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Ajay Kumar Sharma
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"बहुत सुन्दर रचना. बधाई स्वीकार करें.."
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"बहुत सुन्दर रचना... बधाई स्वीकार करें..."
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"मंत्रमुग्ध करती रचना पर बधाईस्वीकार करें...."
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"वाह भई वाह ! शानदार गजल. मजा आ गया...."
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May 11
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' commented on Ajay Kumar Sharma's blog post जमकर नींद सताये रे
"आ. भाई अजय जी, अच्छी रचना हुई है । हार्दिक बधाई ।"
May 7
Ajay Kumar Sharma commented on Ajay Kumar Sharma's blog post जमकर नींद सताये रे
"बहुत बहुत धन्यवाद श्रीमान"
May 6
Samar kabeer commented on Ajay Kumar Sharma's blog post जमकर नींद सताये रे
"जनाब अजय कुमार शर्मा जी आदाब,बहुत उम्दा रचना हुई है, इस प्रस्तुति पर बधाई स्वीकार करें ।"
May 6
Ajay Kumar Sharma posted a blog post

जमकर नींद सताये रे

इम्तहान के दिन में काहे ,जमकर नींद सताये रे.पुस्तक पर जब नजर पड़े ,तो दुविधा से मन काँप उठे ,काश,कहीं मिल जाती सुविधा,                                     नइया पार कराये रे .हर पन्ना पर्वत सा लागे ,लगे पंक्तियां भी भारी ,प्रश्नों की तलवार दुधारी ,रह रह आँख दिखाये रे.चार दिनों में होना ही है ,दो दो हाथ पुस्तिका से ,क्या लिक्खूंगा उत्तर उस पर ,मन मेरा भरमाये रे .इम्तहान के दिन में काहे ,जमकर नींद सताये रे...मौलिक एवं अप्रकाशित.See More
May 5
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"बहुत सुन्दर रचना."
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"बहुत सुन्दर रचना. बधाई स्वीकार करें..."
Mar 26
Ajay Kumar Sharma commented on amod shrivastav (bindouri)'s blog post फिर मैं बचपन दोहराना चाहता हूँ
"जिसमें पाटी कलम के संग हो दवात।मैं वो फिर लम्हा पुराना चाहता हूँ ।। बहुत सुन्दर रचना. बधाई हो"
Mar 24

Profile Information

Gender
Male
City State
kaushambi
Native Place
kaushambi
Profession
Ex defence personnel
About me
absolute positive thinker

मैंने भी कुछ सोंचा ---

मौन रहकर साज भी,

हैं ध्वनित होते नहीं,

कुछ बोलने दे आज,

मन की बात कहने दे मुझे।

है नहीं ख्वाहिश कि,

सुन्दर सा सरोवर मैं बनूँ

धार हूँ नदिया की मैं,

मत रोक बहने दे मुझे।

हर एक पल भी खुशनुमा,

होता नहीं तकदीर में,

हौसलों के साथ में,

कुछ गम भी सहने दे मुझे।

"अज्ञात" का आधार प्रभु,

अज्ञात का है हमसफ़र,

मत छोड़ मेरा हाथ,

अपने साथ रहने दे मुझे।

चाह इतनी भी नहीं,

सब लोग पहचाने मुझे,

अज्ञात था, अज्ञात हूँ,

अज्ञात रहने दे मुझे।।

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At 2:23am on October 2, 2015,
सदस्य कार्यकारिणी
मिथिलेश वामनकर
said…
ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार में आपका हार्दिक स्वागत है।

Ajay Kumar Sharma's Blog

जमकर नींद सताये रे

इम्तहान के दिन में काहे ,

जमकर नींद सताये रे.

पुस्तक पर जब नजर पड़े ,

तो दुविधा से मन काँप उठे ,

काश,कहीं मिल जाती सुविधा,                                     नइया पार कराये रे .

हर पन्ना पर्वत सा लागे ,

लगे पंक्तियां भी भारी ,

प्रश्नों की तलवार दुधारी ,

रह रह आँख दिखाये रे.

चार दिनों में होना ही है ,

दो दो हाथ पुस्तिका से ,

क्या लिक्खूंगा उत्तर उस पर ,

मन मेरा भरमाये रे…

Continue

Posted on May 5, 2018 at 4:54pm — 3 Comments

कैसे करे व्यंग रे...

बीत गई सर्दी , बीत गई ठंड रे ,

दिनभर लुआर बहे गर्मी प्रचंड रे ,

चार दिन की चाँदनी सा प्यारा बसंत था,

पसीने की बूंदों से भीगा अंग-अंग रे ,

स्वेटर,कमीज,कोट लिपटे कई असन वस्त्र,

छोड़छाड़ देह को हुए खंड-खंड रे ,

गर्मी की चुभन से हाल बेहाल हुआ ,

"अज्ञात" कैसे ! कैसे करे व्यंग रे .

मौलिक एवं अप्रकाशित

Posted on February 3, 2018 at 10:30pm — 4 Comments

तिरंगे की खातिर

तिरंगे की खातिर....



इस शुभ दिन पर मैं गाता हूँ,

एक गान तिरंगे की खातिर,

हर एक युवा के दिल में है,

सम्मान तिरंगे की खातिर,

उस माटी पर श्रद्धा अगाध,

उस माटी का यशगान सदा,

अनगिनत वीर हो गये जहाँ,

कुर्बान तिरंगे की खातिर.

हम जहर हलाहल पी सकते,

हम तिल तिल कर मर सकते हैं,

सह सकते हैं सारे हम,

अपमान तिरंगे की खातिर.

कुछ पाने की चाहत भी नहीं,

गर मिले बादशाहत भी नहीं,

कदमों के नीचे रखते हैं,

अरमान तिरंगे की… Continue

Posted on August 13, 2017 at 10:29am — 4 Comments

'अजय' बीते जमाने में कहीं कुछ छोड़कर आया,

जरा सा सोंचकर देखा तो मुझको याद कर आया,

'अजय' बीते जमाने में कहीं कुछ छोड़कर आया,



सजी यारों की महफिल थी बड़ा बेखौफ बचपन था,

बड़ी मजबूरियों ने रास्तों पर जाल बिछवाया,



ज़माने को समझने की बड़ी पुरजोर कोशिश की,

ज़माने की नसीहत ने ही मुझको और भरमाया,



जिन्हें अपना समझ बैठे थे सारी भूलकर शर्तें,

उन्हीं के कारनामों ने ही मुझको और तड़पाया,



सिवा तेरे जहाँ में और कोई है नहीं मेरा,

मेरे मौला , मेरे मौला तू मेरी रूह में… Continue

Posted on July 5, 2017 at 11:57pm — 6 Comments

 
 
 

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