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खो गये है शब्द (कविता)

जाने कहाँ खो गये
खो गये हैं शब्द

जिनको पढ़कर कभी
हुआ करती थी सुबह

प्रथम किरणों के संग
ओस की बूंदों के भीतर

खो गये है वे शब्द
जो सूर्योदय से सूर्यास्त तक

कर देते थे जिवंत
ख़्वाब सजाया करते थे

खो गये हैं शब्द
जाने कहाँ किस ओर गये ।


मौलिक एवं अप्रकाशित

Added by KALPANA BHATT ('रौनक़') on May 6, 2017 at 11:08pm — 4 Comments

कौन भरेगा पेट - एक नव गीत

कौन भरेगा पेट  

 

छोड़ा गाँव आज बुधिया ने,

बिस्तर लिया लपेट

उपजायेगा कौन अन्न अब,

कौन भरेगा पेट  

 

गायब हैं घर में खिड़की अब,

दरवाजों की चलती है

आज कमी आँगन की हमको,

बहुत यहाँ…

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Added by बसंत कुमार शर्मा on May 6, 2017 at 7:30pm — 10 Comments

क्षणिकाएँ

१. 

निद्राधीन निस्तब्धता

कुलबुलाता शून्य

सनसनाता पवन

डरता है मन

अर्धरात्रि में क्यूँ

कोई खटखटाता है द्वार

प्रलय, सोने दो आज

        ------

२.

मेरी ही गढ़ी तुम्हारी आकृति

बारिश की बूँदें

तुम्हारे आँसू

तुम्हारी खिलखिलाती हँसी

कल्पना ही तो हैं सब

वरना 

मुद्दतें हो गई हैं तुमसे मिले

          -----

३.

कभी अपना, कभी

अपनी छाया का…

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Added by vijay nikore on May 6, 2017 at 10:24am — 24 Comments

चार महारथी (लघुकथा)/शेख़ शहज़ाद उस्मानी

मोमबत्ती जलाते हुए एक व्यक्ति ने कहा-"लो हम भी निर्भया के नाम आज एक मोमबत्ती जला देते हैं उसकी मम्मी की तरह!"

"तो निर्भया और उसकी मम्मी के नाम हो जाये एक और जाम!" दूसरे व्यक्ति ने अगला पैग बनाते हुए कहा।"

"सालों को रेप और वो सब करना ही था, तो ऐसे करते कि फांसी की सज़ा न हो पाती! गये साल्ले काम से, फांसी की सज़ा कन्फर्म!" अख़बार का मुख्य पृष्ठ लहराते हुए तीसरे व्यक्ति ने नशे में कहा।

पांच साल पहले निर्भया नाम की युवती पर कुछ युवकों ने एक निजी बस में हमला कर निर्ममता से बलात्कार…

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Added by Sheikh Shahzad Usmani on May 6, 2017 at 10:00am — 10 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
दो अतुकांत - वैचारिक रचनाएँ ( गिरिराज भंडारी )

1- आंतरिक सम्बन्ध

**************

मैंने पीटा तो दरवाज़ा था

हिल उठी साँकल ...

खड़ खड़ कर के .... 

और..

आवाज़ अन्दर से आयी

कौन है बे.... ?

बस...

मै समझ गया

तीनों के आंतरिक सम्बन्धों को

******

 2- आग और पानी

*****************

आग बुझे या न बुझे

आग लग जाना दुर्घटना है, या साजिश

किसे मतलब है

इन बेमतलब के सवालों से

 

ज़रूरी है,  अधिकार ....

पानी पर

सारा झगड़ा इसी…

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Added by गिरिराज भंडारी on May 6, 2017 at 9:00am — 12 Comments

ग़ज़ल : इस्लाह हेतू

1222  1222  1222     1222

नजर से दूर रहकर भी जो दिल के पास रहती है

कभी नींदें चुराती है कभी ख्वाबों में मिलती है. 

चमकना चाँद सा उसका मेरी हर बात पर हँसना

कहीं फूलों की नगरी में कोई वीणा सी बजती है. 

ये भोलापन हमारा है कि है जादूगरी उसकी

वफ़ा फितरत नहीं जिसकी वही दिलदार लगती है. 

कभी मैं भूल जाऊँगा उसे कह तो दिया लेकिन

जो दिल पर हाथ रक्खा तो वही धड़कन सी लगती है. 

तुम्हारा जो बचा था पास मेरे ले लिया तुमने…

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Added by Neeraj Neer on May 6, 2017 at 7:55am — 19 Comments

बैक टू बटालियन

सुनसान रात में लगभग तीन घंटे दौड़ने के बाद वह सैनिक थक कर चूर हो गया था और वहीँ ज़मीन पर बैठ गया। कुछ देर बाद साँस संयत होने पर उसने अपने कपड़ों में छिपाया हुआ मोबाईल फोन निकाला। उस पर नेटवर्क की दो रेखाएं देखते ही उसकी आँखों में चमक आ गयी और बिना समय गंवाये उसने अपनी माँ को फोन लगाया। मुश्किल से एक ही घंटी बजी होगी कि माँ ने फोन उठा लिया।

 

सैनिक ने हाँफते स्वर में कहा, “माँ मैं घर आ रहा हूँ।”

 

“अच्छा! तुझे छुट्टी मिल गयी? कब तक पहुंचेगा?” माँ ने ख़ुश होकर प्रश्न…

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Added by Dr. Chandresh Kumar Chhatlani on May 5, 2017 at 11:00pm — 8 Comments

ग़ज़ल (22-22-22-22-22-22-22-2)

 

22   22   22   22   22   22   22   2



दिल के तख़्त पे हाए हमने किस ज़ालिम को बिठा लिया 

दिल की बस्ती को ही उजाड़ा उसने ऐसा काम किया।

 

'लुटे हुए अरमानों को वापिस लाऊंगा' बोला था  

लेकिन जो था पास हमारे वो भी हमसे छीन लिया।

 

अब कहता है, इश्क़ में सब आशिक़ ऐसा ही करते हैं 

मैंने भी गर झूठे वादे किए तो कोई पाप किया।

 

कितनी बार रकीबों ने अरमानों के सर काटे हैं 

और वो बस इतना कहते हैं बुरा किया भई बुरा…

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Added by Gurpreet Singh jammu on May 5, 2017 at 11:00am — 17 Comments

तरही ग़ज़ल (212-212-212-212)

(212-212-212-212)

मेरे सुर से तेरा सुर मिलाना हुआ

और जीवन मेरा इक तराना हुआ ॥



मैने देखी है इक चलती फ़िरती ग़ज़ल

है मिजाज इस लिए शायराना हुआ ॥



आइए हमनशी बैठिए पलकों पर

ये कहें  ख्वाब में कैसे आना हुआ ॥



थी दवा तो वही काम तब कर गई

जब तेरा अपने हाथों पिलाना हुआ ॥



वो भी लगने लगे अब मुझे अपने से

"जब से गैरों के घर आना जाना हुआ ॥"



हज़्म कैसे करेंगे मेरी ये ग़ज़ल

वो जो खाते हैं बारीक छाना हुआ ॥



देख के…

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Added by Gurpreet Singh jammu on May 5, 2017 at 10:47am — 23 Comments

गजल(कुछ भी कह पाना है मुश्किल)

कुछ भी कह पाना है मुश्किल
चुप भी रह जाना है मुश्किल।1

जो बात बयारों की करते
उनको समझाना है मुश्किल।2

वे अक्स छुपाये चलते हैं
पहचान बताना है मुश्किल।3

इतिहास गढ़ा भी जाता है
इतिहास मिटाना है मुश्किल।4

वे काँटे खूब बिछा सकते
बस पीर घटाना है मुश्किल।5

अरमां की लूट मची रहती
हाँ, ख्वाब सजाना है मुश्किल।6
'मैलिक व अप्रकाशित'

Added by Manan Kumar singh on May 5, 2017 at 9:41am — 9 Comments

ग़ज़ल नूर की -बस किसी अवतार के आने का रस्ता देखना

२१२२/२१२२/२१२२/२१२ 



बस किसी अवतार के आने का रस्ता देखना

बस्तियाँ जलती रहेंगी, तुम तमाशा देखना.

.

छाँव तो फिर छाँव है लेकिन किसी बरगद तले

धूप खो कर जल न जाये कोई पौधा, देखना.

.

देखने से गो नहीं मक़्सूद जिस बेचैनी का

हर कोई कहता है फिर भी उस को “रस्ता देखना”  

.

क़ामयाबी दे अगर तो ये भी मुझ को दे शुऊ’र 

किस तरह दिल-आइने में अक्स ख़ुद का देखना.

.

चाँद में महबूब की सूरत नज़र आती नहीं   

जब से आधे चाँद में आया है कासा…

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Added by Nilesh Shevgaonkar on May 5, 2017 at 9:00am — 54 Comments

मोहतरम जनाब योगराज प्रभाकर साहिब की फ़रमाइश पर कही गई तरही ग़ज़ल नम्बर-2

मफ़ाईलुन मफ़ाईलुन फ़ऊलुन



यहाँ हर सू जिहालत है? नहीं तो

पढ़े लिक्खों की क़ीमत है? नहीं तो



सुख़न पर कोई पाबन्दी नहीं अब

ज़बाँ खोलूँ, इजाज़त है? नहीं तो



भरे दरबार में सच बोलना है

तिरे दिल में ये हिम्मत है? नहीं तो



बदल सकता नहीं फ़रमान तेरा

ये क्या क़ुरआँ की आयत है? नहीं तो



अदक़ अल्फ़ाज़ रख देना ग़ज़ल में

इसी का नाम जिद्दत है? नहीं तो



नहीं दौलत ये मिहनत से कमाई

तो क्या माल-ए-ग़नीमत है? नहीं तो



बुलाया है… Continue

Added by Samar kabeer on May 5, 2017 at 12:00am — 36 Comments

ग़ज़ल(यहीं डूब जाने को जी चाहता है )

ग़ज़ल

--------

(फऊलन-फऊलन -फऊलन -फऊलन )

लगी को बुझाने को जी चाहता है |

तुम्हें कब से पाने को जी चाहता है |

यक़ीनन बड़ी मुज़त् रिब है शबे ग़म

मगर मुस्कराने को जी चाहता है |

समुंदर से गहरी हैं आँखें तुम्हारी

यहीं डूब जाने को जी चाहता है |

तेरे नाम में भी बहुत है हलावत

इसे लब पे लाने को जी चाहता है |

तेरे अहदे माज़ी से वाक़िफ़ हैं फिर भी

नयी चोट खाने को जी चाहता है |

मुसलसल…

Continue

Added by Tasdiq Ahmed Khan on May 4, 2017 at 9:59pm — 16 Comments

ग़ज़ल...कई शम्स उसने सँभाले हुये हैं

122 122 122 122
कई शम्स उसने सँभाले हुये हैं
वो जिसके करम से उजाले हुये हैं

चला जो सदा सत्य की लौ जलाये
उसी शख्स के पांव छाले हुये हैं

ये जिनकी तपिश से जले आशियाने
वो मुददे नहीं बस उछाले हुये हैं

कहीं दूध मेवा कहीं आदमी को
बमुश्किल मयस्सर निवाले हुये हैं

विसाले सनम के हसीं ख्वाब दिल से
कई साल पहले निकाले हुये हैं
(मौलिक एवं अप्रकाशित)
बृजेश कुमार 'ब्रज'

Added by बृजेश कुमार 'ब्रज' on May 4, 2017 at 6:38pm — 14 Comments

बोझ ...(250 वीं रचना )

बोझ ...

हम

कहाँ जान पाते हैं

चेतन या अवचेतन में

अटकी हुई कुंठाओं की

मूक भाषा को

उनींदी सी अवस्था में

कुछ सिमटी हुई

आशाओं को

मन में उबलते

एक असीमित बोझ की

पहचान को

साँसों की थकान

अश्रु की व्यथा

और

रुदन के आह्वान को

तुम्हारे

स्पर्श की अनुभूति में लिप्त

क्षणों की

परिणिती के आभास ने

यूँ तो

अंजाने संताप से

मुक्ति का ढाढस दिया

किन्तु…

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Added by Sushil Sarna on May 4, 2017 at 4:59pm — 12 Comments

ग़ज़ल (ज़हीर कुरैशी)

अपने घर लौटा तो कोई था न स्वागत के लिए

घर के दरवाजों पे ताले थे शरारत के लिए

 

जब कहा मन ने तो ‘मोबाइल’ उठाकर बात की,

अब प्रतीक्षा कौन करता है किसी ख़त के लिए?

 

मैं बरी होकर भी दोषी हूँ स्वयं की दृष्टि में,

कुछ अलग कानून है मन की अदालत के लिए

 

बाहुबल से भी अधिक धन-बल जरुरी हो गया

हाँ, तभी जाकर जुटा जन-बल सियासत के लिए

 

अब न वैसे दोस्त हैं, परिजन भी अब वैसे नहीं,

आप किसके पास जायेंगे शिकायत के…

Continue

Added by जहीर कुरैशी on May 4, 2017 at 1:00am — 21 Comments

है गिला, तो गिला कीजिए(गजल)/सतविन्द्र

212 212 212
बात जो हो कहा कीजिए
दिल में ही क्यों रखा कीजिए?

चार दिन की है ये जिंदगी
बस ख़ुशी से रहा कीजिए

जो बुराई करे आपकी
आप उसका भला कीजिए।

रूठना बात अच्छी नहीं
है गिला, तो गिला कीजिए

मिल गये जब जरूरत हुई
बे ग़रज भी मिला कीजिए।

टूटता वो अकड़ता है जो
वक्त आए झुका कीजिए।

मौलिक एवं अप्रकाशित

Added by सतविन्द्र कुमार राणा on May 3, 2017 at 11:00pm — 18 Comments

"तुमने कहा था भूल जा"

लौकिक अनाम छंद 

221 2121 1221 212



तुमने कहा था भूल जा तुमको भुला दिया |

जीना कठिन हुआ भले' जीके दिखा दिया |

.

अब और कुछ न माँग बचा कुछ भी तो नहीं

इक दम था इन रगों में जो तुम पर लुटा दिया |

.

जो रात दिन थे साथ में वही छोड़ कर गये

था मोह का तमस जो सघन वो मिटा दिया |

.

अब चैन से निकल तिरे जालिम जहान से

कोई कहीं न रोक ले कुंडा लगा दिया |

.

धक धक धड़क गया बड़ा नाजुक था  मेंरा दिल 

नश्तर बहुत था तेज जो…

Continue

Added by Chhaya Shukla on May 3, 2017 at 1:00pm — 10 Comments

दोहे -

सैनिक हुए शहीद फिर, और हुआ उपहास।
अपनी ही सरकार से, रही न कोई आस।।1।।

इसमें कोई शक नहीं, हम हैं निंदा वीर।
अगली निंदा के लिए, दिल्ली का प्राचीर।।2।।

कोई पत्थर मारता, कोई काटे शीश।
विजयी भव का क्यों नहीं, दे देते आशीष।।3।।

समय वार्ता का नहीं, होने दें यलगार।
बिना मार करता नहीं, गलती वह स्वीकार।।4।।
(मौलिक व अप्रकाशित)
**हरिओम श्रीवास्तव**

Added by Hariom Shrivastava on May 2, 2017 at 4:30pm — 6 Comments

ग़ज़ल नूर की-रोज़ जो मुझ को नया चाहती है

२१२२/११२२/२२ (११२)

रोज़ जो मुझ को नया चाहती है
ज़िन्दगी मुझ से तू क्या चाहती है?
.
मौत की शक्ल पहन कर शायद
ज़िन्दगी बदली क़बा चाहती है.
.
मशवरे यूँ मुझे देती है अना
जैसे सचमुच में भला चाहती है.
.
इक  सितमगर जो  मसीहा भी न हो,
नई दुनिया वो  ख़ुदा चाहती है.
.
“नूर’ बुझ जाये चिराग़ों की तरह
क्या ही नादान हवा चाहती है. 
.
निलेश"नूर"

मौलिक/ अप्रकाशित 

Added by Nilesh Shevgaonkar on May 2, 2017 at 2:00pm — 34 Comments

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