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तरही गजल

1222 1222 122

कभी जिसमें कहीं अड़चन नहीं है
हो कुछ भी वो मग़र जीवन नहीं है

तराशा जाए तो पत्थर भी चमके
तपाए बिन कोई कुंदन नहीं है

बिना उलझे नहीं आता सुलझना
मज़ा ही क्या अगर उलझन नहीं है

अगर हैं जीतने की ख़्वाहिशें तो
न सोचो हारने का मन नहीं है

बहारें हर तरफ़ आने लगी हैं
खिला इक बस मेरा गुलशन नहीं है

नहीं अनबन, नहीं शिकवा ही कोई
*बस इतना है कि अब वो मन नहीं है*

मौलिक एवम अप्रकाशित

Added by सतविन्द्र कुमार राणा on October 11, 2017 at 11:30pm — 10 Comments

सवालों का पंछी सताता बहुत है-गीत

मुझे रात भर ये भगाता बहुत है।

सवालों का पंछी सताता बहुत है।।

कभी भूख से बिलबिलाता ये आए

कभी आँख पानी भरी ले के आए

कभी खूँ से लथपथ लुटी आबरू बन

तो आये कभी मेनका खूबरू बन

ये धड़कन को मेरी थकाता बहुत है

सवालों का पंछी सताता बहुत है।।1।।

कभी युद्ध की खुद वकालत करे ये

अचानक शहीदों की बेवा बने ये

कभी गर्भ अनचाहा कचरे में बनकर

मिले है कभी भ्रूण कन्या का बनकर

निगाहों को मेरी रुलाता बहुत…

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Added by Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" on October 11, 2017 at 9:30pm — 4 Comments

है कौन....”संतोष”

अरकान:-फ़ाइलातुन फ़इलातुन फ़्इलातुन फेलुन



है कहाँ, कौन है,कैसा वो नज़र आता है

ख़ुद में कम मुझ में ज़ियादा वो नज़र आता है



क्या तअल्लुक़ है मेरा उससे बताऊँ कैसे

हर दुआ में मुझे चहरा वो नज़र आता है



तिश्नगी जब मुझे दीदार की तड़पाये तो

ऐसे हालात में दरया वो नज़र आता है



घेर लेते हैं मुझे जब भी अँधेरे ग़म के

मेरा हमदर्द अकेला वो नज़र आता है



तुमने पूछा कभी'संतोष'से जाकर यारो

किसलिये भीड़ में तन्हा वो नज़र आता है

#संतोष

(मौलिक… Continue

Added by santosh khirwadkar on October 11, 2017 at 8:53pm — 8 Comments

ग़ज़ल: बलराम धाकड़

1222-1222-1222-1222

जनम होगा तो क्या होगा मरण होगा तो क्या होगा

तिमिर से जब भरा अंतःकरण होगा तो क्या होगा



हरिक घर से यूँ सीता का हरण होगा तो क्या होगा

फिर उसपे राम का वो आचरण होगा तो क्या होगा



मेरे अहले वतन सोचो जो रण होगा तो क्या होगा

महामारी का फिर जब संक्रमण होगा तो क्या होगा



वो ही ख़ैरात बांटेंगे वो ही एहसां जताएंगे

विमानों से निज़ामों का भ्रमण होगा तो क्या होगा



जमा साहस है सदियों से हमारी देह में अबतक

नसों…

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Added by Balram Dhakar on October 11, 2017 at 6:00pm — 16 Comments

ग़ज़ल: फूंकने को इसे बिजलियाँ आगईं

212/212/212/212



याद तुमने किया हिचकियाँ आगईं

दिल की तस्कीन को बदलियाँ आगईं।



ज़ेर ए तामीर था ये नशेमन मेंरा

फू़ंकने को इसे बिजलियाँ आगईं।



तू नहीं आसका हाल तेरा मगर

लेके अख़बार की सुर्ख़ियाँ आगईं।



जब तड़प कर गुलों ने पुकारा उन्हें

लब हसीं चूमने तितलियाँ आ गईं।



गर्म साँसों की औढ़ा दो मुझको रिदा

लौट कर फिर वो ही सर्दियाँ आ गईं।



चाह दिल में तेरे वस्ल की जब जगी

लम्स तेरा लिये चिट्ठियाँ आ गईं।…



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Added by Afroz 'sahr' on October 11, 2017 at 5:30pm — 7 Comments

ग़ज़ल- हिंदी तुकांत के साथ एक प्रयोग (..अण ,, क़ाफ़िये पर संभवत: पहली ग़ज़ल है इस मंच पर)

२२/२२/२२/२२/



कर्म अगर साधारण होगा

कैसे नर...नारायण होगा.

.

सच्चाई की राह चुनी है

पग पग दोषारोपण होगा.

.

जिस के भीतर विष का घट है  

उस पर छद्म-आवरण होगा.

.

कठिनाई भी बहुत ढीठ है  

इस से जीवन भर रण होगा.

.

बस्ती बाद में सुलगाएँगे  

पहले प्रेम पे भाषण होगा.   

.

मन में दृढ़ विश्वास न हो फिर  

कैसे कष्ट निवारण होगा.

.

दसों दिशाओं में शासन है

शासक .. शायद रावण होगा.

.

उजड़ेगा…

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Added by Nilesh Shevgaonkar on October 11, 2017 at 3:52pm — 29 Comments

मेघदूत (पूर्व मेघ खंड के 6 से 8 टेक छंदों का काव्यानुवाद)

विरहाकुल था दीन यक्ष उसको कुछ समझ नहीं आया

वारिवाह से गुह्य याचना ही करना उसको भाया

 

लोक-ख्यात पुष्कर-आवर्तक जलधर बड़े नाम वाले

उनके प्रिय वंशज हो तुम हे वारिवाह ! काले-काले

 

प्रकृति पुरुष तुम कामरूप तुम इन्द्रसखा तुमको जानूं

विधिवश प्रिय से हुआ दूर हूँ तुम्हे मीत हितकर मानूं

 

तुम यथार्थ परिजन्य मूर्त्त हो मैं…

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Added by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on October 11, 2017 at 11:00am — 4 Comments

ग़ज़ल

2122 1212 22

उस से मिलकर तुझे हुआ क्या है ।

पूछते लोग माजरा क्या है ।।



सच बताने पे आप क्यूँ रोये ।

आइने से हुई ख़ता क्या है ।।



है तबस्सुम का राज क्या उनके ।

आंख में गौर से पढा क्या है ।।



अश्क़ हैं बेहिसाब हिस्से में ।

ज़श्न के वास्ते बचा क्या है ।।



इस तरह रोकिये नहीं मुझको ।

पूछिये मत मेरा पता क्या है ।।



आप मतलब की बात करते हैं ।

आपके साथ फायदा क्या है ।।



छोड़िये बात आप भी उसकी ।

उसकी बातों में… Continue

Added by Naveen Mani Tripathi on October 11, 2017 at 9:00am — 13 Comments

समय का चक्कर (कटाक्षिकाएँ)

(1) समय के
मोबाइल फोन पर
सिकुड़ती हुई
संवेदना के वायब्रेशन है ।
(2) समय के
जल की शिराओं में
भविष्य का दौड़ता
जल संकट है ।
(3) समय के
दाम्पत्य पर
अलगाव की
लकीरें है ।
(4) समय की कॉकटेल में
महानगर के
बीयर-बार में
नियॉन रोशनी में
तनाव मुक्ति की
शराब उडेली
जा रही है ।
मौलिक एवं अप्रकाशित ।

Added by Mohammed Arif on October 10, 2017 at 11:32pm — 16 Comments

जागे हिंदुस्तान/ गीत

जीवन डगर बहुत पथरीली

संभलो मनुज सुजान,

जागे हिंदुस्तान हमारा जागे हिंदुस्तान।



हिन्दू मुस्लिम भाई भाई प्रेम का धागा टूट गया।

न जाने कितनी माँगो का फिर से ईंगुर रूठ गया।

मानवता जब दानवता की चरण पादुका धोती है,

तभी मालदा वाली घटना तभी पूर्णिया रोती है।



धर्म के पहरेदारों बोलो,

कब लोगे संज्ञान।।

जागे--------



संस्कार की नींव हिल गयी बिका हुस्न बाजरों में।

कर्णधार जो बनकर आये लिप्त हुए व्यभिचारों में।

जाति पांति के भेदभाव…

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Added by CA (Dr.)SHAILENDRA SINGH 'MRIDU' on October 10, 2017 at 9:30pm — 8 Comments


सदस्य टीम प्रबंधन
अम्बर के विस्तार सरीखे मेरे पापा // डॉ० प्राची

शुचित यज्ञ सी

मन प्राणों में घोल सुगन्धि,

आँगन में त्यौहार सरीखे मेरे पापा...



थाम अँगुलियाँ जिनकी

हर उलझी पगडण्डी लगी सरल सी,

ज़मी किरचियाँ व्यवहारों की

पिघल हृदय से बहीं तरल सी,



सबकी ख़ातिर बोए पग-पग

गुलमोहर और छाँटे कीकर,

सौंपी सबको ख़ुशियों की प्याली

ख़ुद पी हर व्यथा गरल सी,



फिर भी…

Continue

Added by Dr.Prachi Singh on October 10, 2017 at 9:30pm — 7 Comments

गजल(इक गजल की शाम हो तुम...)

2122 2122
--------------------
इक गजल की शाम हो तुम
धड़कनें गुमनाम हो तुम।1

ख्वाहिशों की संगिनी हो
नींद हो ,आराम हो तुम।2

ढूँढ़ता तब से रहा मैं
ख्वाहिशे-आवाम हो तुम।3

घोल दे जो कान में रस
वह सहज-सा नाम हो तुम।4

राधिका हो तुम किशन की
बीन मेरी,'साम' हो तुम।5

टूटता है जब मनोरथ
उस घड़ी में काम हो तुम।6

भागता फिरता बटोही
बस सुफल इक धाम हो तुम।7
"मौलिक व अप्रकाशित"

Added by Manan Kumar singh on October 10, 2017 at 7:30pm — 6 Comments

सिसकते बल्ब (लघुकथा) /शेख़ शहज़ाद उस्मानी

"कमली, तू तो करवा चौथ के दूसरे दिन भी काफी सुंदर लग रही है, सजी-धजी सी!"

मेम साहब की यह टिप्पणी सुनकर कमली उनके कमरे में और अच्छी तरह से झाड़ू लगाने लगी।

"छोड़ ये झाड़ू-पोंछा.. आ बैठ यहां!" कमली का हाथ खींच कर उसे सोफे पर बैठा कर मेम साहब ने पूछा - "सच, बहुत सुंदर और ख़ुश दिख रही है तू!"

"पर आपके सामने हम कहां!"

"चुप्प! छोड़ ऐसी बातें! अच्छा ये बता, तू कितने वाट की है?"

"वाट!"

"हां, कितना वोल्टेज है तुझ में?" इतना कहकर मेम साहब फफक-फफक कर रोने लगी।

उनके ही… Continue

Added by Sheikh Shahzad Usmani on October 10, 2017 at 6:38pm — 4 Comments

राज़ नवादवी: एक अपरिचित कवि की कृतियाँ- ४६ (सब को धीरे धीरे मरना पड़ता है)

स्पेनिश कवि पाब्लो नेरुदा की कविता "You Start Dying Slowly" के हिन्दी अनुवाद से प्रेरित

सब को धीरे धीरे मरना पड़ता है

-----------------------------------------

सब को धीरे धीरे मरना पड़ता है

आप चाहे तुच्छ हों या हों आप महान

आप चाहे पत्थर हों, पेड़ हों

पशु हों, आदमी हों, या कोई साहिबे जहान

आप चाहे बुलंद हों या जोशे नातवान

 

सब को धीरे धीरे मरना पड़ता है

आप चाहे विनीत हों या कोई दहकता…

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Added by राज़ नवादवी on October 10, 2017 at 3:00pm — 10 Comments

अपने-पराये(लघुकथा)राहिला

"तुम्हारी सारे फैसलों से मैं हमेशा सहमत रहा हूँ । लेकिन आज इस फैसले से मैं कतई सहमत नहीं।आख़िर मेरी गैरहाजिरी में ऐसा क्या हुआ कि अचानक तुमने वहां वापसी की ज़िद पकड़ ली?बड़ी भाभी या सुषमा ,किसी ने कुछ कहा क्या?"



"...."



" कुछ तो बोल बिट्टो! क्या तू भूल गयी उन लोगों ने तेरे साथ कितना गलत किया था?"

" नहीं ..,कुछ नहीं भूली, लेकिन ये भी याद है कि इन सब के बाद वह अपने व्यवहार पर शर्मिंदा भी हुए थे!"उसने सपाट भाव से उत्तर दिया।

"तू !पागल हो गयी है? कुत्ते की पूंछ कभी सीधी… Continue

Added by Rahila on October 10, 2017 at 2:29pm — 8 Comments

परंपरा और गुलामी--

"कल की फोटो देखी मैंने, बहुत सुंदर दिख रही थीं आप", उसने ऑफिस में अपनी कलीग से कहा|

"अरे कल वो व्रत था ना, उसमें तो सजना बनता था", मुस्कुराते हुए वह बोली|

"अच्छा, तो आप भी यह सब मानती हैं, मुझे लगा कि आप आजाद ख्याल की हैं", उसके लहजे में व्यंग्य था या सहानुभूति, वह समझ नहीं पायी|

"ऐसी बात नहीं है, मैं तो बस परंपरा निभाने के लिए ऐसा कर लेती हूँ| वैसे इसी बहाने थोड़ी शॉपिंग भी हो जाती है, पति से गिफ्ट भी मिल जाता है", थोड़ी सफाई सी देती हुए वह बोली|

"मतलब परंपरा की आड़ में सब कुछ…

Continue

Added by विनय कुमार on October 10, 2017 at 11:46am — 6 Comments

ग़ज़ल --- ख़ुदकुशी बार बार कौन करे // दिनेश कुमार

2122---1212---112/22
.
ख़ुदकुशी बार बार कौन करे
आप का इन्तिज़ार कौन करे
.
आइना टूटने से डरता है
झूट को शर्मसार कौन करे
.
अपना मतलब निकालते हैं सब
बे-ग़रज़ हमसे प्यार कौन करे
.
नाव टूटी है हौसला ग़ायब
ग़म के दरिया को पार कौन करे
.
हम हक़ीक़त से मुँह चुराते हैं
ख़्वाब को तार तार कौन करे
.
उस्तरा बन्दरों के हाथ में है
इन को सर पर सवार कौन करे
.
( मौलिक व अप्रकाशित )

Added by दिनेश कुमार on October 10, 2017 at 5:33am — 8 Comments

राज़ नवादवी: एक अंजान शायर का कलाम- ५७

ग़ज़ल २२१ २१२१ १२२१ २१२ 

------------------------------------



लूटा जो तूने है मेरा, अरमान ही तो है

उजड़ा नहीं है घर मेरा, वीरान ही तो है



वादा खिलाफ़ी शोखी ए खूबाँ की है अदा

आएगा कल वो क़स्द ये इम्कान ही तो है



सीखेगा दिल के क़ायदे अपने हिसाब से

वो शोख़ संगदिल ज़रा नादान ही तो है



नज़रे करम कि हुब्ब के कुछ वलवले…

Continue

Added by राज़ नवादवी on October 9, 2017 at 11:31pm — 14 Comments

अपने अपने जज़्बात- लघुकथा

"हाय मम्मी, कैसी है, तबियत ठीक है ना तुम्हारी और दवा रोज ले रही हो ना", रोज के यही सवाल होते थे सिम्मी के और उसका रोज का जवाब।

"अब वीडियो काल किया है तो देख ही रही है मुझे, मैं एकदम ठीक हूँ। अच्छा अभी कितना बज रहा है वहाँ पर", उसने अपनी दीवाल घड़ी को देखते हुए पूछा।

"रोज तो बताती हूँ, बस साढ़े तीन घंटे आगे चलती है घड़ी यहाँ, अभी शाम के सिर्फ सात ही बजे हैं"।

"मुझे याद नहीं रहता, हमेशा उलझ जाती हूँ कि हमारी घड़ी आगे है या तुम्हारी। और मेहमान आए कि नहीं अभी, छोटू कैसा है", उसने भी…

Continue

Added by विनय कुमार on October 9, 2017 at 5:54pm — 12 Comments

शाम-ए-रंगीं  गुलबदन गुलफा़म है : सलीम रज़ा रीवा ग़ज़ल

2122 2122 212

..

शाम-ए-रंगीं  गुलबदन गुलफा़म है

मिल गए तुम जाम का क्या काम है

.. 

ये वज़ीफा़ मेरा सुब्ह-ओ-शाम है

मेरे लब पे सिर्फ तेरा नाम है

..

तू मिला मुझको सभी कुछ मिल गया

ये मुक़द्दर का बड़ा इनआम है



तुम हो सांसों में तुम्ही धड़कन में हो

ज़िन्दगी मेरी  तुम्हारे  नाम  है

..

हम किसी से दुश्मनी करते नहीं

दोस्ती तो प्यार  का  पैग़ाम है 

..

मेरा घर खुशिओं से है फूला फला 

मेरे रब का ये  बड़ा  इनआम… Continue

Added by SALIM RAZA REWA on October 9, 2017 at 3:30pm — 13 Comments

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