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ग़ज़ल - दिन ढलते ही रात को आते देख रहा हूँ

बह्र : मात्रिक

दिन ढलते ही रात को आते देख रहा हूँ
शहर से तुम को अपने जाते देख रहा हूँ

धीरे धीरे दिल ये मेरा डूब रहा है
दूर कहीं क़श्ती को जाते देख रहा हूँ

साहिल से मौजों का मिलना जाने कब हो
लहरों से लहरें टकराते देख रहा हूँ

शायद देखो मुड़ के मुझको जाते लेकिन
मायूसी आँखों में छाते देख रहा हूँ

देख रहा हूँ गुमसुम गुमसुम बैठे तुम को
तुम को ही आवाज़ लगाते देख रहा हूँ

चुपके चुपके बैठे बैठे अश्क़ बहाते
दिलवालों को दर्द छुपाते देख रहा हूँ

एक मुहब्बत तोड़ रही है फिर अपना दम
फूल किताबों में मुरझाते देख रहा हूँ

मत घबराना, वो लौटेंगे, अच्छा होगा
क्या क्या दुनिया को समझाते देख रहा हूँ

(मौलिक व अप्रकाशित)

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Comment by Mahendra Kumar on July 14, 2016 at 11:32am
हार्दिक आभार, आदरणीय अशोक सर!
Comment by Ashok Kumar Raktale on July 13, 2016 at 10:41pm

एक मुहब्बत तोड़ रही है फिर अपना दम
फूल किताबों में मुरझाते देख रहा हूँ.......वाह !

आदरणीय महेंद्र कुमार जी सादर बहुत खूबसूरत गजल कही है, सभी अशआर एक से बढकर एक कहे हैं. बहुत-बहुत बधाई स्वीकारें. सादर.

Comment by Mahendra Kumar on July 13, 2016 at 8:33am

आदरणीय जयनित भाई, आपके सुझाव और ग़ज़ल को पसंद करने का हार्दिक आभार!

Comment by जयनित कुमार मेहता on July 12, 2016 at 6:07pm
उम्दा ग़ज़ल हुई है, आदरणीय महेंद्र जी।

मतले का सानी मिसरे में शब्दों का क्रम मुझे थोड़ा खटक रहा है। कैसा हो अगर उसे यूँ कर लें?-

"शहर से अपने तुमको जाते देख रहा हूँ"
Comment by Mahendra Kumar on July 12, 2016 at 11:52am
हार्दिक आभार आदरणीय गिरिराज जी, सादर!

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on July 12, 2016 at 10:38am

आदरणीय महेन्द्र भाई , बहुत अच्छी गज़ल हुई है , सभी अशआर  अच्छे हुये हैं , दिल से बधाइयाँ आपको ।

Comment by Mahendra Kumar on July 12, 2016 at 7:54am
आदरणीय श्री सुनील जी, सराहना के लिए हार्दिक आभार!
Comment by shree suneel on July 11, 2016 at 9:55pm
बहुत हीं उम्दा ग़ज़ल... व्वाहह! सारे अशआर ख़ूबसूरत हैं.
दिल से दाद हाजिर है आदरणीय महेंद्र जी. क्या कहने!
Comment by Mahendra Kumar on July 11, 2016 at 5:46pm
आदाब आदरणीय समर कबीर सर! ग़ज़ल आपको पसंद आयी इसके लिए बहुत-बहुत आभार, सादर!
Comment by Samar kabeer on July 11, 2016 at 12:02pm
जनाब महेंद्र कुमार साहिब आदाब,बहुत उम्दा ग़ज़ल हुई है,सभी अशआर बेहतर हुए हैं किसी एक की क्या बात की जाये,शैर दर शैर दाद के साथ मुबारकबाद क़ुबूल फरमाएं ।

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