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ससुराल की पहली होली(हास्य कविता)राहिला

करेंगें दम से खूब धमाल,
इक दिन आगे पहुंचे ससुराल।
पहली होली संग साली के,
सोच के हो गये गुलाबी गाल।।

हुयी रात जो घोड़े बेचे,
सो गये हम ,चादर को खेंचे।
ले कालौंच,खड़िया और गेरू,
बैठी चौकड़ी,खाट के नीचे।

हो गयी शुरू ,रात से होली ,
इधर अकेले ,उधर हुल्लड़ टोली,
गब्बर सिंह बन,देख के खुद को
भूल गये सब हंसी ठिठोली ।

खूब उड़ा फिर अबीर ,गुलाल
मुंह काला ,अंग पीला लाल,
पकड़ ,पकड़ के ऐसा पोता
उड़ गये तोते देख धमाल।।

कम ना निकला ,छोटा साला,
इक नंबर का खोटा साला।
तोड़ भरोसा ,मिल गया उनमें ,
बिन पैंदी का लोटा साला।।

मान ,मनौअल खिले पकवान,
सेवा में हाज़िर सब शैतान।
नमक मिर्च से भर गिलौरी,
दे गयी साली बना के पान।।

ज्यों ही हमने पान चबाया,
खाया पिया सब बाहर आया ।
थू थू करें,तो कहें साली जी,
कहो जीजाजी मज़ा तो आया।।

छुड़ाने बैठे जो रंग गुलाल,
घिस ,घिस अंग,हुये बेहाल।
ज्यौं शैम्पू बालों पर उढेला
भरा था रंग,फिर हो गये लाल।।

नहा कर जैसे ,बाहर को आये ,
दर्जन भर सालियाँ देख ,घबराये।
छोटी, बड़ी गाँव की पूरी,
ससुरी बैठीं घात लगाये।।

डामर,गोबर ,रंग ,पिचकरी,
लगा गयीं सब बारी,बारी
बना बिजुका ,लगा डिठूला
फिर सिक्कों से नजर उतारी।

धरी रह गयी सब होशियारी
साले ,साली पड़ गये भारी।
गाँव की होली बड़ी जबर
आपबीती ,जनहित में जारी।।


मौलिक एंव अप्रकाशित

Views: 659

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Comment by Rahila on March 28, 2017 at 10:37pm
आदरणीय सुरेन्द्र नाथ जी!बहुत आभार रचना को पसंद करने के लिए। सादर
Comment by Rahila on March 28, 2017 at 10:36pm
आदरणीय बृजेश जी!बहुत आभार रचना को पसंद करने के लिए। सादर
Comment by Rahila on March 28, 2017 at 10:35pm
आदरणीय सतविंदर जी !बहुत आभार रचना को पसंद करने के लिए। सादर
Comment by Rahila on March 28, 2017 at 10:34pm
आदरणीया प्रतिभा दी!बहुत आभार रचना को पसंद करने के लिए। सादर
Comment by Rahila on March 28, 2017 at 10:33pm
आदरणीय मोहित जी!आपका सुझाव वाकई बहुत अच्छा है ।मुझे इतने उपयुक्त शब्द सूझे ही नहीं ।आपका बहुत शुक्रिया रचना को पसंद करने तथा दोवारा उपस्थित होने के लिए ।सादर
Comment by सुरेन्द्र नाथ सिंह 'कुशक्षत्रप' on March 24, 2017 at 5:39am
बढ़िया हास्य के लिए राहिला जी सादर बधाई निवेदित
Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on March 23, 2017 at 5:13pm
हाहाहा वाह वाह आदरणीया बहुत ही शानदार चित्रण किया है..
Comment by सतविन्द्र कुमार राणा on March 22, 2017 at 2:22pm
आदरणीया राहिला जी,हार्दिक बधाई इस होली-ठिठोली के लिए!
Comment by pratibha pande on March 22, 2017 at 12:02pm

आपबीती ,जनहित में जारी।।//    हो ..हो .. ,होली के आठ दिन बाद फिर से भिगो दिया होली के रंग में आप की इस रचना ने ..मजा आ गया पढ़ कर   बधाई प्रिय राहिला जी 

Comment by Mohit mishra (mukt) on March 21, 2017 at 11:04pm

आदरणीया  राहिला जी मैं ज्यादा technically तो नहीं जानता पर
हो गयी शुरू ,रात से होली ,
इधर अकेले ,उधर हुल्लड़ टोली,
की जगह। ......
हो गयी शुरू ,रात से होली ,
इत अकेले ,उत हुल्लड़ टोली,
होता तो मजा दुगना हो जाता. परंतु यह मेरी राय है और मैं खुद आपके सामने नौसिखिया हूं , अतएव मैं चाहूंगा और ज्ञानी जन इसपर मार्गदर्शन करें ।
गुस्ताख़ी माफ़ी के साथ सादर

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