For any Query/Feedback/Suggestion related to OBO, please contact:- admin@openbooksonline.com & contact2obo@gmail.com, you may also call on 09872568228(योगराज प्रभाकर)/09431288405(गणेश जी "बागी")

ग़ज़ल नूर की-रोज़ जो मुझ को नया चाहती है

२१२२/११२२/२२ (११२)

रोज़ जो मुझ को नया चाहती है
ज़िन्दगी मुझ से तू क्या चाहती है?
.
मौत की शक्ल पहन कर शायद
ज़िन्दगी बदली क़बा चाहती है.
.
मशवरे यूँ मुझे देती है अना
जैसे सचमुच में भला चाहती है.
.
इक  सितमगर जो  मसीहा भी न हो,
नई दुनिया वो  ख़ुदा चाहती है.
.
“नूर’ बुझ जाये चिराग़ों की तरह
क्या ही नादान हवा चाहती है. 
.
निलेश"नूर"

मौलिक/ अप्रकाशित 

Views: 299

Comment

You need to be a member of Open Books Online to add comments!

Join Open Books Online

Comment by vijay nikore on June 24, 2017 at 11:24am

गज़ल बहुत ही अच्छी लगी। मुबारकबाद।

Comment by Nilesh Shevgaonkar on May 5, 2017 at 9:25pm

शुक्रिया आ. अनुराग जी 
आभार 

Comment by Anuraag Vashishth on May 5, 2017 at 9:18pm

आ. नीलेश जी,

आप की ग़ज़लों के बारे में ये लिखना की अच्छी लगी शायद बेमानी है क्योकि आपकी ग़ज़ल है तो अच्छी तो होनी ही है.

'इक  सितमगर जो  मसीहा भी न हो' को अगर मैं लिखता तो यूं लिखता 'जो मसीहा भी हो और कातिल भी' वैसे 'कातिल' में शायद व्याप्ति थोड़ी कम है. 

मशवरे यूँ मुझे देती है अना 

जैसे सचमुच में भला चाहती है. 

ये शेर हासिले ग़ज़ल है. हार्दिक शुभकामनाएं.

सादर 

Comment by Nilesh Shevgaonkar on May 5, 2017 at 8:33am

शुक्रिया आ. सुरेन्द्रनाथ सिंह साहब 

Comment by Nilesh Shevgaonkar on May 5, 2017 at 8:32am

एक बार फिर शुक्रिया आ. समर सर 

Comment by Nilesh Shevgaonkar on May 5, 2017 at 8:32am

शुक्रिया आ. महेंद्र कुमार जी 

Comment by सुरेन्द्र नाथ सिंह 'कुशक्षत्रप' on May 5, 2017 at 3:51am
आद0 भाई नीलेश जी सादर अभिवादन, बेहद उम्दा गजल के लिए हार्दिक बधाई स्वीकार करें।
Comment by Samar kabeer on May 4, 2017 at 8:23pm
जनाब हफ़ीज़ मेरठी साहिब का शैर दिखिये:-

'ये मश्विरा मुझे ख़ुशहाल लोग देते हैं
ज़मीर बेच दे अपना ख़ुदी का सौदा कर'

नाचीज़ का शैर :-
'मश्विरा बाज़ मश्विरा देंगे
तू फ़क़्त दिल की मान मुश्किल में'

अब और क्या बाक़ी रहा कहने को,बृजेश जी ?
Comment by Mahendra Kumar on May 4, 2017 at 7:38pm

आ. निलेश जी, ख़ूबसूरत ग़ज़ल हुई है। अना को आपने बहुत सही पकड़ा है। सच है कि यह भला करने की अपेक्षा नुकसान ही कराती है। इस उम्दा प्रस्तुति पर हार्दिक बधाई स्वीकार कीजिए। सादर।    

Comment by Nilesh Shevgaonkar on May 4, 2017 at 7:03pm

शुक्रिया अ. बृजेश जी ...
अगर   हाफ़िज़ जालंधरी और फ़राज़ जैसे शाइरों ने मशवरा दिया जाने पर  बाँधा है तो हमें ही आपत्ति क्यूँ हो ...
सादर 

कृपया ध्यान दे...

आवश्यक सूचना:-

1-सभी सदस्यों से अनुरोध है कि कृपया मौलिक व अप्रकाशित रचना ही पोस्ट करें,पूर्व प्रकाशित रचनाओं का अनुमोदन नही किया जायेगा, रचना के अंत में "मौलिक व अप्रकाशित" लिखना अनिवार्य है । अधिक जानकारी हेतु नियम देखे

2-ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार यदि आपको अच्छा लगा तो अपने मित्रो और शुभचिंतको को इस परिवार से जोड़ने हेतु यहाँ क्लिक कर आमंत्रण भेजे |

3-यदि आप अपने ओ बी ओ पर विडियो, फोटो या चैट सुविधा का लाभ नहीं ले पा रहे हो तो आप अपने सिस्टम पर फ्लैश प्लयेर यहाँ क्लिक कर डाउनलोड करे और फिर रन करा दे |

4-OBO नि:शुल्क विज्ञापन योजना (अधिक जानकारी हेतु क्लिक करे)

5-"सुझाव एवं शिकायत" दर्ज करने हेतु यहाँ क्लिक करे |

6-Download OBO Android App Here

हिन्दी टाइप

New  देवनागरी (हिंदी) टाइप करने हेतु दो साधन...

साधन - 1

साधन - 2

Latest Blogs

Latest Activity

Manan Kumar singh commented on Manan Kumar singh's blog post गजल(बाअदब सब....)
"मेरे लिए 'आदरणीय' ही है।"
13 minutes ago
Manan Kumar singh commented on Manan Kumar singh's blog post गजल(बाअदब सब....)
"आदरणीय कालीपद जी,शुक्रिया। मेरे 'आदरणीय' पर्याप्त है,सादर।"
13 minutes ago
Manan Kumar singh commented on Manan Kumar singh's blog post गजल(बाअदब सब....)
"आदरणीय अजय जी,आपका आभार।"
15 minutes ago
Manan Kumar singh commented on Manan Kumar singh's blog post गजल(बाअदब सब....)
"बहुत बहुत शुक्रिया आदरणीय आरिफ जी।"
16 minutes ago
Manan Kumar singh commented on Manan Kumar singh's blog post गजल(बाअदब सब....)
"आभारी हूँ आदरणीय अफरोज जी।"
16 minutes ago
Profile IconRamkunwar Choudhary and Manika Dubey joined Open Books Online
1 hour ago
Kalipad Prasad Mandal commented on Manan Kumar singh's blog post गजल(बाअदब सब....)
"आदरणीया मनन जी , खुबसूरत ग़ज़ल के लिए बधाई स्वीकार करें "
2 hours ago
Kalipad Prasad Mandal commented on Ram Awadh VIshwakarma's blog post ग़ज़ल - यूँ ही गाल बजाते रहिये
"आदरणीय राम अवध विश्वकर्मा जी , सामयिक विषय पर बहुत खुबसूरत ग़ज़ल हुई है |बधाई आपको "
2 hours ago
Kalipad Prasad Mandal commented on Samar kabeer's blog post 'ग़ालिब'की ज़मीन में एक ग़ज़ल
"आदरणीय समर कबीर साहब ,आदाब बहुत गज़ब की ग़ज़ल  हुई है | है तो यह ग़ज़ल फिर भी मेरा विचार है तीसरा…"
2 hours ago
दिनेश कुमार posted a blog post

तज़्मीन बर ग़ज़ल // "ज़िन्दगी में मज़ा नहीं बाक़ी" // दिनेश कुमार

एक कोशिश।तज़मीन बर ग़ज़ल जनाब फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ साहब।..फ़ाइलातुन मुफ़ाइलुन फ़ेलुन..इश्क़ का…See More
2 hours ago
Kalipad Prasad Mandal commented on बासुदेव अग्रवाल 'नमन''s blog post लम्बे रदीफ़ की ग़ज़ल (कज़ा मेरी अगर जो हो)
"आदरणीय बासुदेव अग्रवाल जी  , बहुत सुन्दर ग़ज़ल हुई है | इस नया प्रयोग के लिए हार्दिक बधाई "
2 hours ago
Samar kabeer commented on बासुदेव अग्रवाल 'नमन''s blog post लम्बे रदीफ़ की ग़ज़ल (कज़ा मेरी अगर जो हो)
"जनाब बासुदेव अग्रवाल'नमन'जी आदाब,उम्दा ग़ज़ल हुई है,दाद के साथ मुबारकबाद पेश करता हूँ ।"
2 hours ago

© 2017   Created by Admin.   Powered by

Badges  |  Report an Issue  |  Terms of Service