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ग़ज़ल

221 1222 221 1222



इक जख़्म पुराना था फिर जख़्म नया दोगे ।

मासूम मुहब्बत है कुछ दाग लगा दोगे ।।



कमजर्फ जमाने में जीना है बहुत मुश्किल ।

है खूब पता मुझको दो पल में भुला दोगे ।।



एहसान करोगे क्या बेदर्द तेरी फ़ितरत ।

बदले में किसी भी दिन पर्दे को उठा दोगे ।।



कैसे वो यकीं कर ले तुम लौट के आओगे ।

इक आग बुझाने में इक आग लगा दोगे ।।



आदत है पुरानी ये गैरों पे करम करना ।

अपनों की तमन्ना पर अफ़सोस जता दोगे ।।



मजबून… Continue

Added by Naveen Mani Tripathi on March 19, 2017 at 5:23pm — 7 Comments

एक शब्द ....

एक शब्द ....

एक शब्द टूट गया

एक शब्द रूठ गया

एक शब्द खो गया

एक शब्द सो गया

एक शब्द आस था

एक शब्द उदास था

एक शब्द देह था

एक शब्द अदेह था

एक शब्द में अगन थी

एक शब्द में लगन थी

एक शब्द जनम था

एक शब्द मरण था

एक शब्द प्यास था

एक शब्द मधुमास था

एक शब्द चन्दन था

एक शब्द क्रंदन था

एक शब्द मोह था

एक शब्द विछोह था



शब्दों की भीड़ थी

हर शब्द में पीर थी

नीर था शब्दों में

शब्द शब्द…

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Added by Sushil Sarna on March 19, 2017 at 4:20pm — 8 Comments

अनिश्चित भविष्य (कविता) /शेख़ शहज़ाद उस्मानी

कुण्ठित व्यथित
या हुए
व्यथित कुण्ठित !

विघटित संगठित
या हुए
संगठित विघटित !

अघटित घटित
या हुआ
घटित अघटित !

निश्चित अनिश्चित
या है
अनिश्चित निश्चित
भविष्य
देश का !

(मौलिक व अप्रकाशित)

Added by Sheikh Shahzad Usmani on March 19, 2017 at 3:25pm — 8 Comments

दशा और दिशा [लघुकथा] /शेख़ शहज़ाद उस्मानी

"कहता था न कि अच्छा साहित्य पढ़ा करो, अच्छी वेबसाइट पर ही जाया करो, वरना भटकने में देर नहीं लगती!"



"सबकी नज़र में 'अच्छा' एक जैसा हो, ज़रूरी तो नहीं? मेरी नज़र में यही सब 'अच्छा' था!" दोस्त की बात का जवाब देते हुए उसने सारी पर्चियां टेबल पर फैला दीं।



"तुम लड़कियों और औरतों के जितने नज़दीक़ गये, उतने ही औरत जात से दूर होते गये, क्या मिला तुम्हें?"



पर्चियां फिर से काँच के जार में डालते हुए दोस्त की बात का जवाब देते हुए उसने कहा- "जो नम्बर इन पर्चियों में लिखे हैं न,… Continue

Added by Sheikh Shahzad Usmani on March 19, 2017 at 12:36am — 6 Comments

यादें......

यादें......

यादें !

आज पर भारी

बीते कल की बातें

वर्तमान को अतीत करती

कुछ गहरी कुछ हल्की

धुंधलके में खोई

वो बिछुड़ी मुलाकातें

हाँ !

यही तो हैं यादें

ये भीड़ में तन्हाई का

अहसास कराती हैं

आँखों से अश्कों की

बरसात कराती हैं

सफर की हर चुभन

याद दिलाती हैं

जब भी आती हैं

ज़ख़्म कुरेद जाती हैं

अहसासों के शानों पर

ये कहकहे लगाती हैं

ज़हन की तारीकियों में…

Continue

Added by Sushil Sarna on March 18, 2017 at 9:30pm — 6 Comments

ग़ज़ल (दोस्तों की महरबानी हो गई )

ग़ज़ल (दोस्तों की महरबानी हो गई )

----------------------------------------------

फ़ाईलातुन--फ़ाईलातुन --फाइलुन

यूँ न उनको बदगुमानी हो गई |

दोस्तों की महरबानी हो गई |

भूल बचपन के गये वादे सभी

उनको हासिल क्या जवानी हो गई |

नुकताची को क्या दिखाया आइना

उसकी फ़ितरत पानी पानी हो गई |

यूँ नहीं डूबा है मुफ़लिस फ़िक्र में

उसकी बेटी भी सियानी हो गई |

अजनबी के साथ क्या कोई गया

ख़त्म उलफत की कहानी…

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Added by Tasdiq Ahmed Khan on March 18, 2017 at 8:48pm — 6 Comments

कुछ मुक्तक (भाग-२)

मुहब्बत खूबसूरत है, इसे बदनाम मत करना।

देना दिल तबीयत से, कभी अहसान मत करना।

खुदा की ये नियामत है, नहीं हर एक को मिलती।

ये नेमत हाथ लग जाये, कभी इंकार मत करना।



मुहब्बत खेल मत समझो, खुदा की ये इबादत है।

यही इंसान की फितरत, यही शमसीर कुदरत है।

मुहब्बत का परिंदा है यहां, हर शख्स हर जर्रा।

दिलों में क्यों भरा नफरत, जहां में क्यों अदावत है।



बुरा वो मान लें शायद, करूं इजहार यदि उनसे।

गिरा दें मुझको नजरों से, जता दूं प्यार यदि उनसे।

अगर वो… Continue

Added by विन्ध्येश्वरी प्रसाद त्रिपाठी on March 18, 2017 at 7:44pm — 3 Comments

हाइकु

1.प्यासा तालाब
पीपल उदास-सा
गाँव है चुप ।
2.हुक्का , खटिया
चौपाल है गायब
बीमार गाँव ।
3.दहेज प्रथा
परिवर्तित रूप
कैश का खेल ।
4.धरती छोड़
चाँद पर छलांग
पुकारे भूख ।
5.मिलन नहीं
प्यास है बरकरार
है इंतज़ार ।
6.ऐश्वर्य प्रेमी
संत उपदेशक
माया का खेल ।
मौलिक एवं अप्रकाशित

Added by Mohammed Arif on March 18, 2017 at 7:30pm — 4 Comments

न्याय या अन्याय (लघुकथा) /शेख़ शहज़ाद उस्मानी

"इंसान अब तो अपने बनाये लैंसों से लैस है, तमाम तरह के कैमरों ने हमारे काम संभाल कर हमें बड़ी ज़िम्मेदारियों से बचा लिया है!" एक आँख ने दूसरी से कहा।





"हमारा हक़ भी तो छीना गया है न! हमारा अपना दायरा कितना सीमित कर दिया गया है, सोचा कभी?" दूसरी आँख बोली।



"सीसीटीवी कैमरों से अधिक हुआ है यह सब!"



"क्योंकि वे इंसानी स्वभाव से मुक्त हैं, जिस कारण वे भावुक नहीं हो सकते। वे इंसानों के मुक़ाबले कहीं ज़्यादा सतर्क रहते हैं, इसलिए पुलिस वालों से भी ज़्यादा भरोसा अब… Continue

Added by Sheikh Shahzad Usmani on March 17, 2017 at 9:05pm — 2 Comments

हमने सांसें भी गिरवी रख दी हैं (ग़ज़ल)

2122 1212 22



मुझको सच कहने की बीमारी है

इसलिए तो ये संगबारी है



अपने हिस्से में मह्ज़ ख़्वाब हैं,बस!

नींद भी, रात भी तुम्हारी है



एक अरसे की बेक़रारी पर

वस्ल का एक पल ही भारी है



चीरती जाती है मिरे दिल को

याद तेरी है या कि आरी है?



हमने साँसें भी गिरवी रख दी हैं

अब तो ये ज़िन्दगी उधारी है



सब तो वाकिफ़ हैं आखिरी सच से

किसलिए फिर ये मारा-मारी है?



नींद का कुछ अता-पता तो नहीं

रात है, ख़्वाब हैं,… Continue

Added by जयनित कुमार मेहता on March 17, 2017 at 4:51pm — 5 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
पत्ता था, सब्ज़, टूटके खिड़की में आ गया

221 2121 1221 212

पत्ता था, सब्ज़, टूटके खिड़की में आ गया

हस्ती शजर की बाकी है मुझको बता गया

 

माना हवाएँ तेज़ हैं मेरे खिलाफ़ भी

लेकिन जुनून लड़ने का इस दिल पे छा गया

 

खोने को पास कुछ भी नहीं था हयात में

किसकी तलाफ़ी हो अभी तक मेरा क्या गया

 

शायद ये दुनिया मेरे लिए थी नहीं कभी

फिर शिकवा क्यों करुँ कि खुदा फ़ैज़ उठा गया

 

ख़्वाबों को ज़िन्दा करके भी क्या होता, दोस्तो!

मेरा जो वक्त था…

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Added by शिज्जु "शकूर" on March 17, 2017 at 2:30pm — 9 Comments

ज़ुबाँ पे सख्त पहरा हो रहा है(गजल)/सतविन्द्र कुमार राणा

1222 1222 122
बिखरकर फिर इकट्ठा हो रहा है
जवाँ फिर से इरादा हो रहा है।

जिसे अपना समझते थे,न जाने
वही क्यों अब पराया हो रहा है?

समन्दर सी छलकती हैं ये आँखें
कोई तो ज़ख्म गहरा हो रहा है।

किसे जाकर सुनाएँ हाल अपना
हमारा शाह बहरा हो रहा है।

भरोसा टूटना लाज़िम हुआ अब
जहाँ का दौर झूठा हो रहा है।

ज़ुबाँ कैसे किसी की अब उठेगी
ज़ुबाँ पे सख़्त पहरा हो रहा है।

मौलिक/अप्रकाशित

Added by सतविन्द्र कुमार राणा on March 16, 2017 at 10:11pm — 12 Comments

मधुमालती छंद ( मात्रा विधान - 7-7 , 7-7)

ऐसा हुआ , बारात में
लड़का नहीँ , आया अभी

बोले पिता , बेटा कहे
पैसा अभी , मिला नहीं

शादी नहीँ , होगी अभी
मिला नहीं , दहेज अभी ।

बेटी कहे , देना नहीं
पैसा बुरा , जले चिता

होती नहीं , बेटी बुरी
चलती नही , चालें कभी

पगड़ी भली , लागे मुझे
पिता बोज़ क्यों , माने मुझे

बेटी कभी , चाहे नहीँ
अपमान नहीँ , करे कभी ।

मौलिक एवं अप्रकाशित ।

Added by KALPANA BHATT ('रौनक़') on March 16, 2017 at 4:14pm — 7 Comments

फुर्सत से कभी मेरी,ज़िंदगानी देख लेना (कविता/नज़्म)

फुर्सत से कभी मेरी,

ज़िंदगानी देख लेना।

हो सके तो दरिया,

तूफानी देख लेना॥



है मेरी माँ ये,

समझाऊँ तुम्हें कैसे।

भूखा जो रहूँ, मैं

इसकी पेशानी देख लेना॥



आज़ाद परिंदे हो,

तुम उड़ ही जाओगे।

माँ-बाप की कभी खटिया,

पुरानी देख लेना॥



मैं अकेला कब था

मुझ में क़ायनात थी।

किस तरह से हमने, की

बे-ईमानी देख लेना॥



है सहूलियत तो,

मुंह खोलने से पहले।

पिताजी के अपनी,

परेशानी देख लेना॥



पीपल… Continue

Added by SudhenduOjha on March 16, 2017 at 2:35pm — No Comments

दीवार के कान - लघुकथा –

दीवार के कान - लघुकथा –

शंकर सिंह एक अनुशासन प्रिय और जिम्मेवार अधिकारी थे।  कारखाने में और कोलोनी में उनकी अच्छी छवि थी। लेकिन कल कारखाने में उनके साथ जो घटना हुई थी, उसने उनको विचलित कर दिया था। एक चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी से मामूली वार्तालाप ने एक उग्र झड़प का रूप ले लिया।  यूनियन लीडर्स के बीच में आने से मामला कुछ ज्यादा ही तूल पकड़ गया। मि० सिंह से हाथापाई तक हो गयी। मैनेजमेंट ने तुरंत मि० सिंह को घर भेज दिया था। उनके आने के बाद प्रेस वाले, मीडिया वाले भी कारखाने तक आगये…

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Added by TEJ VEER SINGH on March 16, 2017 at 2:34pm — 4 Comments

चला गया ...

चला गया ...

हवा 

शयन कक्ष के परदों से

खेलती रही

टेबल पर पड़ी मैग्ज़ीन के पन्ने

वायु वेग से

बार बार

फड़फड़ाते रहे

तन्हा से पड़े

काफी के मग

खाली होते हुए भी

अपने में

बहुत कुछ समेटे थे

समेटे थे

अपने अंदर

अकेलेपन से बातें करते

वो क्षण

जो काफी के मग को

अधरों से लगाए

कनखियों से निहारते हुए 

आँखों ने आँखों में

बिताये थे

समेटे थे…

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Added by Sushil Sarna on March 15, 2017 at 10:00pm — 10 Comments

ग़ज़ल (निगाहों से आँसू निकलते रहे )

ग़ज़ल

-------

(फऊलन -फऊलन -फऊलन -फअल )

क़ियामत की वो चाल चलते रहे |

निगाहें मिलाकर बदलते रहे |

दिखा कर गया इक झलक क्या कोई

मुसलसल ही हम आँख मलते रहे |

यही तो है गम प्यार के नाम पर

हमें ज़िंदगी भर वो छलते रहे |

मिली हार उलफत के आगे उन्हें

जो ज़हरे तअस्सुब उगलते रहे |

तअस्सुब की आँधी है हैरां न यूँ

वफ़ा के दिए सारे जलते रहे |

असर होगा उनपर यही सोच कर

निगाहों से आँसू…

Continue

Added by Tasdiq Ahmed Khan on March 15, 2017 at 8:51pm — 16 Comments

गुँथन-उलझन

शंका और विश्वास के दोराहे पर 

मन में पीली धुंधली उदास गहरी

बेमाप वेदना यथार्थों की लिए

स्वीकार कर लेता हूँ सभी झूठ 

कि जाने कब कहाँ किस झूठ में भी

किसी की विवशता दिख जाए, या

मिल जाए उसकी सच्चाई का संकेत

कि जानता हूँ मैं, यह ठंडी पुरवाई

यह फैली हुई धूप नदी-झील-तालाब

सब कहते हैं  ...

वह कभी झूठी नहीं थी

ऊँची उठती है कोई उभरती कराह

स्वपनों के अनदेखे विस्तार में

विद्रोह करते हैं मेरे…

Continue

Added by vijay nikore on March 15, 2017 at 7:32pm — 12 Comments

फटी बिवाई(लघुकथा)राहिला

"सुनैना की माँ!ज़िंदगी में पहली बार आदमी पहचानने में चूक हो गयी ।मैंने बड़ा भला लड़का समझा था उसे ।लेकिन यह तो ,अव्वल दर्जे का पढ़ालिखा गंवार निकला।अगर पता होता ऐसा बज्रमूर्ख होगा ।तो कतई अपनी बच्ची नहीं ब्याहता ऐसे लड़के से।" पछताते हुए ठाकुर बलदेव का गुस्सा अपने आप में नहीं समा रहा था।

"आप शांत हो जाईये ।ऐसे मसले ठंडे दिमाग़ से सुलझाए जाते हैं। आप कुंअर साहब को बुलवा भेजिए ,फिर पूछते,समझाते है क्या बात है?वैसे तो हमने मान पान में कोई कसर नहीं रखी ।फिर बिटिया को इस तरह परेशान और मारपीट करने का… Continue

Added by Rahila on March 15, 2017 at 11:28am — 4 Comments

"नूर" ....कब चुना हमने मुसलमान या हिन्दू होना

२१२२/११२२/११२२/२२

कब चुना हमने मुसलमान या हिन्दू होना

न तो माँ बाप चुनें और न घर ही को चुना

हम ने ये भी न चुना था कि बशर हो जायें.



हम को इंसान बना कर था यहाँ भेजा गया,

कैसे मज़हब के कई ख़ानों में तक्सीम हुए?

क्यूँ सिखाये गए हम को ये सबक नफरत के?

.

हम ने दहशत से परे जा के बुना इक सपना

अपनी दुनिया न सही, काश हो आँगन अपना

ऐसा आँगन कि जहाँ साथ पलें राम-ओ-रहीम.

.

जुर्म ये था कि जलाया था अँधेरों में चराग़

हम ने नफ़रत की हवाओं के…

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Added by Nilesh Shevgaonkar on March 14, 2017 at 9:30pm — 8 Comments

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