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(ग़ज़ल - इस्लाह के लिए) अक्सर तन्हाई में रोया करता हूँ -(गुरप्रीत सिंह)

22-22-22-22-22-2

अक्सर तन्हाई में रोया करता हूँ।
अपने आँसू ख़ुद ही पोंछा करता हूँ।

देर तलक आईना देखा करता हूँ।
जाने उसमें किसको ढूँढा करता हूँ।

दिल में दर्द उठे तो फ़िर क्या करता हूँ?
बस उसकी तस्वीर से शिक्वा करता हूँ।

क्या वो अब भी याद मुझे करता होगा?
ख़ुद से ऐसी बातें पूछा करता हूँ।

एक न इक दिन पत्थर पिघलेगा पगले!
ये कह के दिल को बहलाया करता हूँ।

शाम ढले वो तोड़ दिया करता हूँ मैं,
सुब्ह जो अक्सर ख़ुद से वादा करता हूँ।

मौलिक एवं अप्रकाशित

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Comment by Gurpreet Singh jammu on November 9, 2017 at 11:28am
शुक्रिया आदरणीय लक्ष्मण जी
Comment by Gurpreet Singh jammu on November 9, 2017 at 11:27am
शुक्रिया आदरणीय अजय तिवारी जी
Comment by Gurpreet Singh jammu on November 9, 2017 at 11:27am
बहुत बहुत शुक्रिया आदरणीय समर कबीर जी ..आपकी इस्लाह के मुताबिक ग़ज़ल में बदलाव कर रहा हूँ जी
Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on November 6, 2017 at 11:15pm
हार्दिक बधाई ।
Comment by Ajay Tiwari on November 6, 2017 at 12:23pm

आदरणीय गुरप्रीत जी, 

अच्छी ग़ज़ल हुई है. हार्दिक शुभकामनाएं.

बाकी आदरणीय समर साहब सब कह चुके हैं.

सादर 

Comment by Samar kabeer on November 5, 2017 at 9:46pm
जनाब गुरप्रीत सिंह जी आदाब,ग़ज़ल का प्रयास अच्छा है,बधाई स्वीजर करें ।
'पत्थर इक ना इक दिन पिघलेगा पगले'
इस मिसरे को यूँ करें तो गेयता बहतर हो जाएगी:-
'एक न इक दिन पत्थर पिघलेगा पगले'
'क्यों करता हूँ हुस्न से वफ़ा की उम्मीदें'
इस मिसरे की लय ठीक नहीं,इसे यूँ कर सकते हैं :-
'हुस्न से क्यों करता हूँ वफ़ा की उम्मीदें'
आख़री शैर के दोनों मिसरों में 'रोज़'शब्द खटकता है, इस शैर को यूँ कर सकते हैं :-
'शाम ढले वो तोड़ दिया करता हूँ मैं
सुब्ह जो अक्सर ख़ुद से वादा करता हूँ'
Comment by Gurpreet Singh jammu on November 5, 2017 at 4:51pm
शुक्रिया आदरणीय राम अवध जी ..
"क्यों करता हूँ हुस्न से वफ़ा की उम्मीदें?"
इस मिसरे में क्या बह्र के लिहाज़ के कुछ कमी है या कुछ और , मैं समझ नहीं पा रहा ..क्रुप्या इस पर कुछ क्लियर करें ...धन्यवाद
Comment by Gurpreet Singh jammu on November 5, 2017 at 4:46pm
शुक्रिया आदरणीय मोहम्मद आरिफ जी ....जी गुणीजनो कि राय का इँतज़ार है
Comment by Gurpreet Singh jammu on November 5, 2017 at 4:45pm
बहुत बहुत शुक्रिया आदरणीय सलीम जी ..
"शाम ढले मैं तोड़ दिया करता हूँ रोज़
सुब्ह को जो भी ख़ुद से वादा करता हूँ"
आख़िरी शिअर अगर ऐसे कहूँ ती क्या ठीक रहेगा? क्रुप्या बताएं
और अगर ग़ज़ल की बाकी कमियों के बारे में भी थोड़ा विस्तार से बताएं तो मेहरबानी होगी ता कि उन्हें सुधारने कि कोशिश कर सकूँ .. अगर कोई सुझाव हो तो ज़रूर दें । शुक्रिया
Comment by SALIM RAZA REWA on November 5, 2017 at 4:33pm
जनाब ग़ज़ल के लिए बधाई
अभी ग़ज़ल और मेहनत मांग रही है.
अखिर शेर के दोनों मिसरे बे बहर हो रहे हैं..

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