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मैंने उसके नाम
जितने गीत लिखे थे
उसने सभी नकार दिए हैं
उसने नकार दिया है
उन गीतों में अपने वजूद को
अपनी मौजूदगी को
अपने किसी भी अहसास को

उसे नहीं है याद
वो लवबर्ड का जोड़ा
जो बहुत प्यार से उसने सजाया था
मेरी अलमारी में
और उसे नहीं है याद वो रक्षा सूत्र
जो उसने मुझे
और मैंने उसको पहनाया था
उसने नहीं है याद वो सोलह रूपए जो
जबर्दस्ती उसने दिए थे समोसे वाले को
ये जानकार कि
मेरी जेब खाली है

उसने नकार दिया है
अपने माथे पर लगी उस चोट को
जो मेरे ख्याल में ग़ुम रहने पर
खंबे से टकराने पर लगी थी उसे
उसने नकार दिया है
अपनी उँगलियों के पोरों पर
मेरी इकलौती छुवन को भी

और न जाने क्या क्या
नकार दिया उसने
धुल गया है सब कुछ उसके दिल से
और दिमाग से

और मैं नहीं भूल सका कुछ भी

इसलिए मैं उसका नकार स्वीकार नहीं कर सकता
और उसके नकार पर एतराज करता हूँ
नकारता हूँ उसके नकार को
पूरी शिद्दत से

कहीं मैं उस वो विशुद्ध पुरुषवादी सोच का ही
हिस्सा तो नहीं
जो स्त्री को नकार की इज़ाज़त नहीं देता

मौलिक और अप्रकाशित

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Comment by मनोज अहसास on March 29, 2017 at 10:20pm
Bahut bahut aabhar
Aadaraniy Mahendra ji
Sadar
Comment by Mahendra Kumar on March 29, 2017 at 7:32pm
आदरणीय मनोज जी, बहुत बढ़िया प्रस्तुति लगी आपकी। ढेर सारी बधाई प्रेषित है। सादर।
Comment by मनोज अहसास on March 26, 2017 at 11:45am
Bahut bahut aabhar
Aadarniy mo.arif Sahab
Kuch dinon se likh nahi pata hun
Aur obo par type karne me bhi much samasya hai
BA's ye rachna apne aap hi ho gai
Sadar aabhar
Aapka
Comment by Mohammed Arif on March 26, 2017 at 9:46am
आदरणीय मनोज कुमार जी आदाब, बहुत ख़ूब सूरत प्यार के अहसास में डूबी रचना । शायद आपकी ओबीओ पर यह नई रचनात्मक दस्तक है । आपको ढेरों मुबारकबाद ।

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