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Chhaya Shukla
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Chhaya Shukla replied to Admin's discussion "ओबीओ चित्र से काव्य तक छंदोत्सव" अंक- 73 in the group चित्र से काव्य तक
"आदरणीय अशोक रक्ताले जी छंदों ने धूम मचा दिया | बधाई स्वीकारें ! सादर "
Saturday
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"आदरणीय अशोक रक्ताले भाई छंद की सराहना के लिए आभार आपका ; इसी प्रकार सीखने में सहयोग देते रहें | सादर नमन ! "
Saturday
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"आदरणीय समर कबीर जी आपका आशीष मिला ख़ुशी हुई , आपका आशीष माँ की कृपा बनी रहे मैं सतत प्रयास को तत्पर हूँ |  सादर नमन ! "
Saturday
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"आदरणीय गिरिराज भैया छंद की सराहना के लिए सादर धन्यवाद नमन स्वीकारें |"
Saturday
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"आदरणीया प्रतिभा पांडे जी इस लघु प्रयास की सराहना के लिया स्वागत है आपका सादर आभार स्वीकारें ! "
Saturday
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"आदरणीय laxman dhami भैया हार्दिक आभार ! सादर"
Saturday
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"आदरणीय राजेश कुमारी जी दोनों कुंडलियाँ चित्र को जी रही हैं हार्दिक बधाईयाँ आपको स्वीकार हों ! मन में एक प्रश्न है आप की राय जानना चाहूंगी -*तना *तना ........कर मारती,चप्पल लेकर लाल|| *शब्द का अर्थ क्या है ?  सादर अभी तक मारने के…"
Saturday
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"अति सुंदर कुंडलियाँ हुई है वाह ! आदरणीय बासुदेव अग्रवाल जी बधाई संग सादर नमन ! "
Saturday
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"आदरणीय सतीश मापतपुरी जी स्वागत है , रचना की सराहना ने लेखन सार्थक किया | मेरे भाव आप तक पहुँचे यह देखना सुखद है आपका हार्दिक आभार |सादर नमन ! "
Saturday
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"   जी , आदरणीय सादर आभार    "
Saturday
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"आदरणीय वैसे बोलचाल की भाषा में उत्तर प्रदेश  मर्द को मरद भी कहते हुए पाया  जाता है | सादर "
Friday
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"मोहतरम तस्दीक अहमद खान साहब रचना की सराहना हेतु शुक्रिया नमन स्वीकारें सादर  ! "
Friday
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"आदरणीय सतविन्द्र जी स्वागत है सराहना के शब्दों हेतु आभार आपका | सादर नमन ! "
Friday
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"आदरणीय सौरभ पाण्डेय जी आपका स्वागत है सराहना हेतु नमन स्वीकारें | मरद और मर्द शब्द की भिन्नता जानकर अच्छा लगा |पुनः एक बार आभार आपका सादर | रचना में संशोधन  कर क्या इसे   पुनः पोस्ट किया जाए | क्या परम्परा है कृपया   अवगत करायें…"
Friday
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"आदरणीय गिरिराज भंडारी जी हार्दिक बधाई आपको दोनों कुंडलियाँ बांछें खिला दीं | कुंडलियों का प्रवाह और आपकी व्यापक  दृष्टि मन मोह ली | आपकी लेखनी को नमन जो हर विधा में समान अधिकार रखती है | सादर "
Friday
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"आदरणीय अखिलेश कृष्ण श्रीवास्त जी सर्व प्रथम आपकी प्रस्तुति रोचक लगी हार्दिक बधाई स्वीकारें |***** चंदू हूँ मैं प्रौढ़ भी, मारो नहीं हुजूर। परम भक्त हनुमान का, छेड़ छाड़ से दूर॥ छेड़ छाड़ से दूर, रोमियो मुझे न कहना। चप्पल यूँ न निकाल, *बंधु मैं तेरा बहना…"
Friday

Profile Information

Gender
Female
City State
Varanasi (U.P.)
Native Place
New Delhi
Profession
Teacher
About me
poet & writer

Chhaya Shukla's Blog

दोहे

जीवन हमको बुद्ध का , देता है सन्देश |

रक्षा करना जीव की , दूर रहेगा क्लेश ||1||

भोग विलास व नारियां, बदल न पाई चाल |

योग बना था संत का, छोड़ दिया जंजाल ||2||

मन वीणा के तार को, कसना तनिक सहेज |

ढीले से हो बेसुरा , अधिक कसे निस्तेज ||3||

बंधन माया मोह का , जकड़े रहता पाँव |

जिस जिसने छोड़ा इसे , बसे ईश के गाँव ||4||

धन्य भूमि है देश की, जन्मे संत महान |

ज्ञान दीप से जगत का,हरे सकल अज्ञान ||5||

.…

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Posted on May 10, 2017 at 2:00pm — 10 Comments

चाँद तारे बना टाँकती रह गई

212  212 
झाँकती रह गई |
ताकती रह गई |


चाँद तारे बना
टाँकती रह गई |


अंत है कब कहाँ
आँकती रह गई |


चाशनी हाथ ले 
बाँटती रह गई |


साँच को आँच थी
हाँकती रह गई |


रेत में जब फँसी
हाँफती रह गई |


प्यास कैसे बुझे
बाँचती रह गई |
(मौलिक अप्रकाशित)

 

 

Posted on May 9, 2017 at 9:30pm — 11 Comments

"तुमने कहा था भूल जा"

लौकिक अनाम छंद 

221 2121 1221 212



तुमने कहा था भूल जा तुमको भुला दिया |

जीना कठिन हुआ भले' जीके दिखा दिया |

.

अब और कुछ न माँग बचा कुछ भी तो नहीं

इक दम था इन रगों में जो तुम पर लुटा दिया |

.

जो रात दिन थे साथ में वही छोड़ कर गये

था मोह का तमस जो सघन वो मिटा दिया |

.

अब चैन से निकल तिरे जालिम जहान से

कोई कहीं न रोक ले कुंडा लगा दिया |

.

धक धक धड़क गया बड़ा नाजुक था  मेंरा दिल 

नश्तर बहुत था तेज जो…

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Posted on May 3, 2017 at 1:00pm — 10 Comments

गीत - "बूँदें मचल रही हैं"

घन स्याम नभ में’ छाया , बूदें मचल रही हैं |
है जोर अब हवा का, ये बन सँवर रही हैं |
सूरज छुपा है’ बैठा , रूठा है रश्मियों से,
धरती मगन हुई है , चाहत उबल रही है |
.....घन स्याम नभ में’ छाया , बूदें मचल रही हैं…
Continue

Posted on September 9, 2015 at 10:30am — 10 Comments

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At 11:36am on October 22, 2014, डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव said…

छाया जी

मित्र के रूप मापक स्वागत है i  सादर i

At 6:38pm on September 10, 2014, Santlal Karun said…

आदरणीया छाया शुक्ला जी,

आप का गीत 'पुष्प हरसिंगार का' सरसरी निगाह से भक्तिपरक गीत के चक्कर में कई बार छोड़कर मैं आगे बढ़ गया था | पर 'महीन की सर्वश्रेष्ठ रचना' चुने जाने पर जब मैंने गौर से पढ़ा, तो कथ्य कुछ और ही था | इस सुन्दर गीत के लिए हार्दिक साधुवाद एवं सद्भावनाएँ तथा महीन की सर्वश्रेष्ठ रचना के चयन पर बधाई ! 

At 11:32am on September 10, 2014, डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव said…

आदरणीया छाया जी

प्रतिभा, परिश्रम और साधना  का फल है आपको ओ बी ओ द्वारा दिया गया सम्मान i यह आपको नयी उचाईंयां छूने की प्रेरणा अवश्य  देगा i मेरी शत -शत मंगल कामना i i

At 8:21pm on September 9, 2014,
मुख्य प्रबंधक
Er. Ganesh Jee "Bagi"
said…

आदरणीया  छाया शुक्ला जी,
सादर अभिवादन !
मुझे यह बताते हुए हर्ष हो रहा है कि आपकी ग़ज़ल "पुष्प हरसिंगार का" को "महीने की सर्वश्रेष्ठ रचना" सम्मान के रूप मे सम्मानित किया गया है, तथा आप की छाया चित्र को ओ बी ओ मुख्य पृष्ठ पर स्थान दिया गया है | इस शानदार उपलब्धि पर बधाई स्वीकार करे |

आपको प्रसस्ति पत्र शीघ्र उपलब्ध करा दिया जायेगा, इस निमित कृपया आप अपना पत्राचार का पता व फ़ोन नंबर admin@openbooksonline.com पर उपलब्ध कराना चाहेंगे | मेल उसी आई डी से भेजे जिससे ओ बी ओ सदस्यता प्राप्त की गई हो |

शुभकामनाओं सहित
आपका
गणेश जी "बागी
संस्थापक सह मुख्य प्रबंधक 
ओपन बुक्स ऑनलाइन

 
 
 

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