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Chhaya Shukla's Blog (11)

दोहे

जीवन हमको बुद्ध का , देता है सन्देश |

रक्षा करना जीव की , दूर रहेगा क्लेश ||1||

भोग विलास व नारियां, बदल न पाई चाल |

योग बना था संत का, छोड़ दिया जंजाल ||2||

मन वीणा के तार को, कसना तनिक सहेज |

ढीले से हो बेसुरा , अधिक कसे निस्तेज ||3||

बंधन माया मोह का , जकड़े रहता पाँव |

जिस जिसने छोड़ा इसे , बसे ईश के गाँव ||4||

धन्य भूमि है देश की, जन्मे संत महान |

ज्ञान दीप से जगत का,हरे सकल अज्ञान ||5||

.…

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Added by Chhaya Shukla on May 10, 2017 at 2:00pm — 9 Comments

चाँद तारे बना टाँकती रह गई

212  212 
झाँकती रह गई |
ताकती रह गई |


चाँद तारे बना
टाँकती रह गई |


अंत है कब कहाँ
आँकती रह गई |


चाशनी हाथ ले 
बाँटती रह गई |


साँच को आँच थी
हाँकती रह गई |


रेत में जब फँसी
हाँफती रह गई |


प्यास कैसे बुझे
बाँचती रह गई |
(मौलिक अप्रकाशित)

 

 

Added by Chhaya Shukla on May 9, 2017 at 9:30pm — 12 Comments

"तुमने कहा था भूल जा"

लौकिक अनाम छंद 

221 2121 1221 212



तुमने कहा था भूल जा तुमको भुला दिया |

जीना कठिन हुआ भले' जीके दिखा दिया |

.

अब और कुछ न माँग बचा कुछ भी तो नहीं

इक दम था इन रगों में जो तुम पर लुटा दिया |

.

जो रात दिन थे साथ में वही छोड़ कर गये

था मोह का तमस जो सघन वो मिटा दिया |

.

अब चैन से निकल तिरे जालिम जहान से

कोई कहीं न रोक ले कुंडा लगा दिया |

.

धक धक धड़क गया बड़ा नाजुक था  मेंरा दिल 

नश्तर बहुत था तेज जो…

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Added by Chhaya Shukla on May 3, 2017 at 1:00pm — 10 Comments

गीत - "बूँदें मचल रही हैं"

घन स्याम नभ में’ छाया , बूदें मचल रही हैं |
है जोर अब हवा का, ये बन सँवर रही हैं |
सूरज छुपा है’ बैठा , रूठा है रश्मियों से,
धरती मगन हुई है , चाहत उबल रही है |
.....घन स्याम नभ में’ छाया , बूदें मचल रही हैं…
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Added by Chhaya Shukla on September 9, 2015 at 10:30am — 10 Comments

"यादें"

याद आते हैं

अक्सर

पुराने जमाने ,

बैलों की गाड़ी

वो भूजे के दाने ,

दादी माँ की कहानी

उन्हीं की जुबानी,

भूले से भी न भूले  

वो पुरवट का पानी |

अक्सर ही बागों में

घंटों टहलना

पके आमों पे

मुन्नी का मचलना

गुलेलों की बाज़ी

गोलियों का वो खेला

सुबह शाम जमघट पे

लगे मानो मेला

वो मुर्गे की बांग पे

भैया का उठना

रट्टा लगाके

दो दूना पढ़ना

कपडे के झूले पे

करेजऊ का झुलना

छोटी-छोटी…

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Added by Chhaya Shukla on April 27, 2015 at 9:30pm — 8 Comments

"भूख में उछाल आ गया"

आदमी की भूख में उछाल आ गया |
पत्थरों को घिस दिया पहाड़ खा गया |

रुख बदल के जल प्रवाह मोड़ ही दिया,
भूख ही थी आदमी कमाल पा गया |

तम निगल कर रौशनी तमाम कर दिया,
जब लगाई युक्ति तो विकास छा गया |

देखकर सबकुछ खुदा मगन दिखा वहाँ,
आदमी को आज का मचान भा गया |

तन मिला दुर्लभ इसे वृथा नहीं किया
जिन्दगी थोड़ी मगर उठान ला गया ||

( मौलिक अप्रकाशित )

Added by Chhaya Shukla on April 22, 2015 at 12:00pm — 6 Comments

मनहरण घनाक्षरी - "होली"

रंग की उमंग देखो होली हुडदंग देखो ,
लाल लाल रंग डाल सखी सारी लाल हैं |

राग फाग छेड़ कर भाभी आई झूम झूम
पल में ही रंगी सखी मुख पे गुलाल हैं |

पीली पीली पिचकारी रंग हरा खूब डारी
भागी सखी घूम घूम हमको मलाल है |

अब नहीं दिख रही होली वह भोली भाली
मन मेरे बार बार उठता सवाल है |

(मौलिक अप्रकाशित)

Added by Chhaya Shukla on March 5, 2015 at 1:27pm — 6 Comments

"जी उठा मन"

जी उठा मन” - गीतिका

 

जी उठा मन आज फिर से रात चंदा देखकर  |

थक गई थी प्रीत जग की रीत भाषा देखकर |



इक किरण शीतल सरल सी जब बढ़ी मेरी तरफ ,

झनझनाते तार मन उज्वल हुआ सा देखकर |



छू लिया फिर शीश मेरा संग बैठी देर तक ,

खूब बातें कर रही थी मुस्कुराता देखकर |



प्यार से बोली किरण फिर संग तुम मेरे चलो ,

राह रोशन कर रही थी साथ भाया देखकर |



चांदनी का चीर…

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Added by Chhaya Shukla on November 1, 2014 at 10:00am — 19 Comments

"गली के मोड़ पर "

"अतुकांत"

_________

गली के मोड़ पर जब दिखती

वो पागल लडकी

हंसती

मुस्कुराती

कुछ गाती सकुचाती,

फिर तेज कदमो

से चल

गुजर जाती

चलता रहा था क्रम

अभ्यास में उतर आई

उसकी अदाएं

हँसा गईं कई बार कई बार

सोचने पर

विवश

विधाता ने सब दिया

रूप नख-शिख

दिमाग दिया होता थोडा

और सहूर

जीवन के फर्ज निभाने का,

वय कम न थी

मगर आज...........

दिखी न वो…

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Added by Chhaya Shukla on September 22, 2014 at 10:18am — 27 Comments

"है मधुर जीवंत बेला "

गीत

___

“है मधुर जीवंत बेला”

_______________

नैन में सपने पले हैं अब नहीँ हूँ मैँ अकेला ।

फिर जहां मुस्कान लाया, है मधुर जीवन्त बेला |

झूठ झंझट जग के सारे , हैं सभी तो ये हमारे ,

दीप आशा के जले हैं नेह से सारे सजाये

सत्य का निर्माण होगा, फिर सजेगा एक मेला ||

फिर जहाँ मुस्कान लाया, है मधुर जीवंत बेला..............

स्वप्न भी पूरे करूँ मैं, इस जगत को घर बना के,

और खुशियों से सजा…

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Added by Chhaya Shukla on September 21, 2014 at 3:48pm — 9 Comments

"पुष्प हरसिंगार का "

"गीत"

_____

श्याम घन नभ सोहते ज्योँ ग्वाल दल घनश्याम का ।

चंचला यमुना किनारे नृत्य रत ज्योँ राधिका ||



आ रहे महबूब मेरे

दिल कहे श्रृँगार कर ।

द्वार पर कलियाँ बिछा कर

बावरी सत्कार कर ।

प्यार पर सब वार कर

-दुल्हन सदृश अभिसार कर ।

अब गले लग प्राण प्रिय से

डर भला किस बात का |

श्याम घन नभ सोहते ज्योँ ग्वाल दल घनश्याम का ।

चंचला यमुना किनारे नृत्य रत ज्योँ राधिका ||

चाहती पलकें भी बिछना…

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Added by Chhaya Shukla on August 10, 2014 at 8:30pm — 29 Comments

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