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तरही ग़ज़ल (212-212-212-212)

मेरे सुर से तेरा सुर मिलाना हुआ
और जीवन मेरा इक तराना हुआ ॥

मैने देखी है इक चलती फ़िरती ग़ज़ल
है मिजाज इस लिए शायराना हुआ ॥

आइए हमनशी बैठिए पलकों पर
बोलिए ख्वाब में कैसे आना हुआ ॥

थी दवा तो वही काम तब कर गई
जब तेरा अपने हाथों पिलाना हुआ ॥

वो भी लगने लगे अब मुझे अपने से
"जब से गैरों के घर आना जाना हुआ ॥"

...................................
पुछल्ले
...................................

हज़्म कैसे करेंगे मेरी ये ग़ज़ल
वो जो खाते हैं बारीक छाना हुआ ॥

देख के तुझ को ये ठण्डी आहें भरे
दिल मेरा बर्फ़ का कारखाना हुआ ॥

(मौलिक एवम अप्रकाशित)

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Comment by Ram Ashery 22 hours ago

manneey gupreet ji ati sunder abhivykt kiya apne apko tahedil badhai 


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Comment by गिरिराज भंडारी on February 23, 2017 at 7:50am

आदरनीय गुरप्रीत भाई , बहुत खूब सूर ग़ज़ल कही है , सभी अशार अच्छे लगे , दिली बधाइयाँ स्वीकार करें ।

Comment by Mahendra Kumar on February 22, 2017 at 8:43pm
आदरणीय गुरप्रीत जी, इस बढ़िया ग़ज़ल के लिए हार्दिक बधाई स्वीकार कीजिए।
Comment by Gurpreet Singh on February 20, 2017 at 3:34pm
आदरणीय समर कबीर जी....आपकी टिप्पणी का इंतजार था...आपसे ग़ज़ल को मिली प्रशंसा से संतुष्टि हुई कि मैं सही दिशा में बढ़ रहा हूँ..शुक्रिया sir
Comment by Samar kabeer on February 20, 2017 at 3:17pm
जनाब गुरप्रीत सिंह जी आदाब,ग़ज़ल पर आपका अभ्यास सही दिशा में हो रहा है,ये देख कर ख़ुशी हुई ।
बहुत उम्दा ग़ज़ल कही आपने,शैर दर शैर दाद के साथ मुबारकबाद पेश करता हूँ ।
पुछल्ले वाले अशआर भी ग़ज़ल में शामिल कीजिये,ये उस वक़्त होता है जब तरही मुशायरे में आप ग्यारह शैर से ज़ियादा कहें,लेकिन ब्लॉग्स पर इसकी कोई पाबंदी नहीं होती ।
Comment by Gurpreet Singh on February 20, 2017 at 2:06pm

आदरणीय आषुतोष जी.. बहुत बहुत धन्यवाद 

Comment by Gurpreet Singh on February 20, 2017 at 2:06pm

आदरणीय  मोहम्मद आरिफ  जी एकदम सही कहा आप  ने आदरणीय समर कबीर जी के बारे में.. एक्साइटमेंट में पता नहीं  मैं क्या क्या लिख गया। .. यह जानकार खिशी हुई की आप को ग़ज़ल पसंद आई,, बहुत शुक्रिया 

Comment by Gurpreet Singh on February 20, 2017 at 2:04pm

आदरणीय सुरेन्द्र नाथ सिंह 'कुशक्षत्रप जी ग़ज़ल को समय देकर पढ़ने के लिए बहुत धन्यवाद... आपको ग़ज़ल पसंद आई , यह जानकार दिल को तस्सली हुई 

Comment by Gurpreet Singh on February 20, 2017 at 2:01pm

आदरणीय सुरेन्द्र नाथ सिंह 'कुशक्षत्रप जी ग़ज़ल को समय देकर पढ़ने के लिए बहुत धन्यवाद... आपको ग़ज़ल पसंद आई , यह जानकार दिल को तस्सली हुई 

Comment by Dr Ashutosh Mishra on February 19, 2017 at 8:30pm
आदरणीय गुरुप्रीत जी बहुत बढ़िया ग़ज़ल हुयी है हार्दिक बधाई स्वीकार करें सादर

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