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केवल तुम
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मैं बार बार मन ही मन हर्षित सा होता हॅूं,
हर ओर तुम्हारा ही तो अभिनन्दन है।

मन मिलने को आतुर फिर भी कुछ डर है सूनापन है,
हर साॅंस बनाती नव लय पर संगीत अनोखी धड़कन है,
अब तो हर द्वारे आहट पर तेरा ही अवलोकन है,
मैं इसीलिये नवगीत कंठ करता रहता हॅूं
हर शब्द में बस तेरा ही तो आवाहन है।

मन की राह बनाकर इन नैनों के सुमन बिछाये हैं,
मधुर मिलन की आस लिये ये अधर सहज मुस्काये हैं,
हर पल बढ़ते संवेदन से उपवन कुछ कुछ शरमाये हैं
मैं इसीलिये टकटकी लगा हर चित्र देखता हूँ
हर दृश्य तुम्हारा ही तो दर्शन है।

सरगम तेरी वाणी को सुनने कब से लालायित है,
वीणा के तार थिरकने को तेरे हाथों पुलकायित हैं,
मेरा हर कण हर क्षण बस अब तुम पर आधारित है
मैं इसी लिये हर तान गुनगुनाता रहता हॅूं,
हर गीत तुम्हारा ही तो गायन है।
30 मार्च 1975
"मौलिक और अप्रकाशित "

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Comment by गिरिराज भंडारी on November 28, 2016 at 7:49pm

आदरनीय डा. सुकुल भी , बहुत खूब ! भाव पूर्ण कविता के लिये आप्को हार्दिक बधाइयाँ ।

Comment by Dr T R Sukul on November 28, 2016 at 9:35am

रचना पर समय देकर मानवर्धन करने के लिए सादर आभार आदरणीय विजय निकोर साहब। 

Comment by Dr T R Sukul on November 28, 2016 at 9:32am

रचना पर समय देकर मान वर्धन करने के लिए सादर धन्यवाद  आदरणीय डॉ गोपालनारायणजी एवं समर कबीर साहब। आपकी आशंका को मैं आंशिक रूप से स्वीकार करता हूँ। "वीणा के तार थिरकने को तेरे हाथों , पुलकायित हैं। " इस लाइन में टंकण के समय अल्पविराम लगाया जाना था जो नहीं होने से यह भ्रम उत्पन्न होता है। इसे एडिट करने का प्रयास करता हूँ।  उदारता के लिए आभार । 

Comment by vijay nikore on November 28, 2016 at 8:10am

 सुन्दर भाव। अच्छी रचना के लिए बधाई।

Comment by Samar kabeer on November 26, 2016 at 10:58pm
जनाब डॉ.शुक्ल साहिब आदाब,अच्छी भावपूर्ण कविता लिखी आपने,इस प्रस्तुति पर बधाई स्वीक्सर करें ।
मैं जनाब गोपाल नारायण जी से सहमत हूँ ।
Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on November 26, 2016 at 5:28pm

आ० सुन्दर भावों से सजी है कविता पर कही कही भाषा भाव का अनुगमन नहीं कर पाती जैसे -वीणा के तार थिरकने को तेरे हाथों पुलकायित हैं,

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