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क़िताब ख़ास लिखी जाएगी जो आज कोई (ग़ज़ल 'राज ')

1212  1122  1212  112/22

बह्र –मुजतस मुसम्मन मख्बून मक्सूर

 

तनाव से ही सदा टूटता समाज कोई

लगाव से ही सदा फूलता रिवाज कोई

 

पढ़ेगी कल नई पीढ़ी उन्हीं के सफ्हों को

क़िताब ख़ास लिखी जाएगी जो आज कोई

 

न ख़्वाब हो सकें पूरे कहीं बिना दौलत

बना सकी न मुहब्बत गरीब ताज कोई

 

सियासतों में बगावत नई नहीं यारों

कभी चला कहाँ आसान राजकाज कोई

 

सभी मिलेंगे यहाँ छोड़कर शरीफों को

कोई फरेबी यहाँ और चालबाज…

Continue

Added by rajesh kumari on July 13, 2016 at 1:00pm — 40 Comments

गजल( काफियों की अब करो......)

2122 2122 2122

काफियों की अब करो पहचान फिर से

पानी बहता मत करो हिमवान फिर से।1



ढ़ल रहा कबसे घड़ा में बेझिझक वह

अब अतल से तो मिले नादान फिर से।2



आज निर्मल बह रहा कहता धरा पर

प्यास बुझती हो यही अरमान फिर से।3



मैल मन का धो रही उसकी लहर है

मत सुनाओ अब गड़ा फरमान फिर से।4



काफिये का जल बँधेगा कब हदों में ?

तूमरी में मत उठा तूफान फिर से।5



आब कह दो या कहो पानी इसे तुम

फर्क कितना है कहो गुणवान फिर से।6



बात… Continue

Added by Manan Kumar singh on July 13, 2016 at 8:30am — 6 Comments

दोहा छ्न्द......प्रतिपल अच्छा देखिए

प्रतिपल अच्छा देखिए

आंंख चुरा कर घूमते, मिला न पाए आंख.

आखों के तारे मगर, बिखरे जैसे पांख.1

आसमान से बात कर, मत अम्बर पर थूंक.

कण्ठ-हार बन कर चमक, अवसर पर मत चूक.2

प्रतिपल अच्छा देखिए, अच्छे में उत्साह.

बालमीकि - रैदास भी, हुए ब्रह्म के शाह.3

अच्छे दिन की सोच में, बुरी नहीं यदि सोच.

दीन-हीन के दु:ख भी दूर करें  बिन खोंच.4

संसारिक उद्देश्य ने, रिश्ते गढ़े…

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Added by केवल प्रसाद 'सत्यम' on July 13, 2016 at 8:30am — 8 Comments

तरह ग़ज़ल -याद रख अगर कच्चा रास्ता नहीं होता

तरह ग़ज़ल

याद रख,अगर कच्चा रास्ता नहीं होता

आज तू सड़क पर यूँ दौड़ता नहीं होता ।

आदमी करेगा बेशर्म हरक़तें अक्सर,

ना समझ नहीं है,के जानता नहीं होता!!

तेज गति समय पहले मौत को बुलाती है

आप धीरे चलते तो हादसा नहीं होता

प्यार के मरासिम ऐसे निभाये जाते हैं

फूल को देखना तो है तोड़ना नहीं होता

क्यों ख़फा है दुनिया से,फैसला बदल अपना

इस जहाँ में हर कोई बेवफ़ा नहीं होता वो तो खूबसूरत है,हर नज़र उसी पर है

ग़म न कीजिए,वो गर आपका नहीं होता।

वो… Continue

Added by सूबे सिंह सुजान on July 13, 2016 at 1:09am — 12 Comments

नारी मन .....

नारी मन .....

एक लंबे

अंतराल के पश्चात

तुम्हारा इस घर मेंं

पदार्पण हुअा है

जरा ठहरो !

मुझे नयन भर के तुम्हें

देख लेने दो



देखूं ! क्या अाज भी

तुम्हारे भुजबंध

मेरी कमी महसूस करते हैं ?

क्या अाज भी

तुम्हारी तृषा

मे्रे सानिध्य के लिए

अातुर है ?

जरा रुको

मुझे शयन कक्ष की दीवारों से

उन एकांत पलों के

जाले उतार लेने दो

जहां अपनी नींदों को

दूर सुलाकर …

Continue

Added by Sushil Sarna on July 12, 2016 at 4:30pm — 6 Comments

मैं ग़ज़ल कहने लगा (ग़ज़ल)

2122 2122 2122 212



नींद टूटी, ख़्वाब टूटे, मैं ग़ज़ल कहने लगा

रात, दिन, लम्हात बदले, मैं ग़ज़ल कहने लगा



अक्स उसका दिल में उतरा,जैसे कोई शाइरी,

जागते, सोते, ठहरते मैं ग़ज़ल कहने लगा।



अपने दिल का हाल मुझको उन से कहना था,मगर

सामने आकर वो बैठे,मैं ग़ज़ल कहने लगा।



उनके आने से फ़िज़ा में जश्न का माहौल है,

छेड़ दी सरगम घटा ने,मैं ग़ज़ल कहने लगा।



तज्रिबे इतने दिए थे ज़ीस्त ने मेरी..मुझे,

तज्रिबों से ले के मिसरे, मैं ग़ज़ल कहने… Continue

Added by जयनित कुमार मेहता on July 12, 2016 at 2:53pm — 6 Comments

राम-रावण कथा (पूर्व पीठिका) 17

पूर्व से आगे ....

देवर्षि की योजना अंततः इंद्र की समझ में आ गयी।

देवों ने उसके अनुरूप कार्य करना भी आरंभ कर दिया।

योजना यह थी कि देव, लोकपाल, यक्ष, नाग आदि रावण का नाश नहीं कर सकते क्योंकि पितामह ब्रह्मा ने इनके विरुद्ध रावण को अभय दिया हुआ है। उसके नाश का कार्य मानवों द्वारा ही सम्पादित हो सकता है और आर्यावर्त के मानवों में उससे युद्ध के प्रति उत्साह नहीं है। अतः योजना यह थी कि बिना इस बात की प्रतीक्षा किये कि रावण कब स्वर्ग पर आक्रमण किये अभी से दक्षिणावर्त के वनवासियों को…

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Added by Sulabh Agnihotri on July 12, 2016 at 10:33am — 1 Comment

राम-रावण कथा (पूर्व-पीठिका) - 11-16

पूर्व से आगे ...

ब्रह्मा द्वारा दौहित्रों को आशीर्वाद क्या प्राप्त हुआ, सुमाली मानो मन मांगी मुराद मिल गयी थी। उसकी आँखों के सामने विष्णु के हाथों हुई विकट पराजय से लेकर रावणादि के समक्ष पितामह के आगमन तक की सारी घटनायें जैसे सजीव होकर तैर रही थीं। अब उसका एक ही लक्ष्य था अपना खोया गौरव पुनः प्राप्त करना और इस उद्देश्य की प्राप्ति में पहला सोपान था कुबेर से लंका दुबारा प्राप्त करना।

वह जानता था कि अभी वह शक्ति द्वारा कुबेर को परास्त नहीं कर सकता था किंतु इससे वह निराश नहीं था।…

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Added by Sulabh Agnihotri on July 12, 2016 at 10:00am — 3 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
ग़ज़ल - पूछ दबी तो रो देते हैं , अच्छे अच्छे -- ( गिरिराज भंडारी )

22   22   22   22   22   22 ( बहरे मीर )

हम तो रह गये देख के मंज़र, हक्के बक्के 

सारे मूछों वाले निकले ब्च्चे बच्चे

 

अजब न समझें, पूँछ दबी तो कुत्ता रोया

पूछ दबी तो रो देते हैं , अच्छे अच्छे

 

परिणामों की आशा चर्चा से मत करना

केवल बातों के निकलेंगे लच्छे लच्छे

 

हर दिमाग में छन्नी ऐसी लगी मिलेगी

सारे बाहर रह जाते हैं , सच्चे सच्चे

 

इक चावल का दाना देखो, कच्चा है गर

सारे चावल तुम्हें मिलेंगे ,…

Continue

Added by गिरिराज भंडारी on July 12, 2016 at 9:20am — 20 Comments

ममता और मौत की गलियाँ (लघु कथा ) जानकी बिष्ट वही

लगा कई दिन से छाए कुहासे बादल अपने सारे बन्धन तोड़ कर बरसने लगे।बिजली की कौंध और गरज़ से धरती काँपने लगी।ऊपर जंगल से बहते बरसाती नाले का उफान और शोर किसी के भी दिल को दहलाने के लिए काफी था।



शकुंतला ने अपनी पक्की छत वाले मकान में रज़ाई को कसकर लपेटते हुए सोचा - छोटा बेटा बिशनु अपनी घरवाली और बच्चों के साथ अपने कच्चे छप्पर में ठीक तो होगा ? बाप की जरा सी बात पर घर छोड़ अलग झोपड़ी बना कर रहने लगा। दिल कसकता है।उनके लिए।नींद आँखों से कोसो दूर थी।



" काहे करवट बदल रही हो ? लगता… Continue

Added by Janki wahie on July 12, 2016 at 8:05am — 6 Comments

घनाक्षरी छन्द :-

1) जलहरण घनाक्षरी छन्द

-------------------

यशोदा को छैया सखी,छलिया छबीलो छैल,

छेड़त है नित्य प्रति,यमुना के घाट पर ।।

कंकरिया मार मार,गगरिया फोर डारै,

ठाढ़ो ठहाके लगावै,खूब ढीठ डाँट पर ।।

छीन लेत दही दूध,लूट लेत माखन वो,

तके रोज ठाढ़ो रहै,गोकुल की बाट पर ।।

चंचल चपल चल,चितचोर श्याम लटो,

आज रात सपनें में,आइ गयो खाट पर ।।(1)





२)रूप घनाक्षरी छन्द :-



बात नहीं करें आज,रूठ गये बृजराज,

हार गए नैना सखी,श्याम मग हेर हेर… Continue

Added by कवि - राज बुन्दॆली on July 11, 2016 at 9:53pm — 10 Comments

गज़ल-दिल तेरे बिन कहीं अब बहलता नही।

वह्र-212 212 212 212

दिल तेरे बिन कहीं अब बहलता नही।
दर्द सीने में है दम निकलता नही।।

दर्द दिल का बढ़ा जा रहा है बहुत।
दर्दे दिल पे कोई जोर चलता नही।।

सिसकियों से मेरी दिल पिघलते गए।
दिल तेरा ये भला क्यूँ पिघलता नही।।

टालता हूँ बहुत ख़्वाब तेरे सनम।
टालने से मगर अब ये टलता नही।।

काश! मिल जाए तेरा सहारा मुझे।
बिन सहारे ये दिल अब सँभलता नही।।

मौलिक एवं अप्रकाशित

Added by रामबली गुप्ता on July 11, 2016 at 10:30am — 10 Comments

दोहा.... मुहावरों की सार्थकता

मुहावरों में दोहा छंद की छटा...

गाल बजा कर दल गये, जो छाती पर मूंग.

वही अक्ल के अरि यहां, बने खड़े हैं गूंग. १

शीष ओखली में दिया, जब-जब निकले पंख.

उंगली पर न नचा सके, रहे फूंकते शंख. २

डाल आग में घी करे, हवन दमन की चाह. 

अंत घड़ों पानी पियें, खुलती कलई आह. ३

फूंक-फूंक कर रख कदम, कांटों की यह राह.

खेल जान पर तोड़ना, चांद-सितारे- वाह. ४

अपने पैरों पर करें, लिये कुल्हाड़ी वार.

दोष…

Continue

Added by केवल प्रसाद 'सत्यम' on July 11, 2016 at 9:30am — 10 Comments

रिमझिम

  बरसात के मौसम में आपको ऐसा लगेगा कि बादल ब्रस रहे हैं ल्ेकिन व्े आपको और साथियों के लंुभाते और बुलाते हैं आप आवें और उनके प् ाष में उलझ कर रह जायेे। कभी-कभी ऐसा होता है वे आते हैं और झमक कर बरस जाते हैं। तब रिमझिम फुहारें मन को इतना भिगोती हैं कि मन पर लगता है लदा भार हट जाता है। मौलिक और अप्रकाषित

Added by indravidyavachaspatitiwari on July 11, 2016 at 9:08am — No Comments

जीत की हार, हार की जीत (लघुकथा)/ शेख़ शहज़ाद उस्मानी

पिछले कुछ महीनों से अपने नौजवान बेटे के विचार सुन कर और गतिविधियाँ देखकर वे बहुत परेशान चल रहे थे। आज पुस्तकालय में अपने भरोसेमंद मित्र से मुलाक़ात होने पर उन्होंने कहा, "मासाब, अगर थोड़ा समय दे सको, तो मैं अपनी समस्या आपके सामने रखूं?"



"जी बिलकुल, कहिये!"



"मासाब, मेरा बेटा कह रहा है कि उसे तो सिर्फ़ सभी धर्मों के ग्रंथों को पढ़ने व समझने में रुचि है, वह भी तुलनात्मक अध्ययन करके लोगों को अच्छी सच्ची बातें व्याख्यान देकर समझायेगा!"



"ये तो बहुत ही अच्छी बात है,… Continue

Added by Sheikh Shahzad Usmani on July 10, 2016 at 11:30pm — 17 Comments

हृदय-दान

मेरा बीसवीं सदी का पुरातन स्नेह

यह इक्कीसवीं सदी के तुम्हारे

कभी न बदलने के वायदे

स्नेह की किरणों के पुल पर 

एक संग उठते-गिरते-चलते

यह संवेदनशील हृदय कभी

तुम्हारा संबल बना था

चाँदनी-सलिल-सा तरल स्नेह

जीवन-यथार्थ का पिघला हुआ कुंदन ...

कहती थी

इसकी अमोल रत्न-सी आभा

थी तुम्हारी रातों में तेजोमय प्रेरणा

या असंतोष की धूप की छटपटाहटों में

ज्यों लहराई सनातन सत्यों की…

Continue

Added by vijay nikore on July 10, 2016 at 3:59pm — 8 Comments

ग़ज़ल - दिन ढलते ही रात को आते देख रहा हूँ

बह्र : मात्रिक



दिन ढलते ही रात को आते देख रहा हूँ

शहर से तुम को अपने जाते देख रहा हूँ



धीरे धीरे दिल ये मेरा डूब रहा है

दूर कहीं क़श्ती को जाते देख रहा हूँ



साहिल से मौजों का मिलना जाने कब हो

लहरों से लहरें टकराते देख रहा हूँ



शायद देखो मुड़ के मुझको जाते लेकिन

मायूसी आँखों में छाते देख रहा हूँ



देख रहा हूँ गुमसुम गुमसुम बैठे तुम को

तुम को ही आवाज़ लगाते देख रहा हूँ



चुपके चुपके बैठे बैठे अश्क़ बहाते

दिलवालों… Continue

Added by Mahendra Kumar on July 10, 2016 at 3:30pm — 10 Comments

"देश प्रेम" लघुकथा

कमांडर ऑफ़ चीफ़ - "शाबाश राकेश ! तुम्हारा शौर्य पराक्रम अन्य सैनिकों से अलग है । तुम्हारे शौर्य और पराक्रम में जोश है,दीवानगी है,आक्रोश है । वेल डन ।"

राकेश राणा - "यस सर । देश प्रेम मेरा परम धर्म है । देखना एक दिन मैं इस धर्म को निभाकर दिखाऊँगा । माँ को यही वचन देकर आया हूँ ।"

सीमा पर से गोली बारी शुरू हुई और देखते ही देखते युद्ध छिड़ गया । राकेश राणा अंत समय तक लड़ते लड़ते वीर गति को प्राप्त हो गया ।

तिरंगे में लिपटा ताबूत जैसे ही गाँव पहुँचा ,जन सैलाब उमड़ पड़ा । राकेश राणा की माँ…

Continue

Added by Samar kabeer on July 10, 2016 at 12:00pm — 26 Comments

कच्चा ये माटी का घर छोड़ता हूँ----Gazal

22 122 122 122

दर पर तुम्हारे बसर छोड़ता हूँ।

लो मैं तुम्हारा नगर छोड़ता हूँ।।

क्या फ़र्क है, ग़र है धड़कन तुम्हीं से।

मैं ज़िन्दगी की बहर छोड़ता हूँ।।

चिंता नहीं कर न आऊँगा मिलने।

कच्चा ये माटी का घर छोड़ता हूँ।।

तुमको नज़र लग न जाये किसी की

काज़ल ये दिल भस्म कर छोड़ता हूँ।।

खुद पे तुम्हारा यकीं कम न होये।

तुमको ग़ज़ल में अमर छोड़ता हूँ।।

मौलिक-अप्रकाशित

Added by Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" on July 10, 2016 at 11:30am — 14 Comments

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