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गजल(दूकानें सजी हैं.....)

गजल#(नोट बंदी के फलितार्थ)-7

* एक वार्त्तालाप*

******************************

दुकानें सजी हैं ,दिखाते खरीदो,

कहें बंद जिनकी,चलो अब कहीं तो।1(आज का सच)



अभी दौर मुश्किल हुआ जा रहा है,

उठेगी ही अर्थी,ठहर भर घड़ी तो।2(चेतावनी)



बुझे रात के सब मुसाफिर सुबह तक,

जलाती बहुत है प्रखरता मुरीदो!3(अनुभूति)



बड़े जोड़ से तो बटोरे थे' टुकड़े

जलाना, बहाना अखरता मुरीदो!4(आत्मकथ्य)



हुआ ही कहाँ कुछ?बता दो बखत है,

बचा है वसन बिन नहाना… Continue

Added by Manan Kumar singh on November 27, 2016 at 3:30pm — 8 Comments

खोट के नोट (लघुकथा)

"देखो नम्मो, तू रोज़ाना की तरह उसी रास्ते से अपनी बस्ती में पहुँच कर ये नोट सिर्फ़ झुग्गियों में रहने वाली समझदार औरतों को सारी बात अच्छे से समझा कर बांट देना!" बबीता ने अपनी दूधवाली के दूध के डिब्बे में पुराने पाँच सौ के कुछ नोट भरते हुए कहा- "हमारे नहीं, तो तुम्हारे जैसों के ही काम आ जायें, तो कुछ तसल्ली मिले!"



नम्मो अपने बीमार बेटे को गोदी में लेकर मालकिन के कहे मुताबिक़ अपनी बस्ती की ओर जाने लगी। रास्ते में बदहवास हालत में एक आदमी अपनी साइकल खड़ी कर, भूख से तड़पते अपने बच्चे की… Continue

Added by Sheikh Shahzad Usmani on November 26, 2016 at 11:00pm — 9 Comments

चमक धमक (कविता)

चमक धमक

चमक धमक को समझ बैठे
तरक्की की सीढियाँ
चलते रहे चका चौंध के पीछे
इंसानियत को भी गवां बैठे ।


तेज़ रौशनी में छुपे अँधेरे को
समझ न सके पैर डगमगा गए
लोटने का रास्ता भी न मिला
खुद ही खुद को गवां बैठे ।


मौलिक एवं अप्रकाशित

Added by KALPANA BHATT ('रौनक़') on November 26, 2016 at 8:40pm — 2 Comments

"झिलमिल धूप"/कविता - अर्पणा शर्मा, भोपाल

सर्द सिहराती शिशिर की सुबह,

भेदकर कर कोहरे की नजर,

ओसकणों को चुंबन देकर,

मेरे आँगन धूप उतर आई थी ,

गुनगुनी, ऊष्म, स्नेहिल ज्यों

एक प्रेमालिंगन ले आई थी,

रूपहली-सुनहरी सुरमाई सी,

सूर्य वधु ज्यों प्रातः लेती अंगड़ाई सी,



ये दुछत्ती खिल जाये प्यारी,

महके छोटी सी मेरी फुलवारी,

धूप ने धूम मचाई थी,

चंपा, चमेली, सेवंती की बहार सी,

गेंदे, गुलाब, हरसिंगार भी,

ज्यों सुंदरी रंगीली चुलबुलाई सी,



धूप घुस आती हर दर्रे… Continue

Added by Arpana Sharma on November 26, 2016 at 4:21pm — 8 Comments

चलना ही सीखना है तो ठोकर तलाश कर (ग़ज़ल)

221 2121 1221 212



दुनिया को छोड़ पहले ख़ुद अंदर तलाश कर

ऊंचे से इस मकान में इक घर तलाश कर



हमवार फ़र्श छोड़ के पत्थर तलाश कर

चलना ही सीखना है तो ठोकर तलाश कर



ख़ुद को जला के देख जो सच की तलाश है

किस ने तुझे कहा कि पयम्बर तलाश कर



हरियालियां निगल के उगलता है कंकरीट

इस वक़्त किस तरफ़ है वो अजगर, तलाश कर



तेरा सफ़र में साथ निभाए तमाम उम्र

ए ज़ीस्त कोई ऐसा भी रहबर तलाश कर



*जय* प्यास ही से प्यास का मिट सकता है… Continue

Added by जयनित कुमार मेहता on November 26, 2016 at 1:18pm — 11 Comments

केवल तुम

51

केवल तुम

=======

मैं बार बार मन ही मन हर्षित सा होता हॅूं,

हर ओर तुम्हारा ही तो अभिनन्दन है।

मन मिलने को आतुर फिर भी कुछ डर है सूनापन है,

हर साॅंस बनाती नव लय पर संगीत अनोखी धड़कन है,

अब तो हर द्वारे आहट पर तेरा ही अवलोकन है,

मैं इसीलिये नवगीत कंठ करता रहता हॅूं

हर शब्द में बस तेरा ही तो आवाहन है।

मन की राह बनाकर इन नैनों के सुमन बिछाये हैं,

मधुर मिलन की आस लिये ये अधर सहज मुस्काये हैं,

हर पल बढ़ते संवेदन…

Continue

Added by Dr T R Sukul on November 26, 2016 at 12:45pm — 6 Comments

प्यार में हम भी हद से गुज़र जायेंगे - बैजनाथ शर्मा 'मिंटू'

अरकान – 212 2    122   122   12

काले बादल कभी जब बिखर जायेंगे |

ए नजारे भी बेशक बदल जायेंगे |

 

मुस्कुरा के ना देखो हमें आज यूँ,

दिल के अरमाँ हमारे मचल जायेंगे|

 

हमको मारो न खंज़र से ऐ महज़बी,

रूठ जाओ तो हम यूँ ही मर जायेंगे|

 

आके देखो कभी तुम हमारी गली,

ए इरादे तुम्हारे बदल जायेंगे|

 

लैला-मजनू हैं क्या शीरी फरहाद क्या,

प्यार में हम भी हद से गुज़र जायेंगे|

 

संग दिल हैं वे…

Continue

Added by DR. BAIJNATH SHARMA'MINTU' on November 25, 2016 at 11:30am — 4 Comments

घूंघट की ओट में .....

घूंघट की ओट में .....

खो गयी
एक गुड़िया
घूंघट की ओट में


बन गयी
वो एक दुल्हन
घूंघट की ओट में


ख़्वाबों का
शृंगार हुआ
घूंघट की ओट में


थम थम के
छुअन बढ़ी
घूंघट की ओट में


सब कुछ
मिला उसे
घूंघट की ओट में


बस
मिल न पाया
उसे एक दिल
घूंघट की ओट में

सुशील सरना

मौलिक एवम अप्रकाशित 

Added by Sushil Sarna on November 24, 2016 at 8:31pm — 10 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
तरही ग़ज़ल --बेहोश इक नजर में हुई अंजुमन तमाम ( राज )

221   2121  1221   212/2121 

पर्दा जो उठ गया तो हुआ काला धन तमाम

चोरों की ख्वाहिशों के जले तन बदन तमाम

 

बरसों से जो महकते रहे भ्रष्ट इत्र  से

इक घाट पे धुले वो सभी पैरहन तमाम

 

बावक्त असलियत का मुखौटा उतर गया

किरदार का वजूद हुआ दफ़अतन तमाम

 

ये बंद खिड़कियाँ जो खुली, पस्त हो गई    

सब झूट औ फरेब की बदबू घुटन तमाम 

 

परवाज पर लगाम जो माली ने डाल दी

भँवरे का हो गया वो तभी बाँकपन…

Continue

Added by rajesh kumari on November 24, 2016 at 7:37pm — 26 Comments

ग़ज़ल (पुराने अंदाज़ में) // रवि प्रकाश

ग़ज़ल (पुराने अंदाज़ में)

बहर-SSSSSSSSSSS



जीवन का एकाकीपन मिट जावेगा

आन मिलेंगे पी तो मन इतरावेगा।

  आ जावेंगे बिछुड़े संगी-साथी भी

  कौन कहाँ लौं मन ऐसे तरसावेगा।

जब निरखेंगे नैन किसी के नेह भरे

झूलों का मौसम फिर से फिर आवेगा।

  परसेगा कब तक शून्य हमारी निद्रा

  अब तो कोई सपना दर खटकावेगा।

मन हुलसेगा सावन के पहले घन सा

झूमेगा,हर ओर सुधा बरसावेगा।

  खो देंगे हम भी उस पल सारी निजता

  रंग किसी का जब हस्ती पे छावेगा।

जी ही… Continue

Added by Ravi Prakash on November 24, 2016 at 1:42pm — 4 Comments

बढ़ रहा दर्द है औ दवा कुछ नहीं/सतविन्द्र कुमार राणा

212 212 212 212

बढ़ रहा दर्द है औ दवा कुछ नहीं

फिर भी होठों पे तेरे दुआ कुछ नहीं।



मर मिटा एक मुफ़लिस किसी शौक से

पर अमीरी नजर में हुआ कुछ नहीं।



हौंसलों से बनें काम सब जान लो

बुज़दिली से कभी तो बना कुछ नहीं।



बस तग़ाफ़ुल तेरा है बड़ा कीमती

इश्क से वास्ता अब रहा कुछ नहीं।



काम आलिम का होता बड़ा साथियो

सीखना उन बिना तो हुआ कुछ नहीं।



ज्यों जिए जा रहे बढ़ रही हसरतें

*जिंदगी हसरतों के सिवा कुछ नहीं।*



हर तरफ इस… Continue

Added by सतविन्द्र कुमार राणा on November 24, 2016 at 9:59am — 16 Comments

रिश्ते कबाड़ मन में पड़े सड़ रहे थे सब- पंकज द्वारा ग़ज़ल

मस्तिष्क की गली से तू गुज़रा अभी अभी
सोया था दिल जो मेरा वो धड़का अभी अभी

रिश्ते कबाड़, मन में पड़े सड़ रहे थे सब
दीपोत्सव से पहले बहाया अभी अभी

उस्से मिला तो जाना भला कोहेनूर क्या
भटका पथिक मैं राह पे लौटा अभी अभी

सब वक्त का तकाज़ा है सत्ता औ सुल्तनत
सबको सिखा गया है रुपैया अभी अभी

अब नींद आ रही है चलो फिर मिलेंगे कल
सन्देश सबको मैंने ये भेजा अभी अभी

मौलिक अप्रकाशित

Added by Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" on November 23, 2016 at 9:43pm — 7 Comments

ग़ज़ल ( एक मुस्कान से जो मर जाए )

फाइलातुन -मफाइलुन -फेलुन

उनके चेहरे पे जो नज़र जाए |

मुस्तक़िल वो वहीं ठहर जाए |

उसपे तुमने उठा लिया खंजर

एक मुस्कान से जो मर जाए |

मैकदा है इधर नज़र है उधर

कोई जाए तो अब किधर जाए |

इक परिंदा भी जा सके न जहाँ

कौन लेकर वहाँ खबर जाए |

बात है देश की हिफ़ाज़त की

क्या गरज है हमारा सर जाए |

जो जबां कर सके न उल्फ़त में

काम वो इक निगाह कर जाए |

पानी पानी घटाएँ…

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Added by Tasdiq Ahmed Khan on November 23, 2016 at 9:30pm — 14 Comments

ग़ज़ल: असर दिखा है जमाने में खास बातों का

1212 1122 1212 22(112)



असर दिखा है जमाने में खास बातों का ।

मिटा है खूब खज़ाना रईजादों का ।।



है फ़िक्र उस को नसीहत रुला गई यारों ।

गया है चैन , सुना है तमाम रातों का ।।



लुटे थे लोग जो अपने गरीबखानों से ।

हिसाब मांग रहे है वही हजारों का ।।



न पूछिए की चुनावों में हाल क्या होगा ।

बड़ा अजीब नज़ारा है इन सितारों का ।।



सफ़ेद पोश से पर्दा हटा गया कोई ।

पता चला है लुटेरों के हर ठिकानों का ।।



गरीब…

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Added by Naveen Mani Tripathi on November 23, 2016 at 8:30pm — 5 Comments

नमक का विधाता

सात नदियाँ मिलती हैं

गुजरात के कच्छ में

समुद्र से

 

उस स्थल पर

जिसे ‘रण’ कहते है

और जहां सबसे खारा होता है 

समुद्र का पानी

नमक बनाने के लिए

जिसे हम लवण भी कहते है

और इसी से बनता है

एक मोहक शब्द

लावण्य

जो प्रकट करता है

मनुष्य के जीवन और उसके रंगों में

नमक की महत्ता, उपादेयता और स्वाद

 

पर

कभी किसी ने सोचा है गोर्की की भाँति

कि किस संत्रास में जीते है

नमक…

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Added by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on November 23, 2016 at 8:00pm — 7 Comments

चाँद का मिलना - व्यंग्य

ठहाकों की आवाज़ से कमरा गूंज रहा था, आज बहुत सालों बाद रीमा का सहपाठी रोहन उससे मिलने आया था| पिछले दो घंटे से पिछले १५ सालों की बातें दोनों एक दूसरे को बता रहे थे और साथ पढ़े बाकी दोस्तों के बारे में भी एक दूसरे को बताते जा रहे थे| रीमा ने रमेश को भी बता दिया था कि ऑफिस से जल्दी आ जाना और उसने हामी भर दी थी|

अचानक बात का सिलसिला कॉलेज के जमाने के शौक के बारे में चल निकला| रोहन ने एक गहरी सांस ली और अपने सर पर हाथ फेरते हुए बोला "यार, तुम्हारी एक आदत मुझे अब भी नहीं भूलती| कितना चिढ़ती थी…

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Added by विनय कुमार on November 23, 2016 at 7:00pm — 4 Comments

ग़ज़ल - जिन्दगी फिर जिन्दगी लगने लगी

2122 2122 212 

जिन्दगी फिर जिन्दगी लगने लगी,
तुम मिले दुनिया नयी लगने लगी,

तुमने सींचा जब वफ़ा और प्यार से,
फिर जमीं दिल की हरी लगने लगी,

रात के कोसे में चमका चाँद जब,
हर घड़ी तेरी कमी लगने लगी,

तुमने देखा जब नज़र भर प्यार से,
रूह अपनी अज़नबी लगने लगी,

कबसे आँखों ने सहर देखी नहीं,
दीद तेरी लाजिमी लगने लगी..... !!अनुश्री!!

मौलिक और अप्रकाशित...

Added by Anita Maurya on November 23, 2016 at 4:30pm — 9 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
ग़ज़ल - तू वो ही है , जो सच में है तेरे अंदर ( गिरिराज भंडारी )

1222    1222    1222   

उसे कह दो जहाँ हूँ मैं वहाँ समझे

ज़मीं हूँ मैं, न मुझको आसमाँ समझे

 

हो किससे गुफ़्तगू इस दश्ते वीराँ में

कोई तो हो, जो मेरी भी ज़बाँ समझे

 

हक़ीक़त आशना है क्यूँ भला वो भी

है राहे संग उसको कहकशाँ समझे

 

छिनी रोटी तो छायी बद हवासी है

मुझे मयख़्वार क्यूँ सारा जहाँ समझे

 

मुहज़्ज़ब जो दबा लेता है नफरत, को

सही समझे अगर, आतिशफ़िशाँ समझे 

 

तू वो ही है , जो सच में है तेरे…

Continue

Added by गिरिराज भंडारी on November 23, 2016 at 11:05am — 26 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
किस ओर जाएँ हम कि हमें रास्ता मिले

221 2121 1221 212

किस ओर जाएँ हम कि हमें रास्ता मिले

फ़िरक़ापरस्ती का न कहीं फन उठा मिले

 

दिल इस जहान का अभी इतना बड़ा नहीं

हर हक़बयानी पर मेरा ही सर झुका मिले

 

नाज़ुक है मसअला ये अक़ीदत का…

Continue

Added by शिज्जु "शकूर" on November 23, 2016 at 11:00am — 17 Comments

ग़ज़ल- जितने सनम मिले सभी शादी शुदा मिले

221 2121 1221 212



ये सिलसिले भी इश्क के हमसे खफा मिले ।

अक्सर मेरे रकीब जमानत रिहा मिले ।।



किस्मत की बेवफाई जरा देखिये हुजूर ।

जितने सनम मिले सभी शादी शुदा मिले ।।



जब भी उठे नकाब हिदायत के नाम पर ।

क्यों लोग आईने में हक़ीक़त ज़ुदा मिले ।।



चर्चा , लिहाज़ उम्र का , उसको नही रहा ।

कुछ तितलियों के फेर में अक्सर फ़िदा मिले।।



अक्सर हबस के नाम पे मरता है आदमी ।

मासूम सी अदा में ढ़ले बेवफा मिले ।।…



Continue

Added by Naveen Mani Tripathi on November 22, 2016 at 11:30pm — 15 Comments

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