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दिल बड़ा अपना बनाने की ज़रूरत आज है-ग़ज़ल

2122 /2122/ 2122 /212

दिल बड़ा अपना बनाने की ज़रूरत आज है
टूटते रिश्ते बचाने की ज़रुरत आज है

प्यार जितना है जताने की ज़रूरत आज है
अपनापन खुलकर दिखाने की ज़रूरत आज है

हँसते आँगन में पसर जाए न सन्नाटा कहीं
सब गिले शिकवे भुलाने की ज़रूरत आज है

दिल के रिश्तों को ज़ुबाँ से तोड़ना मुमकिन कहाँ
अपनों को अपना बनाने की ज़रूरत आज है

घर बनाना है अगर मज़बूत फिर खुद को हमे
नींव का पत्थर बनाने की ज़रूरत आज है

अपने हक़ की बात करना ही फ़क़त काफ़ी नहीं
फ़र्ज भी अपना निभाने की ज़रूरत आज है

बूढ़ा बरगद है परेशाँ कुछ परिंदों के लिए
उनको घर वापस बुलाने की ज़रूरत आज है

प्रेम के बंधन छिटककर दूर जो भी हो गए
ये ग़ज़ल उनको सुनाने की ज़रूरत आज है
–-----------------------------
मौलिक व अप्रकाशित

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Comment

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Comment by Ajay Kumar Sharma on December 25, 2017 at 9:17pm

बहुत सुन्दर गजल

Comment by Gajendra shrotriya on November 12, 2017 at 11:37am
ग़ज़ल के प्रयास को सराहने के लिए आपका ह्रदय से आभार आ० धमेन्द्र जी।
Comment by Gajendra shrotriya on November 12, 2017 at 11:35am
ग़ज़ल की सराहना के लिए आपका बहुत आभार आ० सतविन्द्र कुमार जी।
Comment by Gajendra shrotriya on November 12, 2017 at 11:33am
हार्दिक आभार आ० ब्रजेश कुमार जी।
Comment by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on November 10, 2017 at 2:16pm

बहुत अच्छी ग़ज़ल हुई है आदरणीय गजेन्द्र जी, बधाई स्वीकार करें।

Comment by सतविन्द्र कुमार राणा on November 9, 2017 at 10:19pm
सुंदर गजल कहि आपने। हार्दिक बधाई स्वीकारें•
Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on November 9, 2017 at 8:01pm
उम्दा ग़ज़ल हुई आदरणीय..बधाइयाँ
Comment by Samar kabeer on November 7, 2017 at 8:35pm
मेरे कहे को मान देने के लिए धन्यवाद ।
Comment by Gajendra shrotriya on November 7, 2017 at 3:28pm
ग़ज़ल की सराहना के लिए आपका आभारी हूँ आ० ब्रजेश कुमार जी।
Comment by Gajendra shrotriya on November 7, 2017 at 3:26pm
ग़ज़ल से ऐब-ए-तनाफ़ुर हटाने के लिए आपका हार्दिक आभार आ० समर कबीर साहब। बहुत शुक्रिया। आपके द्वारा सुझाए अनुसार आवश्यक संशोधन कर दिया है।सादर।

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