नेताओं के द्वारा
नौकरशाहों से मिल
मीडिया के साथ
जनता के नाम से
जनता के ऊपर
न्याय
स्वतंत्रता
समता
और व्यक्ति की
गरिमा का
चेहरा लगा कर
लोकतंत्र में
लोक नहीं होता
होता है
तो सिर्फ तंत्र!

(मौलिक व अप्रकाशित)

Added by Mahendra Kumar on December 3, 2016 at 7:00pm — 12 Comments

हो गया हूँ बुरा

करता रहा समझौता
सहता रहा चुपचाप सब
जब तक मैं
तब तक
अच्छा था सबकी
नज़रों में बहुत
हाँ, तुम्हारी भी तो
पर आज जब मैंने सच बोला
बोल दिया झूठ को झूठ
तो हो गया हूँ बुरा
सबसे बुरा
गिर गया हूँ गहरे
कहीं बहुत गहरे
सबकी नज़रों से
और हाँ, तुम्हारी भी तो!

(मौलिक व अप्रकाशित)

Added by Mahendra Kumar on December 1, 2016 at 1:30pm — 10 Comments

ग़ज़ल - दिन ढलते ही रात को आते देख रहा हूँ

बह्र : मात्रिक



दिन ढलते ही रात को आते देख रहा हूँ

शहर से तुम को अपने जाते देख रहा हूँ



धीरे धीरे दिल ये मेरा डूब रहा है

दूर कहीं क़श्ती को जाते देख रहा हूँ



साहिल से मौजों का मिलना जाने कब हो

लहरों से लहरें टकराते देख रहा हूँ



शायद देखो मुड़ के मुझको जाते लेकिन

मायूसी आँखों में छाते देख रहा हूँ



देख रहा हूँ गुमसुम गुमसुम बैठे तुम को

तुम को ही आवाज़ लगाते देख रहा हूँ



चुपके चुपके बैठे बैठे अश्क़ बहाते

दिलवालों… Continue

Added by Mahendra Kumar on July 10, 2016 at 3:30pm — 10 Comments

पर्पल डार्कनेस (लघुकथा)

"थू... थू... थू..."



सूरज, जो अब तक लगातार गुस्से से चुकन्दर को ऐसे खाये जा रहा था जैसे कि उससे उसकी कोई पुरानी दुश्मनी हो, ने उसे ग़ौर से देखा और फिर थूकते हुए अपने हाथों से दूर फेंक दिया। इसके बाद उसने आलमारी से एक पुरानी शर्ट निकाली, उसे पहना और फिर आईने के सामने खड़ा हो गया। थोड़ी देर बाद उसने शर्ट को उतारा और गुस्से से उसे ज़मीन पे फेंक दिया। फिर मेज से बोतल उठायी और पूरी शराब शर्ट के ऊपर उड़ेल दी। माचिस लगते ही एक अजीब-सा अँधेरा पूरे कमरे में फैलने लगा...



आज से दो साल पहले… Continue

Added by Mahendra Kumar on July 6, 2016 at 11:00am — 10 Comments

ग़ज़ल - मुहब्बत करने वाला क्यूँ कभी तनहा नहीं मिलता

मफ़ाईलुन/मफ़ाईलुन/मफ़ाईलुन/मफ़ाईलुन

किसी को भी यहाँ पे क्यूँ कोई अपना नहीं मिलता

तुम्हें तुम सा नहीं मिलता, हमें हम सा नहीं मिलता

ज़माना घूम के बैठे, दुआएँ कर के भी देखीं

हमें तो यार कोई भी कहीं तुम सा नहीं मिलता

ज़मीनें एक थीं फिर भी लकीरें खींच दीं हमने

सभी से इसलिए भी दिल यहाँ सबका नहीं मिलता

वहाँ पे बैठ के साहब लिखे तक़दीर वो सबकी

लिखावट एक जैसी है तो क्यूँ लिक्खा नहीं…

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Added by Mahendra Kumar on July 2, 2016 at 7:30am — 7 Comments

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