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221 1222 221 1222

इक जख़्म पुराना था फिर जख़्म नया दोगे ।
मासूम मुहब्बत है कुछ दाग लगा दोगे ।।

कमजर्फ जमाने में जीना है बहुत मुश्किल ।
है खूब पता मुझको दो पल में भुला दोगे ।।

एहसान करोगे क्या बेदर्द तेरी फ़ितरत ।
बदले में किसी भी दिन पर्दे को उठा दोगे ।।

कैसे वो यकीं कर ले तुम लौट के आओगे ।
इक आग बुझाने में इक आग लगा दोगे ।।

आदत है पुरानी ये गैरों पे करम करना ।
अपनों की तमन्ना पर अफ़सोस जता दोगे ।।

मजबून वफाओं का लिक्खा है बहुत खत में ।
बेख़ौफ़ हवाओं में यह ख़त भी उड़ा दोगे ।।

तुमने ही निभाया कब किरदार भरोसे का ।
अश्कों की इमारत को लहजों में छुपा दोगे ।।

चर्चा है सितारों में है चाँद नया क़ातिल ।
गर जुर्म हुआ साबित फरमान सुना दोगे ।।

--- नवीन मणि त्रिपाठी
मौलिक अप्रकाशित

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Comment by गिरिराज भंडारी 4 hours ago

आदरनीय नवीन भाई , खूबसूरत गज़ल के लिये बधाइयाँ आपको । आ,रवि भाई की बातों का ख्याल कीजियेगा । -- कुछ सलाह है .. सही लगे तो स्वीकार करें ...
इक जख़्म पुराना था फिर जख़्म नया दोगे   ---- इक जख़्म पुराना है इक और नया दोगे

इक आग बुझाने में इक आग लगा दोगे ।। - इक आग बुझाओगे  इक आग लगा दोगे ।।

अश्कों की इमारत को लहजों में छुपा दोगे । -- अश्कों की इबारत को लहजों में छुपा दोगे ।

Comment by Naveen Mani Tripathi yesterday
जनांब मुहम्मद आरिफ साहब शुक्रिया ।
Comment by Naveen Mani Tripathi yesterday
आ0 मोहित मुक्त जी सादर आभार ।
Comment by Naveen Mani Tripathi yesterday
आदरणीय रवि शुक्ल जी सादर आभार ।
Comment by Ravi Shukla on Tuesday

आदरणीय नवीन मणि त्रिपाठी जी  बहुत ख़ूब ग़ज़ल कही है आपने । बधाई स्‍वीकार करें

चौथे श्‍ोर मे तकाबुले रदीफ हो गया है और छठे शेर में शायद मजमून की जगह मजबून टाईप हो गया है देख लीजियेगा ।सादर

Comment by Mohit mukt on Monday

आदरणीय नवीन मणि त्रिपाठी जी  शेर दर शेर दाद के साथ दिल छूती ग़ज़ल के लिए दिल से बधाई 

Comment by Mohammed Arif on Sunday
आदरणीय नवीन मणि त्रिपाठी जी आदाब, बहुत ख़ूब ग़ज़ल कही है आपने । शेर दर शेर दाद के साथ मुबारक़बाद क़ुबूल कीजिए ।

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