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ग़ज़ल: फूंकने को इसे बिजलियाँ आगईं

212/212/212/212

याद तुमने किया हिचकियाँ आगईं
दिल की तस्कीन को बदलियाँ आगईं।

ज़ेर ए तामीर था ये नशेमन मेंरा
फू़ंकने को इसे बिजलियाँ आगईं।

तू नहीं आसका हाल तेरा मगर
लेके अख़बार की सुर्ख़ियाँ आगईं।

जब तड़प कर गुलों ने पुकारा उन्हें
लब हसीं चूमने तितलियाँ आ गईं।

गर्म साँसों की औढ़ा दो मुझको रिदा
लौट कर फिर वो ही सर्दियाँ आ गईं।

चाह दिल में तेरे वस्ल की जब जगी
लम्स तेरा लिये चिट्ठियाँ आ गईं।

मौलिक/अप्रकाशित

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Comment by SANDEEP KUMAR PATEL on December 29, 2017 at 7:01pm

बाकमाल ग़ज़ब की ग़ज़ल हुई है .............मुबारकबाद क़ुबूल करें 

Comment by Dr Ashutosh Mishra on October 16, 2017 at 2:20pm
इस शानदार रचना के लिए हार्दिक बधाई सादर
Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on October 15, 2017 at 10:05pm
बहुत ही खूब ग़ज़ल हुई आदरणीय...आदरणीय नीलेश जी बड़ी बारीक़ बात कही है..सादर
Comment by SALIM RAZA REWA on October 13, 2017 at 6:29pm
जनाब अफ़रोज़'सहर'साहिब,
शेर दर शेर
ख़ूबसूरत ग़ज़ल के लिए मुबारक़बाद.
Comment by Naveen Mani Tripathi on October 13, 2017 at 11:45am
वाह वाह बहुत खूब ग़ज़ल हुई । बधाई ।
Comment by Sheikh Shahzad Usmani on October 12, 2017 at 10:44pm
बहुत ख़ूब। मतले में किसी तरह शेष अशआर वाला काफ़िया कायम कर बढ़िया ग़ज़ल होगी। हार्दिक बधाई आदरणीय अफ़रोज़'सहर'साहब।
Comment by Samar kabeer on October 12, 2017 at 2:41pm
जनाब अफ़रोज़'सहर'साहिब आदाब,अच्छी ग़ज़ल हुई है,दाद के साथ मुबारकबाद पेश करता हूँ ।
मतले पर जनाब निलेश जी से सहमत हूँ ।
तीसरे शैर के ऊला में 'आसका'को अलग अलग लिखना था "आ सका" ।
'गर्म साँसों की मुझको औढा दो रिदा'
इस मिसरे में 'औढा'लफ़्ज़ मुनासिब नहीं "उढा" होना चाहिए :-
'गर्म साँसों की मुझको उढा दो रिदा'
देखियेगा ।

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