For any Query/Feedback/Suggestion related to OBO, please contact:- admin@openbooksonline.com & contact2obo@gmail.com, you may also call on 09872568228(योगराज प्रभाकर)/09431288405(गणेश जी "बागी")

ग़ज़ल....अब कहाँ गुम हुये आसरे भीड़ में

212 212 212 212
अब कहाँ गुम हुये आसरे भीड़ में
चलते चलते कदम रुक गये भीड़ में

मुख़्तलिफ़ दर्द में हम पुकारा किये
घुट गयी आह थे कहकहे भीड़ में

बाँह को थामकर हमने रोका बहुत
तुम गये भीड़ में खो गये भीड़ में

है सभी का मुकददर परेशानियाँ
दे किसे कौन अब मशविरे भीड़ में

मुंतज़िर हैं बड़े दिल ए नाशाद के
अनकहे प्यार के फलसफे भीड़ में

दिल के ज़ज्बात 'ब्रज' रायगाँ मत करो
फिर रहे हैं कई मसखरे भीड़ में
(मौलिक एवं अप्रकाशित)
बृजेश कुमार 'ब्रज'

Views: 598

Comment

You need to be a member of Open Books Online to add comments!

Join Open Books Online

Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on March 23, 2017 at 5:11pm
उचित है अदरणीय गिरिराज जी..आपकी सलाह सर्वथा उचित है..अदरणीय शुक्ला जी की सलाह के बाद मैं कुछ बदलाव सोच ही रहा था.. आपका सुझाव बेहद खूबसूरत है..सादर प्रणाम

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on March 23, 2017 at 9:25am

आदरनीय बृजेश भाई , अच्छी गज़ल कही है आपने , हार्दिक बधाइयाँ स्वीकार करें । मेरा सोचना है कि .. अगर हम सहीं भी हों और कोई बेहतर सलाह आये तो भी स्वीकार कर लेना चाहिये .... चाहें तो उस मिसरे को ऐसे कह सकते हैं

दे किसे कौन अब मशविरे भीड़ में

Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on March 22, 2017 at 8:46am
आदरणीय रवि शुक्ला जी रचना की सार्थक समीक्षा हेतु आपका हार्दिक आभार..जहाँ तक मेरी जानकारी है मशविरा मतलब सलाह है जो आपस में भी की जाती है और दूसरों को भी दी जाती है..इसलिए कौन किसको कहे मश्विरे भीड़ में.. मैं गलत भी हो सकता हूँ..सादर
Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on March 22, 2017 at 8:14am
आदरणीय आरिफ जी रचना पटल पे आपका हार्दिक स्वागत है..उर्दू शब्दों में थोड़ी समस्या है अभी..अशुद्धियों को दूर करने का प्रयास किया है..सादर
Comment by Ravi Shukla on March 21, 2017 at 12:06pm

आदरणीय ब्रजेश कुमार जी अच्‍छी गजल कही है आपने बधाई स्‍वीकार करें

चौथे शेर में मशविरे के साथ आपने कहे लफ्ज का प्रयोग किया है । मश्‍विरा किया जाता है आपस मे शायद । अगर ये सही है तो शेर मे थोड़ी सी तराश की जरूरत हो सकती है । सादर

Comment by Mohammed Arif on March 20, 2017 at 1:44pm
आदरणीय बृजेन्द्र कुमार जी आदाब, बहुत अच्छी ग़ज़ल । शेर दर शेर दाद के साथ मुबारक़बाद । कुछ वर्तनीगत अशुद्धियाँ है ।

कृपया ध्यान दे...

आवश्यक सूचना:-

1-सभी सदस्यों से अनुरोध है कि कृपया मौलिक व अप्रकाशित रचना ही पोस्ट करें,पूर्व प्रकाशित रचनाओं का अनुमोदन नही किया जायेगा, रचना के अंत में "मौलिक व अप्रकाशित" लिखना अनिवार्य है । अधिक जानकारी हेतु नियम देखे

2-ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार यदि आपको अच्छा लगा तो अपने मित्रो और शुभचिंतको को इस परिवार से जोड़ने हेतु यहाँ क्लिक कर आमंत्रण भेजे |

3-यदि आप अपने ओ बी ओ पर विडियो, फोटो या चैट सुविधा का लाभ नहीं ले पा रहे हो तो आप अपने सिस्टम पर फ्लैश प्लयेर यहाँ क्लिक कर डाउनलोड करे और फिर रन करा दे |

4-OBO नि:शुल्क विज्ञापन योजना (अधिक जानकारी हेतु क्लिक करे)

5-"सुझाव एवं शिकायत" दर्ज करने हेतु यहाँ क्लिक करे |

6-Download OBO Android App Here

हिन्दी टाइप

New  देवनागरी (हिंदी) टाइप करने हेतु दो साधन...

साधन - 1

साधन - 2

Latest Activity

Sheikh Shahzad Usmani replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-133 (विषय मुक्त)
"हाड़-मॉंस स्ट्रेट (लघुकथा) : "नेता जी ये क्या हमें बदबूदार सॅंकरी गलियों वाली बस्ती के दौरे…"
3 hours ago
Sheikh Shahzad Usmani replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-133 (विषय मुक्त)
"सादर नमस्कार आदरणीय मंच। इंतज़ार है साथियों की सार्थक रचनाओं का, सहभागिता का। हम भी हैं कोशिश में।"
3 hours ago
Admin posted a discussion

"ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-133 (विषय मुक्त)

आदरणीय साथियो,सादर नमन।."ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" में आप सभी का हार्दिक स्वागत है।प्रस्तुत…See More
Tuesday
Jaihind Raipuri replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-190
"इल्म गिरवी है अभी अपनी जहालत के लिए ढूँढ लो क़ौम नयी अब तो बग़ावत के लिए अब अगर नाक कटानी ही है हज़रत…"
Sunday
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-190
"आ. रिचा जी, सादर अभिवादन। तरही मिसरे पर सुंदर गजल हुई है। गिरह भी खूब लगाई है। हार्दिक बधाई।"
Sunday
Richa Yadav replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-190
"2122, 1122, 1122, 112/22 सर झुका देते हैं हम उसकी इबादत के लिए एक दिल चाहिए हमको तो मुहब्बत के…"
Saturday
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-190
"सादर अभिवादन।"
Saturday
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-190
"सर कोई जब न उठा सच की हिमायत के लिएकर्बला   साथ   चले   कौन …"
Saturday
Admin replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-190
" स्वागतम "
Apr 25
Admin posted a discussion

"ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-189

ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरे के 190 वें अंक में आपका हार्दिक स्वागत है | इस बार का मिसरा नौजवान शायर…See More
Apr 21
आशीष यादव posted a blog post

मशीनी मनुष्य

आज के समय में मनुष्य मशीन बनता जा रहा है या उसको मशीन बनने पर मजबूर किया जाता है. कारपोरेट जगत…See More
Apr 20
Ashok Kumar Raktale replied to Admin's discussion 'ओबीओ चित्र से काव्य तक' छंदोत्सव अंक 178 in the group चित्र से काव्य तक
"आदरणीय अखिलेश कृष्ण श्रीवास्तव साहब, प्रस्तुत दोहों की सराहना हेतु आपका हार्दिक आभार। सादर"
Apr 19

© 2026   Created by Admin.   Powered by

Badges  |  Report an Issue  |  Terms of Service