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Dr T R Sukul
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Dr T R Sukul replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-83
"विनम्र आभार आदरणीय"
Sep 9
Dr T R Sukul replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-83
"विनम्र आभार आदरणीय."
Sep 9
Dr T R Sukul replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-83
"रचना पसंद कर अपनी सारगर्भित टिप्पणी से सुसज्जित करने के लिए विनम्र आभार आदरणीय अशोक जी। "
Sep 9
Dr T R Sukul replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-83
"रचना पसंद कर अपनी सारगर्भित टिप्पणी से सुसज्जित करने के लिए विनम्र आभार आदरणीय मिथिलेश जी।"
Sep 9
Dr T R Sukul replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-83
"उन्माद (अतुकान्त ) चञ्चल पवन के थपेड़ों को सहताअञ्चल में पाहन के रोड़ों को रखतापल रहा हॅूं ,चल रहा हॅूं दिन रात,गन्तव्य के लिये। उन्मत्तता साधे व्याकुलता जगायेचिन्तनता लादे, लालसा भगायेघुल रहा हॅूं,मिल रहा हॅूं हर बारअपनत्व के लिये। संगीत से दूर…"
Sep 8
Dr T R Sukul replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-29 (विषय: अनकहा)
"आदरणीया कल्पना भट्ट जी , समय मिलने पर कृपया फिर से पढ़ने का प्रयत्न  कीजिए।सादर। "
Aug 31
Dr T R Sukul replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-29 (विषय: अनकहा)
"आदरणीया नयना  जी , धन्यवाद।  मैं सुधार करने  का प्रयास करूंगा। "
Aug 31
Dr T R Sukul replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-29 (विषय: अनकहा)
"आदरणीया  प्रतिभा पांडेय  जी , सादर आभार।"
Aug 31
Dr T R Sukul replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-29 (विषय: अनकहा)
"आदरणीय ओमप्रकाश जी , सादर आभार। "
Aug 31
Dr T R Sukul replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-29 (विषय: अनकहा)
"आदरणीय तस्तीक  अहमद जी सादर आभार।  "
Aug 31
Dr T R Sukul replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-29 (विषय: अनकहा)
"आदरणीय सुरेंदर जी , धन्यवाद।  मैं सुधार करने  करूंगा। "
Aug 31
Dr T R Sukul replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-29 (विषय: अनकहा)
"धन्यवाद सहित आभार आदरणीय डॉ चंद्रेश जी ! आप तो जानते हैं कि मेरा क्षेत्र भिन्न है। लघुकथा के तत्वों पर तो कुछ भी कहने के किये मैं बहुत ही संयम रखता हूँ और प्रायः संकुचित ही रहता हूँ क्योंकि इन्हें गहराई तक समझ रखने वाले आप जैसे प्रबुद्धजनों से मैं…"
Aug 31
Dr T R Sukul replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-29 (विषय: अनकहा)
"आदरणीया, इस में अनकहा यही है कि जिन पात्रों का अवलोकन किया गया है वह भले ही संपन्न और प्रतिष्ठित परिवारों से हैं पर बातचीत के दौरान उनमें मानवीयता के गुण  नहीं पाए गए यद्यपि वे मनुष्य के रूप में  अवश्य थे। सम्पन्नता और विद्वत्ता उनके…"
Aug 30
Dr T R Sukul replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-29 (विषय: अनकहा)
"आदरणीय महोदय, इस में अनकहा यही है कि जिन पात्रों का अवलोकन किय गया है वह भले ही संपन्न और प्रतिष्ठित परिवारों से हैं पर बातचीत के दौरान उनमें मानवीयता के गुण  नहीं पाए गए यद्यपि वे मनुष्य के रूप में  अवश्य थे। "
Aug 30
Dr T R Sukul replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-29 (विषय: अनकहा)
"स्वयंवर अपनी आत्मनिर्भर, सुन्दर, योग्य, और सुशील पुत्री के लिए उसके स्तर का वर खोजने में पिता ने अपनी पूरी ताकत लगा दी पर कहीं भी बात नहीं बनी । अवसादग्रस्त होते पति की दशा जब पत्नी से नहीं देखी गई तो एक दिन साहस बटोरकर वह पुत्री से बोली…"
Aug 30
Dr T R Sukul replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-82
"विनम्र आभार  आदरणीया कल्पना भट्ट जी।"
Aug 11

Profile Information

Gender
Male
City State
Sagar Madhyapradesh
Native Place
Sagar
Profession
Retired from govt service since 8/2012
About me
I have been a lecturer in physics for twenty years and then worked as education officer, assistant director deputy director , etc and now working in the field of spiritual science and yogic science.

लौकी

लौकी
------
‘‘ अरे, सेठजी ! नमस्कार। अच्छा हुआ आप यहीं सब्जी बाजार में मिल गए, मैं तो आपके ही घर जा रहा था। समाचार यह है कि महाराज जी पधारे हैं, उनका कहना है कि इस एरिया में अहिंसा मंदिर का निर्माण कराना है जिसमें आपका सहयोग... ..।‘‘
‘‘ जी बिलकुल ! मेरी ओर से ग्यारह हजार , शाम को आपके पास पहुॅंचा दूॅंगा।‘‘
यह सुनकर, सब्जी का थैला टाॅंगे सेठजी के शिष्यनुमा नौकर से न रहा गया वह बोला,
‘‘सेठजी ! अभी आपने सब्जी की दूकान पर लौकी लेते समय लम्बी बहस के बाद, पूरे बाजार में बीस रुपये प्रति किलो रेट मिल रही लौकी पन्द्रह रुपये में खरीद कर ही साॅंस ली, जबकि इनके एक इशारे पर ग्यारह हजार रुपये दे दिए ?‘‘
‘‘ अरे तू नहीं समझेगा, पाॅंच रुपया अधिक देता तो वह पता नहीं उनका किस प्रकार दुरुपयोग करता , बीड़ी या शराब पीने में लगाता, परन्तु इस प्रकार बचाकर हमने मंदिर के काम में लगा दिया उससे तो सब लोगों का भला ही होगा ?‘‘
‘‘ पर आपने ही तो सिखाया है कि किसी को भी मन, कर्म और वचन से कष्ट पहुँचाना हिंसा कहलाती है। आपने उस किसान को आर्थिक नुकसान पहुॅंचाकर मानसिक कष्ट दिया जो लाभ के लिये नहीं अपनी आजीविका के लिए सब्जी बेचने बाजार में आया है। तो, इस प्रकार हिंसा करके जोड़ा गया धन अहिंसा मंदिर में लगाने पर क्या उसकी पवित्रता खंडित न होगी ? ‘‘
‘‘ अरे! प्रवचन न दे, चल आगे, अभी और बहुत कुछ खरीदना है, तू क्या यह नहीं जानता कि सब्जी उगाने से लेकर बेचने तक की क्रियाओं में किसानों के द्वारा कितने जीवों की हिंसा होती है ? तो क्या सब्जी भाजी खाना छोड़ देना चाहिए ? ‘‘
‘‘ वही तो मैं कह रहा हॅूं कि आप अहिंसा अहिंसा चिल्लाते हैं पर हिंसा से अर्जित भोजन करने से चूकते नहीं । आपकी कथनी और करनी में अन्तर क्यों है, मुझे आपके यहाॅं नौकरी नहीं करना। सम्हालो अपना थैला , मैं तो चला, इस माह के चार दिन का मेरा वेतन भी मेरी ओर से मंदिर को दे देना।‘‘
(मौलिक और अप्रकाशित )

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लघुकथा

लखूचंद 

=====

एक दिन कालेज के कुछ युवक लखूचंद के सामने ही उसकी जमकर तारीफ कर रहे थे ,

‘‘‘ अरे ये तो लखूचंद के एक हाथ का कमाल है , दोनों हाथ होते तो पूरे जिले में मिठाई के नाम पर केवल इन्हें ही जाना जाता। लेकिन यार , ये तो बताओ कि दूसरा हाथ क्या जन्म से ही ऐसा है या बाद में कुछ हो गया ?‘‘

बहुत दिन बाद लखूचंद को अपनी जवानी के दिन याद आ गए, बोले ,



‘‘ युवावस्था में मैं यों ही बहुत धनवान होने का सपना देखा करता । पिताजी कहते थे कि मैं उनकी हलवाई की दूकान सम्हालूं…

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Posted on March 26, 2017 at 11:54am — 1 Comment

लौकी (लघुकथा)

‘‘ अरे, सेठजी ! नमस्कार। अच्छा हुआ आप यहीं सब्जी बाजार में मिल गए, मैं तो आपके ही घर जा रहा था। समाचार यह है कि महाराज जी पधारे हैं, उनका कहना है कि इस एरिया में अहिंसा मंदिर का निर्माण कराना है जिसमें आपका सहयोग... ..।‘‘

‘‘ जी बिलकुल ! मेरी ओर से ग्यारह हजार , शाम को आपके पास पहुॅंचा दूॅंगा।‘‘

यह सुनकर, सब्जी का थैला टाॅंगे सेठजी के शिष्यनुमा नौकर से न रहा गया वह बोला,

‘‘सेठजी ! अभी आपने सब्जी की दूकान पर लौकी लेते समय लम्बी बहस के बाद, पूरे बाजार में बीस रुपये प्रति किलो…

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Posted on March 6, 2017 at 10:00pm — 12 Comments

केवल तुम

51

केवल तुम

=======

मैं बार बार मन ही मन हर्षित सा होता हॅूं,

हर ओर तुम्हारा ही तो अभिनन्दन है।

मन मिलने को आतुर फिर भी कुछ डर है सूनापन है,

हर साॅंस बनाती नव लय पर संगीत अनोखी धड़कन है,

अब तो हर द्वारे आहट पर तेरा ही अवलोकन है,

मैं इसीलिये नवगीत कंठ करता रहता हॅूं

हर शब्द में बस तेरा ही तो आवाहन है।

मन की राह बनाकर इन नैनों के सुमन बिछाये हैं,

मधुर मिलन की आस लिये ये अधर सहज मुस्काये हैं,

हर पल बढ़ते संवेदन…

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Posted on November 26, 2016 at 12:45pm — 6 Comments

प्रदूषण

151  प्रदूषण



जिंदगी जन्म से डूबी थी अश्रुसागर में,

अब तो लहरों के भंवर और भी गहरा रहे हैं!!



सांस की आस ले बाहर की ओर झाॅंका तो,

प्रदूषण की भभक से ही चेतना थर्रा गई।

डूबती उतरा रही नव कल्पनायें भी

घड़कते घड़घडाते घोष से घबरा गई।

विषैले गगनभेदी विकिरणों के दीर्घ ध्वज लहरा रहे हैं!!



स्वार्थी अर्थलोलुप वणिकवृत्ति व्याप्त घर घर में

मनुष्यता हर मनुज से दूर, कोसों दूर पाई।

परस्पर निकटतम संबंध भी दूषित विखंडित,

आत्मीयता, भ्रातृत्व और…

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Posted on August 7, 2016 at 3:18pm

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At 3:54pm on February 17, 2016, Sushil Sarna said…

आदरणीय टी आर शुक्ल जी, ओ बी ओ द्वारा आपकी माह की सर्वश्रेष्ठ रचना के चयनित होने पर आपको हार्दिक बधाई। 

At 11:59pm on February 16, 2016,
मुख्य प्रबंधक
Er. Ganesh Jee "Bagi"
said…

आदरणीय डॉ. टी. आर. शुक्ल जी.
सादर अभिवादन !
मुझे यह बताते हुए हर्ष हो रहा है कि आपकी कविता "कवच और कुंडल" को "महीने की सर्वश्रेष्ठ रचना" सम्मान के रूप मे सम्मानित किया गया है | इस शानदार उपलब्धि पर बधाई स्वीकार करे |

आपको प्रसस्ति पत्र शीघ्र उपलब्ध करा दिया जायेगा, इस निमित कृपया आप अपना पत्राचार का पता व फ़ोन नंबर admin@openbooksonline.com पर उपलब्ध कराना चाहेंगे | मेल उसी आई डी से भेजे जिससे ओ बी ओ सदस्यता प्राप्त की गई हो |
शुभकामनाओं सहित
आपका
गणेश जी "बागी
संस्थापक सह मुख्य प्रबंधक 
ओपन बुक्स ऑनलाइन

At 10:43pm on December 2, 2015, Dr T R Sukul said…

Your attention is requested sir, towards my poems posted recently.

Respectfully,

Dr TRSukul.

At 3:15pm on August 15, 2015, vijay nikore said…

आदरणीय शुक्ल जी,

आपकी १९८५ की कविता पढ़कर आनन्द आया...सुन्दर भाव और शब्द संयोजन।

आपसे ऐसी ही और भी कविताएँ मिलेंगी, यह आशा है।

सादर

विजय निकोर

At 3:35am on August 15, 2015,
सदस्य कार्यकारिणी
मिथिलेश वामनकर
said…

स्वागत अभिनन्दन 

ग़ज़ल सीखने एवं जानकारी के लिए

 ग़ज़ल की कक्षा 

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भारतीय छंद विधान से सम्बंधित जानकारी  यहाँ उपलब्ध है

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