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ग़ज़ल : कैसे बनता है कोई शख़्स तमाशा देखो

बह्र : 2122 1122 1122 22

कैसे बनता है कोई शख़्स तमाशा देखो

आओ बैठो यहाँ पे हश्र हमारा देखो

कैसे हिन्दू को किया दफ़्न वहाँ लोगों ने

एक मुस्लिम को यहाँ कैसे जलाया देखो

जिस तरह लूटा था दिल्ली को कभी नादिर ने

उसने लूटा है मेरे दिल का ख़ज़ाना देखो

आदमी वो नहीं होता जो दिखा करता है

जो नहीं दिखता हो जैसा उसे वैसा देखो

नूर से जल के, फ़लक से कोई साज़िश करके

चाँद को कैसे सितारों ने निकाला देखो

इक जहन्नम के सिवा और भला है भी क्या

मैं कहूँगा न किसी से कि ये दुनिया देखो

लोग जितना ही सुधरने को हमें कहते थे

हमने उतना ही यहाँ ख़ुद को बिगाड़ा देखो

मैंने भी छोड़ दिया ख़ुद को तो अब दुख कैसा

तुमने चाहा ही यही था मुझे तन्हा देखो

(मौलिक व अप्रकाशित)

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Comment by Mahendra Kumar on January 27, 2019 at 11:31am

बहुत-बहुत शुक्रिया आदरणीय लक्ष्मण धामी जी. हार्दिक आभार. सादर.

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on January 18, 2019 at 9:36am

आ. भाई महेंद्र जी, सुंदर गजल हुयी है । हार्दिक बधाई ।

Comment by Mahendra Kumar on January 17, 2019 at 9:27pm

हृदय से आभारी हूँ आदरणीय तेज वीर सिंह जी. बहुत-बहुत शुक्रिया. सादर.

Comment by TEJ VEER SINGH on January 16, 2019 at 5:57pm

हार्दिक बधाई आदरणीय महेंद्र कुमार जी। बेहतरीन गज़ल ।

लोग जितना ही सुधरने को हमें कहते थे

हमने उतना ही यहाँ ख़ुद को बिगाड़ा देखो

मैंने भी छोड़ दिया ख़ुद को तो अब दुख कैसा

तुमने चाहा ही यही था मुझे तन्हा देखो

Comment by Mahendra Kumar on January 16, 2019 at 11:50am

बहुत-बहुत शुक्रिया आदरणीय मोहम्मद अनीस शेख़ जी. आदरणीय समर कबीर सर से हम सभी को बहुत कुछ सीखने को मिलता है. सादर.

Comment by Mahendra Kumar on January 16, 2019 at 11:49am

बहुत-बहुत शुक्रिया आदरणीय सुरेन्द्र जी. हार्दिक आभार. सादर.

Comment by Mahendra Kumar on January 16, 2019 at 11:49am

हृदय से आभारी हूँ आदरणीय अजय तिवारी जी. बहुत-बहुत शुक्रिया. सादर.

Comment by Mahendra Kumar on January 16, 2019 at 11:48am

सादर आदाब आदरणीय राज़ नवादवी जी. उत्साहवर्धन हेतु हृदय से आभारी हूँ. बहुत-बहुत शुक्रिया. सादर.

Comment by Mahendra Kumar on January 16, 2019 at 11:47am

सादर आदाब आदरणीय समर कबीर सर. ग़ज़ल पर आपकी उपस्थिति और इस्लाह का हृदय से आभारी हूँ. बहुत-बहुत शुक्रिया. सादर.

Comment by Mahendra Kumar on January 16, 2019 at 11:46am

बहुत-बहुत शुक्रिया आदरणीय गिरधारी सिंह गहलोत जी. हृदय से आभारी हूँ. सादर.

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