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भोजपुरी साहित्य

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Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on April 14, 2015 at 9:56pm

आदरणीय मनन कुमार जी, आप अपनी रचना सामान्य टिप्पणी बॉक्स में पोस्ट कर दिए हैं जबकि आपको अपनी रचना ऊपर में +Add a Discussion विकल्प को क्लिक कर पोस्ट करनी चाहिए, वहां आपको एडिट ऑप्शन भी मिलेगा. एक बात और ध्यान रखें कि रचना के नीचे "मौलिक एवं अप्रकाशित" अवश्य लिखें. सादर.

Comment by Manan Kumar singh on April 14, 2015 at 7:13pm
एडिट कैसे करें यह पता नहीं चल रहा है।
Comment by Manan Kumar singh on April 10, 2015 at 7:26pm
भोजपुरी गजल
मनब कि ना मनब, बेशी अगरइब?
आइल बुढ़ापा,अब गरहा में जइब।
खोज तार फूल अब कहाँ लेकेे जइब?
नजर धुंधला गइल,सुँघब कि सटइब?
बेरी-बेरी हो छेदी,काहे तू तुड़ात बाड़?
अब कवना देवी के फूल तू चढ़इब?
बेदी-बेदी घूम अइल,का भइल कह ना?
अब कवन बेदी जाके फेर अझुरइब?
सुन मान बात,छोड़ द लगावल पायेंत,
नयकिन के नजर पड़ी,खूब धसोरइब।
कॉपी@मनन
Comment by PRAMOD SRIVASTAVA on May 29, 2014 at 5:26pm

dhanyavaad Shyam Narayan Verma ji.

Comment by Shyam Narain Verma on May 15, 2014 at 4:23pm
सुन्दर गीत रचना के लिए बधाई....
Comment by PRAMOD SRIVASTAVA on May 15, 2014 at 4:19pm

गीत
दिनवा ओराये लागल
रतिया हेराए लागल
बुते लागल असरा क. बरल. तु दियना
कह. अइब. कबले, लागे मोर जिय ना
का ओही देसवा मा-
बाटे, जे बिलमि गइल.
मइया क. बूढउती क.
बने तु अलमि गइल..
दूजि क. चाँद भइल. ,आंखी मोर सावना
कह. अइब. कबले, लागे मोर जिय ना

खेल कूद, लिखा पढ़ी
सबकर गवाही बा
इहवें क. धुरिया तोहरे
पोर-पोर समाइल बा
कइसे से उखरल बाबा दुलरवा क. सियना
कह. अइब. कबले, लागे मोर जिय ना

आम बउरे, मेघा चुये
माटी सोंधियाइल फेरू
कोयलिया क. कुहूक से 
गूँजल अमराई फेरू
जोहे चउपाल, टोला, राह, साथी, संगना
कह. अइब. कबले, लागे मोर जिय ना

घरे घरे लट्टू,टीवी
डहर. कोलतारी
गाँव मनरेगा,चलल
विकास क. बयारी
गवई शहराए लागल, जाइ बाँच. सुगना
कि आइ हिये लाग. ना
कह. अइब. कबले, लागे मोर जिय ना
प्रमोद श्रीवास्तव, लखनऊ

 (मौलिक एवम् अप्रकाशित)

Comment by Shyam Narain Verma on May 7, 2013 at 12:38pm
गीत |
बहियाँ छोड़ा के जाल राजा  , मानेल ना  कहना हमार |
डार्लिंग दगाबाजी कईल , काहें करवल गवना हमार |, 
केकरा से आग मान्गबी , केकरा से मान्गबी  पानी |
केकरा से प्यार मान्गबी , चढ़ल बा जवानी | 
काहें करेल मनमानी सईयाँ , तोडी के जाल हियरा हमार |
डार्लिंग दगाबाजी कईल , काहें करवल गवना हमार |, 
रोके तोहके खनकत चूड़ी , रोके  तोहक कंगना |
हमरा के छोडी के जाल , सूना कईके अंगना |
ना सुनेल कवनो निहोरा , करेल ना मन में विचार  |
डार्लिंग दगाबाजी कईल , काहें करवल गवना हमार |, 
अब जब जईब पीया , कईसे बीती रतिया |
संगवा में के करी  ,  मीठी मीठी बतिया  |
वर्मा तोहरा पईयाँ पडीं , सुनिल अरजिया हमार |
डार्लिंग दगाबाजी कईल , काहें करवल गवना हमार |, 
श्याम नारायण वर्मा 
(मौलिक व अप्रकाशित)
Comment by Brij kishor Chaubey on February 23, 2013 at 5:02pm
बरसे नयन नादानी मे

सब जानल पहचानल भुईया
धांगल ह बचकानी मे
अब काहे अबूझ अनजानी 
लागे देखी जवानी मे .................
कातना लुका छुप्पी खेलनी 
बूझत बूझ पलानी मे 
माई के तावा के रोटी 
लुटत भाग चुहानी मे.....................
अल्लहड़ पन के छुवा छूवौवल
डुबकी मारी के पानी मे
सोचत सिहरन उठे देह
मन भटकल कथा कहानी मे.........................
सब कुछ बदलल बदलल लागे
घर दुआर बगवानी मे
भागे दूर देखी सब लरिका
का अइहे अगवानी मे.....................
देखनी धानी चुनरी ओढ़े
सजनी ठाढ़ दलानी मे
का बृज कही न फूटे बानी
बरसे नयन नादानी मे......................
Photo: बरसे नयन नादानी मे सब जानल पहचानल भुईया धांगल ह बचकानी मे अब काहे अबूझ अनजानी लागे देखी जवानी मे ................. कातना लुका छुप्पी खेलनी बूझत बूझ पलानी मे माई के तावा के रोटी लुटत भाग चुहानी मे..................... अल्लहड़ पन के छुवा छूवौवल डुबकी मारी के पानी मे सोचत सिहरन उठे देह मन भटकल कथा कहानी मे......................... सब कुछ बदलल बदलल लागे घर दुआर बगवानी मे भागे दूर देखी सब लरिका का अइहे अगवानी मे..................... देखनी धानी चुनरी ओढ़े सजनी ठाढ़ दलानी मे का बृज कही न फूटे बानी बरसे नयन नादानी मे......................
Comment by एम. के. पाण्डेय "निल्को" on January 18, 2013 at 12:51pm

बहुत नीमन लागता, पहली बार ऐजा आइल बानी ........ अद्भुत ........ बधाई आ शुभकामना बा ओपेन बुक्स ऑनलाइन के की उ अइसन मंच बनावलस । 

Comment by Admin on December 18, 2012 at 7:24pm

आदरणीया मंजरी पाण्डेय जी आपकी रचना कमेंट बॉक्स में  हो गई है , कृपया यह रचना कमेंट बॉक्स के ऊपर बने +Add Discussion बटन को क्लिक कर पोस्ट करें ।

 
 
 

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