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अम्बर के विस्तार सरीखे मेरे पापा // डॉ० प्राची

आँगन में त्यौहार सरीखे मेरे पापा
ख़ुशियों के आधार सरीखे मेरे पापा

उलझी सी हर पगडंडी
पर आस बँधाते,
घने अंधेरे में जैसे
जुगनू की टिमटिम,

मेरे जस व्यवहारों
का तस प्रत्युत्तर बन,
कभी कड़कता जेठ
कभी कोमल सी रिमझिम,

अपनी आँखों में बाँधे
हर वक़्त सवेरा,
अम्बर के विस्तार सरीखे मेरे पापा....

दुनियादारी की तिगड़म
जब झुलसाती है,
जोड़-तोड़ जब
समझ नहीं आते हैं मुझको,

मेरे बिन बोले ही
मुझको पढ़ लेते हैं,
"सरल बनी रहना बस"
समझाते हैं मुझको,

मुझको दिए झरोखे
और खुले दरवाज़े ,
पर अभेद्य दीवार सरीखे मेरे पापा....

सबकी हर ग़लती
हर नादानी को झेला,
मगर झुंझुलाहट का भाव
कभी ना आया,

बिन माँगे ही माफ़
करी हर इक नादानी,
सदा बड़प्पन
वचन आचरण से जतलाया,

सर पर हाथ फेर
कर देते पावन अंत: ,
ऐसी निर्मल धार सरीखे मेरे पापा....

मौलिक और अप्रकाशित

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Comment

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सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Dr.Prachi Singh on October 19, 2017 at 1:14am
जी सौरभ जी बिल्कुल
Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on October 15, 2017 at 9:26pm
बहुत ही उत्तम गीत हुआ आदरणीया..सादर

सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on October 15, 2017 at 7:28pm

आपकी दोनों कविताएँ पढ़ गया, आदरणीया प्राची जी.  भाव एक होते हुए भी दोनों कविताएँ प्रच्छन्न हैं. 

इन भावमय प्रस्तुतियों के लिए हार्दिक बधाइयाँ .. बहुत खूब ! 

’करी’ का प्रयोग आप न किया करें. क्योंकि आप हिन्दी को एक भाषा के तौर पर अच्छे से जानती हैं. साथ ही, ’अनेकों’ का प्रयोग तो आप एकदम-से न किया करें, क्योंकि आप हिन्दी को एक भाषा के तौर बहुत अच्छे से जानती हैं. 

सादर 


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Dr.Prachi Singh on October 12, 2017 at 11:19pm
इस गीत को कुछ इस तरह परिवर्तित किया है

शुचित यज्ञ सी
मन प्राणों में घोल सुगन्धि,
आँगन में त्यौहार सरीखे मेरे पापा...

थाम अँगुलियाँ जिनकी
हर उलझी पगडण्डी लगी सरल सी,
ज़मी किरचियाँ व्यवहारों की
पिघल हृदय से बहीं तरल सी,

सबकी ख़ातिर बोए पग-पग
गुलमोहर और छाँटे कीकर,
सौंपी सबको ख़ुशियों की प्याली
ख़ुद पी हर व्यथा गरल सी,

फिर भी आँखों में बाँधे
हर वक़्त सवेरा,
अम्बर के विस्तार सरीखे मेरे पापा....

गुड्डे-गुड़ियाँ, टिक-टिक घोड़े
और अनेकों परी कथाऐं,
सब में कितनी चतुराई से
पापा भरते थे शिक्षाऐं,

मेरे बिन बोले ही
मेरे अंतर्द्वंद्व पढ़ें जस के तस,
"ख़ुद को साधो सबसे पहले"
बात यही अक्सर समझाऐं,

मुझको दिए झरोखे
और खुले दरवाज़े ,
पर अभेद्य दीवार सरीखे मेरे पापा....

हर ग़लती हर नादानी की
बिन माँगे ही माफ़ी दे कर,
खोमोशी से हर चिंतन को
ले चलते हैं उचित डगर पर,

रीते हाथों में ना जाने
सपने कब गपचुप बोते हैं,
फिर सच्चाई से जीवन का
समझाते हैं अक्षर-अक्षर,

सर पर हाथ फेर
कर देते पावन अंतस,
ऐसी निर्मल धार सरीखे मेरे पापा....
Comment by Afroz 'sahr' on October 11, 2017 at 4:22pm
मोहतरमा प्राची साहिबा आदाब बहुत ही भावनात्मक गीत लिखा आपने मन को प्रफुल्लित कर गया बहुत बधाई आपको।,,,,,,
Comment by KALPANA BHATT ('रौनक़') on October 11, 2017 at 2:53pm

बहुत सुंदर गीत आदरणीया | हार्दिक बधाई |

Comment by Samar kabeer on October 11, 2017 at 11:57am
मोहतरमा डॉ.प्राची सिंह साहिबा आदाब,पापा को समर्पित बहुत सुंदर गीत लिखा है,प्रवाह,शिल्प हर एतिबार से सशक्त इस प्रस्तुति हेतु दिल से बधाई स्वीकार करें ।
'मगर झुंझलाहट का भाव
कभी ना आया'
ये पंक्ति लय में नहीं है,इसे इस तरह करना उचित होगा :-
'लेकिन झुंझलाहट का भाव
कभी न आया'

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