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Chhaya Shukla
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प्रदीप देवीशरण भट्ट commented on Chhaya Shukla's blog post चाँद तारे बना टाँकती रह गई
"प्यास  कैसे बुझे / बाँचती रह गई बहुत खूब छाया जी"
Dec 2, 2019

Profile Information

Gender
Female
City State
Varanasi (U.P.)
Native Place
New Delhi
Profession
Teacher
About me
poet & writer

Chhaya Shukla's Blog

दोहे

जीवन हमको बुद्ध का , देता है सन्देश |

रक्षा करना जीव की , दूर रहेगा क्लेश ||1||

भोग विलास व नारियां, बदल न पाई चाल |

योग बना था संत का, छोड़ दिया जंजाल ||2||

मन वीणा के तार को, कसना तनिक सहेज |

ढीले से हो बेसुरा , अधिक कसे निस्तेज ||3||

बंधन माया मोह का , जकड़े रहता पाँव |

जिस जिसने छोड़ा इसे , बसे ईश के गाँव ||4||

धन्य भूमि है देश की, जन्मे संत महान |

ज्ञान दीप से जगत का,हरे सकल अज्ञान ||5||

.…

Continue

Posted on May 10, 2017 at 2:00pm — 9 Comments

चाँद तारे बना टाँकती रह गई

212  212 
झाँकती रह गई |
ताकती रह गई |


चाँद तारे बना
टाँकती रह गई |


अंत है कब कहाँ
आँकती रह गई |


चाशनी हाथ ले 
बाँटती रह गई |


साँच को आँच थी
हाँकती रह गई |


रेत में जब फँसी
हाँफती रह गई |


प्यास कैसे बुझे
बाँचती रह गई |
(मौलिक अप्रकाशित)

 

 

Posted on May 9, 2017 at 9:30pm — 12 Comments

"तुमने कहा था भूल जा"

लौकिक अनाम छंद 

221 2121 1221 212



तुमने कहा था भूल जा तुमको भुला दिया |

जीना कठिन हुआ भले' जीके दिखा दिया |

.

अब और कुछ न माँग बचा कुछ भी तो नहीं

इक दम था इन रगों में जो तुम पर लुटा दिया |

.

जो रात दिन थे साथ में वही छोड़ कर गये

था मोह का तमस जो सघन वो मिटा दिया |

.

अब चैन से निकल तिरे जालिम जहान से

कोई कहीं न रोक ले कुंडा लगा दिया |

.

धक धक धड़क गया बड़ा नाजुक था  मेंरा दिल 

नश्तर बहुत था तेज जो…

Continue

Posted on May 3, 2017 at 1:00pm — 10 Comments

गीत - "बूँदें मचल रही हैं"

घन स्याम नभ में’ छाया , बूदें मचल रही हैं |
है जोर अब हवा का, ये बन सँवर रही हैं |
सूरज छुपा है’ बैठा , रूठा है रश्मियों से,
धरती मगन हुई है , चाहत उबल रही है |
.....घन स्याम नभ में’ छाया , बूदें मचल रही हैं…
Continue

Posted on September 9, 2015 at 10:30am — 10 Comments

Comment Wall (4 comments)

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At 11:36am on October 22, 2014, डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव said…

छाया जी

मित्र के रूप मापक स्वागत है i  सादर i

At 6:38pm on September 10, 2014, Santlal Karun said…

आदरणीया छाया शुक्ला जी,

आप का गीत 'पुष्प हरसिंगार का' सरसरी निगाह से भक्तिपरक गीत के चक्कर में कई बार छोड़कर मैं आगे बढ़ गया था | पर 'महीन की सर्वश्रेष्ठ रचना' चुने जाने पर जब मैंने गौर से पढ़ा, तो कथ्य कुछ और ही था | इस सुन्दर गीत के लिए हार्दिक साधुवाद एवं सद्भावनाएँ तथा महीन की सर्वश्रेष्ठ रचना के चयन पर बधाई ! 

At 11:32am on September 10, 2014, डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव said…

आदरणीया छाया जी

प्रतिभा, परिश्रम और साधना  का फल है आपको ओ बी ओ द्वारा दिया गया सम्मान i यह आपको नयी उचाईंयां छूने की प्रेरणा अवश्य  देगा i मेरी शत -शत मंगल कामना i i

At 8:21pm on September 9, 2014,
मुख्य प्रबंधक
Er. Ganesh Jee "Bagi"
said…

आदरणीया  छाया शुक्ला जी,
सादर अभिवादन !
मुझे यह बताते हुए हर्ष हो रहा है कि आपकी ग़ज़ल "पुष्प हरसिंगार का" को "महीने की सर्वश्रेष्ठ रचना" सम्मान के रूप मे सम्मानित किया गया है, तथा आप की छाया चित्र को ओ बी ओ मुख्य पृष्ठ पर स्थान दिया गया है | इस शानदार उपलब्धि पर बधाई स्वीकार करे |

आपको प्रसस्ति पत्र शीघ्र उपलब्ध करा दिया जायेगा, इस निमित कृपया आप अपना पत्राचार का पता व फ़ोन नंबर admin@openbooksonline.com पर उपलब्ध कराना चाहेंगे | मेल उसी आई डी से भेजे जिससे ओ बी ओ सदस्यता प्राप्त की गई हो |

शुभकामनाओं सहित
आपका
गणेश जी "बागी
संस्थापक सह मुख्य प्रबंधक 
ओपन बुक्स ऑनलाइन

 
 
 

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