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November 2017 Blog Posts

मुक्तक

आपकी याद आई खुशी दे गयी।

होंठ में इक मधुर सी हँसी दे गयी।।

जाम हाथों मे हमने न थामा कभी।

आज तेरी छुअन बेखुदी दे गयी।।

  //मौलिक व अप्रकाशित//

Added by Devendra Pandey on November 6, 2017 at 2:30pm — 6 Comments

***खरबूजा*** राहिला(लघुकथा)

"अरे अम्माँ ! आपको अहमदाबाद वाले सिद्दीक साहब याद हैं ?"

"आपको जानकर खुशी होगी कि हमने जो दो फ्लैट पसंद किए हैं, उनमें से एक उनके ही पड़ोस में है।इनको तो वही जम रहा है।"

"क्या कह रही हो..! सिद्दीक यहाँ है? बड़ी भली बहू थी उसकी बहुत ही मुहब्बती।"

उसका ज़िक्र आते ही उनकी आँखों में आज भी मुहब्बत उमड़ आयी।

" बस तो फिर डिसाइड हो गया। उसे ही फाइनल कर लेते हैं।क्यों अम्माँ ? सही है न..!"

"और दूसरा वाला फ्लैट कैसा है?"अम्माँ ने प्रतिप्रश्न किया।

"वह भी बहुत बढ़िया है ।कम तो कोई… Continue

Added by Rahila on November 6, 2017 at 2:00pm — 17 Comments

पगलाया विश्वास

आँसुओं-सिंची आस्था

हर धूल भरी पगडण्डी पर अब मानो

फैले हैं पूर्तिहीन स्वप्नों के श्मशान

अकुलाते अनुभवों के कांटेदार गहन सत्य

तकलीफ़ भरे गड्ढों में चिन्ता की छायाएँ

रहस्यात्मक अहातों के उस पार

अन्धकार-विवरों में होगी यकीनन

अनबूझे सपनों की अनबूझी बेचैनी

लौट आएँगी अनायास असंतोष भरी

स्वाभाविक  हमारी  पुरानी  वेदनाएँ

इस पर भी अनजाने-अनपहचाने, प्रिय

न जाने किस-किस आकाशीय मार्ग से

चली आती हैं…

Continue

Added by vijay nikore on November 6, 2017 at 1:43pm — 21 Comments

नफरतों को छुपाना नहीं सीखे

2 122 122 122 2

नफरतों को छुपाना नहीं सीखे।

दिल किसी का दुखाना नहीं सीखे।

चेहरे पे शिकन आज भी है पर।

दर्द किसी को बताना नहीं सीखे।

जख्म छुपाते रहे हम जमाने से ।

आंख से अश्क गिराना नहीं सीखे।

चोट इश्क में कई बार खाई पर।

प्यार में हम गिराना नहीं सीखे।

बेवफा  तुम  भले ही  बदल जाओ।
इश्क में यूँ बदलना हम नहीं सीखे।

मौलिक और अप्रकाशित

मनोज यादव

Added by manoj kumar yadav on November 6, 2017 at 11:00am — 3 Comments

जैसे चमन को फूल कली ताज़गी मिले - सलीम रज़ा रीवा

-221 2121 1221 212

जैसे चमन को फूल कली ताज़गी मिले-

वैसे ही जिंदगी तुम्हें महकी हुई मिले  



ये है दुआ तुम्हारा मुकद्दर  बुलंद …

Continue

Added by SALIM RAZA REWA on November 6, 2017 at 11:00am — 8 Comments

ग़ज़ल-रहनुमा का’ मन काला, शक्ल पर उजाला है |

काफिया : आला . रदीफ़ : है

बह्र : २१२  १२२२  २१२  १२२२

हाथ में वही अंगूरी सुरा,पियाला है

रहनुमा का’ मन काला, शक्ल पर उजाला है |

छीन ली गई है आजीविका, दिवाला है

ढूंढ़ते रहे हैं सब, स्रोत को खँगाला है ||

आसमान पर जुगनू, चाँद सूर्य धरती पर

धर्म कर्म सब कुछ, भगवान का निराला है |

सब गड़े हुए मुर्दों को, उखाड़ते नेता

अब चुनाव क्या आया, भूत को उछाला है |

राज नीति में रिश्तेदार ही, अहम है सब

वो…

Continue

Added by Kalipad Prasad Mandal on November 6, 2017 at 7:30am — 2 Comments

तेरे आने से धुंआ छँटना ही था--- पंकज कुमार मिश्र, गजल

2122 2122 212

धीरे धीरे फासला घटना ही था
हौले हौले रास्ता कटना ही था

एक भ्रम का कोई पर्दा अब तलक
मन पे अपने था पड़ा, हटना ही था

ख़ाहिशें हैं जब मेरी तुमसे ही तो
लब से तेरे नाम को रटना ही था

हर तरफ़ है लोभ प्रेरित आचरण
चित ये जग से तो मेरा फटना ही था

किस तरफ जाता कुहासा था घना
तेरे आने से धुंआ छँटना ही था

मौलिक अप्रकाशित

Added by Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" on November 5, 2017 at 10:35pm — 6 Comments

तरही गजल

तरही गजल
2122 1212 22

बिन किसी बात रूठ जाने का
क्या करें उनके इस बहाने का?

चैन मिलता है जिसको गम देकर
छोड़ता मौका कब सताने का।

ज्यों क़दम आपके पड़े तो लगा
*बख़्त जागा ग़रीब खाने का*।

जह्र देकर मिज़ाज पूछ रहे
देखो अंदाज आजमाने का।

यूँ भी दीपक कोई जले यारो
हक मिले सबको मुस्कुराने का।


मैल दिल से नहीं गया तो बोल
फाइदा ही क्या आने जाने का

मौलिक एवं अप्रकाशित

Added by सतविन्द्र कुमार राणा on November 5, 2017 at 10:00pm — 10 Comments

दिल बड़ा अपना बनाने की ज़रूरत आज है-ग़ज़ल

2122 /2122/ 2122 /212



दिल बड़ा अपना बनाने की ज़रूरत आज है

टूटते रिश्ते बचाने की ज़रुरत आज है



प्यार जितना है जताने की ज़रूरत आज है

अपनापन खुलकर दिखाने की ज़रूरत आज है



हँसते आँगन में पसर जाए न सन्नाटा कहीं

सब गिले शिकवे भुलाने की ज़रूरत आज है



दिल के रिश्तों को ज़ुबाँ से तोड़ना मुमकिन कहाँ

अपनों को अपना बनाने की ज़रूरत आज है



घर बनाना है अगर मज़बूत फिर खुद को हमे

नींव का पत्थर बनाने की ज़रूरत आज है



अपने हक़ की बात करना… Continue

Added by Gajendra shrotriya on November 5, 2017 at 7:00pm — 20 Comments

उनकी यादों की ....

उनकी यादों की ....

ये

कैसे उजाले हैं

रात

कब की गुजर चुकी

दूर तलक

आँखों की

स्याही बिखेरते

तूफ़ां से भरे

आरिज़ों पर ठहरे

ये

कैसे नाले हैं

शब् के समर

आँखों में ठहरे हैं

लबों की कफ़स में

कसमसाते

संग तुम्हारे जज़्बातों के

लिपटे

कुछ अल्फ़ाज़

हमारे हैं

हर शिकन

चादर की

करवटों की ज़ुबानी है

जुदा होकर भी

अब तलक

ज़िंदा हैं हम

ख़ुदा कसम

ये…

Continue

Added by Sushil Sarna on November 4, 2017 at 8:30pm — 10 Comments

कुण्डलिया छंद -

कैसी खिचड़ी पक रही, कैसा है ये खेल।
घी खिचड़ी किसको मिले, किसको खिचड़ी तेल।।
किसको खिचड़ी तेल, कौन खायेगा रूखी।
जनता जो है आम, रहेगी फिर भी भूखी।।
खिचड़ी की औकात, कभी भी थी क्या ऐसी।
अब यह चर्चा आम, पकेगी खिचड़ी कैसी।।
(मौलिक व अप्रकाशित)
**हरिओम श्रीवास्तव**

Added by Hariom Shrivastava on November 4, 2017 at 12:21pm — 6 Comments

(ग़ज़ल - इस्लाह के लिए) अक्सर तन्हाई में रोया करता हूँ -(गुरप्रीत सिंह)

22-22-22-22-22-2



अक्सर तन्हाई में रोया करता हूँ।

अपने आँसू ख़ुद ही पोंछा करता हूँ।



देर तलक आईना देखा करता हूँ।

जाने उसमें किसको ढूँढा करता हूँ।



दिल में दर्द उठे तो फ़िर क्या करता हूँ?

बस उसकी तस्वीर से शिक्वा करता हूँ।



क्या वो अब भी याद मुझे करता होगा?

ख़ुद से ऐसी बातें पूछा करता हूँ।



एक न इक दिन पत्थर पिघलेगा पगले!

ये कह के दिल को बहलाया करता हूँ।



शाम ढले वो तोड़ दिया करता हूँ मैं,

सुब्ह जो अक्सर ख़ुद… Continue

Added by Gurpreet Singh jammu on November 4, 2017 at 11:30am — 12 Comments

ग़ज़ल - जानवर कितने समझदार मिले

बह्र- फाइलातुन मुफाइलुन फैलुन

2122 1212 22



शेर की खाल में सियार मिले।

जानवर कितने समझदार मिले।



मुझसे जो दूर दूर रहते थे,

जब पड़ा काम बार बार मिले।



जिनकी किस्मत में सिर्फ बीड़ी है,

उनके होठो पे कब सिग़ार मिले।



हर किसी की यही तमन्ना है,

देश में सबको रोजगार मिले।



कैसी हसरत है नौजवानों की,

उनको शादी मैं मँहगी कार मिले।



उसने टरका दिया हमें हर बार,

उससे दफ्तर में जितनी बार मिले।



अपनी किस्मत… Continue

Added by Ram Awadh VIshwakarma on November 3, 2017 at 10:39pm — 14 Comments

लघुकथा-- परिचय

" जी , आपका परिचय ?"
" मुझे 'धर्मनिरपेक्षता' कहते हैं ।"
" बहुत ख़ूब ! आपके साथ ये कौन है ?"
" ये मेरी बड़ी बहन ' राष्ट्रीयता ' है ।"
" लेकिन आपने अपना परिचय नहीं दिया , आप कौन ?"
" मेरा कोई एक परिचय हो तो दूँ । फिर भी कुछ लोग मुझे वादे , नारे , भाषण-राशन , बयानबाज़ी , आशीर्वाद की भूखी 'राजनीति' कहते हैं ।"
राष्ट्रीयता तिलमिलाकर बोली-" सीधे-सीधे क्यों नहीं कहती कि मुझे 'चरित्रहीन' कहते हैं ।"
मौलिक एवं अप्रकाशित ।

Added by Mohammed Arif on November 3, 2017 at 10:10pm — 15 Comments

सार छंद -

गांधी के सपनों का भारत, कौन बनाए पूरा।

देखा था जो राष्ट्रपिता ने, सपना रहा अधूरा।।

जात-पाँत का भेद मिटेगा,अमन चैन आएगा।

श्रमजीवी घर में दो रोटी, सुबह शाम खाएगा।।1।।



सब हाथों को काम मिलेगा, हर घर में उजियारा।

कृषक और मजदूर कभी भी, फिरे न मारा-मारा।।

हस्तशिल्प लघु उद्योगों को, मूल्य मिलेगा पूरा।

चढ़े न कर्जा कभी कृषक पर, खाये भाँग धतूरा।।2।।



धर्म पंथ में बाँटा किसने, क्यों तकरार मचाई।

वितरण भी असमान हो रहा, बढ़ती जाती खाई।।

जैसे यहाँ… Continue

Added by Hariom Shrivastava on November 3, 2017 at 3:23pm — 10 Comments

जलकर करता उजियारा (गीत)

गीत - मुखड़ा -

करे तमस को दूर दीप ही, दूर भागता अँधियारा |

दीप निभाये धर्म सदा ही, जलकर करता उजियारा ||

सूर्य किरण उठ भोर झाँकती, नित्य सदा ही खिड़की से

दीन करे विश्राम डरे बिन, सदा मेघ की घुड़की से ।।

दीन-हीन के द्वार जहाँ भी, घिरने लगता अँधियारा

दीप निभाये धर्म सदा ही, जलकर करता उजियारा ।

दीप जलाएं द्वारें जाकर, छँटे दीन का अन्धेरा ।

सबको दे उजियार दीप ही,पर खुद का नही सवेरा ।।

दुख दर्दों की मार झेलता, दीन हीन सा…

Continue

Added by लक्ष्मण रामानुज लडीवाला on November 3, 2017 at 2:00pm — 9 Comments

गजल(हर दफा

हर दफा कुछ बात रह जाती है

रेत वाली भीत ढ़ह जाती है।1



था गुमां अपना परिंदों पर भी

इक चिड़ी गुलाम कह जाती है।2



जब्त सारी ख्वाहिशें हैं,कह तो

एक भी कोई निबह जाती है?3



साँझ उतरे जब गगन का रूप ले

नज्र यह प्यासी उछह जाती है।4



चाँद मुट्ठी में नहीं आता अब

चाँदनी अंतर को' मह जाती है।5



इक लहर आसार है साहिल का

क्यूँ हवा हर बार बह जाती है।6



लाख सितम बरपा' लो,सालो भी,

यह जमीं लाचार सह जाती है।7

"मौलिक व… Continue

Added by Manan Kumar singh on November 3, 2017 at 10:13am — 10 Comments

गीत... हर आहट पर यूँ लगता है जैसे हों साजन आये-बृजेश कुमार 'ब्रज'

हर आहट पर यूँ लगता है

जैसे हों साजन आये



घिर घिर आये कारे बादल

वैरी कोयल कूक उठी

अरमानों ने अंगड़ाई ली

और करेजे हूक उठी

बागों बीच पपीहा बोले

अमुआ डाली बौराये

हर आहट पर यूँ लगता है

जैसे हों साजन आये



खिड़की पर मायूसी पसरी

दरवाजों ने आह भरी

आँगन ज्यूँ शमशान हुआ है

कोने कोने डाह भरी

कब तक साँस दिलासा देगी

कब तक पायल भरमाये

हर आहट पर यूँ लगता है

जैसे हों साजन आये



फिर दिल ने आवाज लगाई

गौर करो… Continue

Added by बृजेश कुमार 'ब्रज' on November 2, 2017 at 6:00pm — 28 Comments

तरही ग़ज़ल (पहले ये बतला दो उसने छुप कर तीर चलाए तो)- गुरप्रीत सिंह

लाख करे कोशिश सोने की फ़िर भी नींद न आए तो।

एक अधूरा ख़्वाब किसी को सारी रात जगाए तो ।



तुम तो हौले से 'ना' कह के अपने रस्ते चल दोगे,

लेकिन किसी का अम्बर टूटे और धरती फट जाए तो ।



हाँ मैं तेरे ज़ुल्म के बारे में न ज़ुबाँ से बोलूँगा,

पर क्या होगा गर महफ़िल में आँख मेरी भर आए तो ।



फ़िर बतलाना सीने ऊपर वार बचाना है कैसे,

पहले ये बतला दो उसने छुप कर तीर चलाए तो ।



वो गर नज़रों से ही छू ले तो दिल धक धक करने लगे,

जाने क्या हो गर वो सचमुच आकर… Continue

Added by Gurpreet Singh jammu on November 2, 2017 at 1:30pm — 9 Comments

मात-पिता पर स्वतंत्र दोहे :

मात-पिता पर स्वतंत्र दोहे :

मात-पिता का जो करें, सच्चे मन से मान। 

उनके जीवन का करें , ईश सदा उत्थान !!1!!

जीवन में मिलती नहीं ,मात-पिता सी छाँव। 

सुधा समझ पी लीजिये , धो कर उनके पाँव!!2!!

मात-पिता का प्यार तो,होता है अनमोल। 

उनकी ममता का कभी, नहीं लगाना मोल !!3!!

बच्चों में बसते  सदा, मात पिता के प्राण। 

बिन उनके आशीष के, कभी न हो कल्याण!!4!!

सुशील…

Continue

Added by Sushil Sarna on November 2, 2017 at 12:30pm — 11 Comments

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