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जयनित कुमार मेहता
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  • India
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बृजेश कुमार 'ब्रज' commented on जयनित कुमार मेहता's blog post हम वो आईने नहीं हैं जो बिखर जाते हैं (ग़ज़ल)
"वाह आदरणीय बहुत ही खूबसूरत ग़ज़ल कही..बधाइयाँ"
Sunday

सदस्य कार्यकारिणी
गिरिराज भंडारी commented on जयनित कुमार मेहता's blog post हम वो आईने नहीं हैं जो बिखर जाते हैं (ग़ज़ल)
"आदरनीय जयनित भाई , अच्छी ग़ज़ल कही है हार्दिक बधाइयाँ । आ. नूर भाई और समर भाई की सलाह उचित हैं .. खयाल कीजियेगा ।"
Sunday

सदस्य कार्यकारिणी
शिज्जु "शकूर" commented on जयनित कुमार मेहता's blog post हम वो आईने नहीं हैं जो बिखर जाते हैं (ग़ज़ल)
"आ. जयनित भाई ग़ज़ल  पर तो सार्थक चर्चा हो गई है, मेरी तरफ से इस कोशिश के लिए बधाई"
Friday
Nilesh Shevgaonkar commented on जयनित कुमार मेहता's blog post हम वो आईने नहीं हैं जो बिखर जाते हैं (ग़ज़ल)
"आ. जयनीत भाई अच्छी ग़ज़ल के लिये बधाई ..समर सर की बातों   का संज्ञान लें ...हम वो आईने नहीं हैं जो बिखर जाते हैं.... यहाँ दो न साथ आने से शिकस्ते नारवा हो रहा है. साथ ही आईने के ने को गिराने से आईन बनता है जो सार्थक शब्द है अत: इसे गिराने से…"
Apr 20
Ravi Shukla commented on जयनित कुमार मेहता's blog post हम वो आईने नहीं हैं जो बिखर जाते हैं (ग़ज़ल)
"आदरणीय जयनित जी बढि़या गजल कही है आपने बधाई स्‍वीकार करें ।"
Apr 20
Rohit dobriyal"मल्हार" commented on जयनित कुमार मेहता's blog post हम वो आईने नहीं हैं जो बिखर जाते हैं (ग़ज़ल)
"आदरणीय जयनित भाई .....उम्दा ग़ज़ल के के शुक्रिया एवम बधाई ....."
Apr 20
सतविन्द्र कुमार commented on जयनित कुमार मेहता's blog post हम वो आईने नहीं हैं जो बिखर जाते हैं (ग़ज़ल)
"आदरणीय जयनित भाई,हारदिक बधाई स्वीकारें इस उम्दा गजल के लिए!"
Apr 19
Samar kabeer commented on जयनित कुमार मेहता's blog post हम वो आईने नहीं हैं जो बिखर जाते हैं (ग़ज़ल)
"जनाब जयनित कुमार मेहता जी आदाब,ग़ज़ल का प्रयास अच्छा है,दाद के साथ मुबारकबाद पेश करता हूँ । कई अशआर में अल्फ़ाज़ की बंदिश चुस्त नहीं है,मतले का ऊला मिसरा :- 'संग जितने सहें उतना ही सँवर जाते हैं' इस मिसरे में 'संग'के साथ…"
Apr 19
जयनित कुमार मेहता posted a blog post

हम वो आईने नहीं हैं जो बिखर जाते हैं (ग़ज़ल)

2122 1122 1122 22संग जितने सहें उतना ही सँवर जाते हैंहम वो आईने नहीं हैं जो बिखर जाते हैंशाम ढलते ही निगाहों से गुज़र जाते हैंसारे मंज़र जो कभी दिल में ठहर जाते हैंदेखता मैं भी उधर जा के, जिधर जाते हैंरोज़-के-रोज़ कहाँ शम्स-ओ-क़मर जाते हैंसहरा-ए-इश्क़ में हो जाता है दरिया का भरमइसी ग़फ़लत में कई लोग उधर जाते हैंहिज्र तो ज़रिया है जलने का चराग़-ए-उम्मीदहम तो बस वस्ल का ही सोच के डर जाते हैंजब पहुँचना ही नहीं ज़ीस्त की गाड़ी को कहींचलो ऐसा करें, गाड़ी से उतर जाते हैंपारस-ए-इश्क़ का इक लम्स जिन्हें मिल जाएहिज्र…See More
Apr 19

सदस्य कार्यकारिणी
गिरिराज भंडारी commented on जयनित कुमार मेहता's blog post हमने सांसें भी गिरवी रख दी हैं (ग़ज़ल)
"आदरनीय जयनित भाई , अच्छी गज़ल कही , बधाइयाँ स्वीकार करें ।  महज़ की मात्रिकता  12 या 21 .. क्या हो ये सोचने लायक बात है ।"
Mar 21
Ravi Shukla commented on जयनित कुमार मेहता's blog post हमने सांसें भी गिरवी रख दी हैं (ग़ज़ल)
"आदरणीय जयनित जी बडि़या गजल कही है आपने नींद भी रात भी तुम्‍हारी है बहुत खूब  बधाई स्‍वीकार करें"
Mar 21
बृजेश कुमार 'ब्रज' commented on जयनित कुमार मेहता's blog post हमने सांसें भी गिरवी रख दी हैं (ग़ज़ल)
"वाह बहुत खूबसूरत गजल"
Mar 19
सतविन्द्र कुमार commented on जयनित कुमार मेहता's blog post हमने सांसें भी गिरवी रख दी हैं (ग़ज़ल)
"आदरणीय जयनित भाई,बेहतरीन अशआर हुए हैं तहेदिल मुबारकबाद"
Mar 18
Mohammed Arif commented on जयनित कुमार मेहता's blog post हमने सांसें भी गिरवी रख दी हैं (ग़ज़ल)
"आदरणीय जयनित कुमार जी आदाब, हर शेर उम्दा । दाद के साथ मुबारक़बाद क़ुबूल कीजिए ।"
Mar 17
जयनित कुमार मेहता posted a blog post

हमने सांसें भी गिरवी रख दी हैं (ग़ज़ल)

2122 1212 22मुझको सच कहने की बीमारी हैइसलिए तो ये संगबारी हैअपने हिस्से में मह्ज़ ख़्वाब हैं,बस!नींद भी, रात भी तुम्हारी हैएक अरसे की बेक़रारी परवस्ल का एक पल ही भारी हैचीरती जाती है मिरे दिल कोयाद तेरी है या कि आरी है?हमने साँसें भी गिरवी रख दी हैंअब तो ये ज़िन्दगी उधारी हैसब तो वाकिफ़ हैं आखिरी सच सेकिसलिए फिर ये मारा-मारी है?नींद का कुछ अता-पता तो नहींरात है, ख़्वाब हैं, ख़ुमारी है।(मौलिक व अप्रकाशित)See More
Mar 17
जयनित कुमार मेहता posted a blog post

अभी शे'र हमने सुनाया कहाँ है (ग़ज़ल)

122   122   122   122है हर सू फ़क़त धूप,साया कहाँ है?ये आख़िर मुझे इश्क़ लाया कहाँ है!अमीरी को अपनी दिखाया कहाँ है?तुम्हें शह्र-ए-दिल ये घुमाया कहाँ है?अभी सहरा में एक दरिया बहेगाअभी क़ह्र अश्क़ों ने ढाया कहाँ है?अभी देखिएगा अँधेरों की हालतउफ़ुक़ पर अभी शम्स आया कहाँ है?कोई दोस्त है,कोई दुश्मन,यहाँ परसब अपने हैं,कोई पराया कहाँ है?अभी से ही क्यों आँख भर आई सबकी?अभी शे'र हमने सुनाया कहाँ है?(मौलिक व अप्रकाशित)See More
Mar 9

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Male
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Araria,Bihar
Native Place
Araria,Bihar
Profession
Student
About me
I'm simple..!

जयनित कुमार मेहता's Blog

हम वो आईने नहीं हैं जो बिखर जाते हैं (ग़ज़ल)

2122 1122 1122 22



संग जितने सहें उतना ही सँवर जाते हैं

हम वो आईने नहीं हैं जो बिखर जाते हैं



शाम ढलते ही निगाहों से गुज़र जाते हैं

सारे मंज़र जो कभी दिल में ठहर जाते हैं



देखता मैं भी उधर जा के, जिधर जाते हैं

रोज़-के-रोज़ कहाँ शम्स-ओ-क़मर जाते हैं



सहरा-ए-इश्क़ में हो जाता है दरिया का भरम

इसी ग़फ़लत में कई लोग उधर जाते हैं



हिज्र तो ज़रिया है जलने का चराग़-ए-उम्मीद

हम तो बस वस्ल का ही सोच के डर जाते हैं



जब पहुँचना ही… Continue

Posted on April 19, 2017 at 5:49pm — 8 Comments

हमने सांसें भी गिरवी रख दी हैं (ग़ज़ल)

2122 1212 22



मुझको सच कहने की बीमारी है

इसलिए तो ये संगबारी है



अपने हिस्से में मह्ज़ ख़्वाब हैं,बस!

नींद भी, रात भी तुम्हारी है



एक अरसे की बेक़रारी पर

वस्ल का एक पल ही भारी है



चीरती जाती है मिरे दिल को

याद तेरी है या कि आरी है?



हमने साँसें भी गिरवी रख दी हैं

अब तो ये ज़िन्दगी उधारी है



सब तो वाकिफ़ हैं आखिरी सच से

किसलिए फिर ये मारा-मारी है?



नींद का कुछ अता-पता तो नहीं

रात है, ख़्वाब हैं,… Continue

Posted on March 17, 2017 at 4:51pm — 5 Comments

अभी शे'र हमने सुनाया कहाँ है (ग़ज़ल)

122   122   122   122

है हर सू फ़क़त धूप,साया कहाँ है?

ये आख़िर मुझे इश्क़ लाया कहाँ है!

अमीरी को अपनी दिखाया कहाँ है?

तुम्हें शह्र-ए-दिल ये घुमाया कहाँ है?

अभी सहरा में एक दरिया बहेगा

अभी क़ह्र अश्क़ों ने ढाया कहाँ है?

अभी देखिएगा अँधेरों की हालत

उफ़ुक़ पर अभी शम्स आया कहाँ…

Continue

Posted on March 8, 2017 at 3:30pm — 6 Comments

गुलाब ऐसे ही थोड़ी गुलाब होता है (ग़ज़ल)

1212 1122 1212 22



क़दम-क़दम पे नुमाया सराब होता है

नज़र में दिखता है फिर चूर ख़्वाब होता है



नयी उमर में निगाहों में आब होता है

भड़क उठे जो यही इंक़िलाब होता है



दिलों की गुफ़्तगू भी क्या क़माल होती है

नज़र-नज़र में सवाल-ओ-जवाब होता है



अगर हो रब्त दिलों में तो दूरियां कैसी

ज़मीं से दूर बहुत आफ़ताब होता है



जो काटनी हों कभी हिज्र की सियाह शबें

हर इक ख़याल तेरा माहताब होता है



वो लोग चेहरों को पढ़ना सिखा रहे हम को

बजाय… Continue

Posted on February 22, 2017 at 3:38pm — 3 Comments

Comment Wall (5 comments)

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At 12:59pm on January 27, 2016, kanta roy said…

बेहद गर्व का पल  ! बहुत -बहुत बधाई आपको आदरणीय जयनित  जी  "महीने का सक्रिय सदस्य"  बनने हेतु। 

At 8:17pm on January 16, 2016, जयनित कुमार मेहता said…
आदरणीय गणेश जी,
इस सम्मान के लिए मैं OBO परिवार के प्रति हार्दिक आभार प्रकट करता हूँ।
At 8:13pm on January 16, 2016, जयनित कुमार मेहता said…
जन्मदिवस की शुभकामनाओं के लिए आपका बहुत-बहुत आभारी हूँ,आदरणीय रवि शुक्ला जी..

(विलम्ब से प्रत्युत्तर के लिए क्षमाप्रार्थी हूँ)
At 4:28pm on January 16, 2016,
मुख्य प्रबंधक
Er. Ganesh Jee "Bagi"
said…

आदरणीय

जयनित कुमार मेहता जी,
सादर अभिवादन,
यह बताते हुए मुझे बहुत ख़ुशी हो रही है कि ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार में विगत माह आपकी सक्रियता को देखते हुए OBO प्रबंधन ने आपको "महीने का सक्रिय सदस्य" (Active Member of the Month) घोषित किया है, बधाई स्वीकार करें | प्रशस्ति पत्र उपलब्ध कराने हेतु कृपया अपना पता एडमिन ओ बी ओ को उनके इ मेल admin@openbooksonline.com पर उपलब्ध करा दें | ध्यान रहे मेल उसी आई डी से भेजे जिससे ओ बी ओ सदस्यता प्राप्त की गई है |
हम सभी उम्मीद करते है कि आपका सहयोग इसी तरह से पूरे OBO परिवार को सदैव मिलता रहेगा |
सादर ।
आपका
गणेश जी "बागी"
संस्थापक सह मुख्य प्रबंधक
ओपन बुक्स ऑनलाइन

At 1:26pm on November 6, 2015, Ravi Shukla said…

जयनित जी जन्‍म दिन की बहुत बहुत शुभकामनाएं

 
 
 

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