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भले ही आईने धोये हुए हैं (फिल्बदीह ग़ज़ल 'राज')

१२२२  १२२२  १२२

चढ़े सूरज तलक सोए हुए हैं

किसी की याद में खोए हुए हैं

 

ग़ज़ल लिक्खी हुई है आंसुओं से

कहें किससे कि हम रोये हुए हैं

 

तभी भीगा हुआ तकिया मिला है

इसे अश्कों से हम धोये  हुए हैं

 

कमर टूटी ज़फ़ा की चोट खाकर 

मगर फिर भी वफ़ा ढोए हुए हैं

 

वहाँ चर्चा हमारा हो रहा है

न जाने हम कहाँ खोए हुए हैं

 

तुम्हारे दाग ज्यों के त्यों दिखेंगे

भले ही  आईने धोए हुए…

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Added by rajesh kumari on September 20, 2017 at 5:00pm — 20 Comments

ग़ज़ल

काफिया : आये ; रदीफ़ :न बने

बहर : ११२२-| ११२२  ११२२  २२/११२

      २१२२}

तंज़ सुनना तो’ विवशता है’, सुनाये न बने

दर्द दिल का न दिखे और दिखाए न बने | 

पाक से हम करे’ क्या बात बिना कुछ मतलब  

क्यों करे श्रम जहाँ’ की बात बनाए न बने |

क्या कहूँ उनके’ हुनर की, है’ अनोखा अनजान

यही’ तारीफ़ कि हमको न सताए न बने |

कर्म इंसान का’ हो ठीक सितारा जैसा

कर्म काला किया’ तो चेहरा’ दिखाए न बने…

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Added by Kalipad Prasad Mandal on September 20, 2017 at 8:10am — 13 Comments

श्राद्ध.....लघुकथा..../अलका 'कृष्णांशी'

श्राद्ध

" पर....? हर बार तो आनंद ही ..." दूसरी तरफ की कड़क आवाज़ में बात अधूरी ही रह गई

"जी ,जैसा आप ठीक समझें ,पैरी पै..." बात पूरी होने से पहले ही दूसरी तरफ से मोबाइल कट गया ....

रुआंसी सी प्राप्ति सोफे में ही धंस गई , बंद आँखों से अश्क बह निकले

"८ बरसों में जड़ें भी मिटटी पकड़ चुकी थी ......"

"पर आंगन को फूल देना कितना जरूरी है ये एहसास देवरानी के बेटा पैदा होने के बाद हुआ ....."

"नर्म हवाओं ने तूफान बन कर सब रौंदते हुए रुख जब आनंद की ओर किया तो आनंद…

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Added by अलका 'कृष्णांशी' on September 19, 2017 at 4:51pm — 6 Comments

ग़ज़ल शाम होते ही सँवर जाएंगे

2122 1122 22

चाँद बनकर वो निखर जाएंगे ।

शाम होते ही सँवर जाएंगे ।।



जख्म परदे में ही रखना अच्छा ।

देखकर लोग सिहर जाएंगे ।।



छेड़िये मत वो कहानी मेरी।

दर्द मेरे भी उभर जाएंगे ।।



घूर कर देख रहे हैं क्या अब।

आप नजरों से उतर जाएंगे।।



वक्त रुकता नहीं है दुनिया में ।

दिन हमारे भी सुधर जाएंगे ।।



क्या पता था कि जुदा होते ही ।

इस तरह आप बिखर जाएंगे ।।



ये मुहब्बत है इबादत मेरी ।

एक दिन दिल मे ठहर में… Continue

Added by Naveen Mani Tripathi on September 19, 2017 at 1:00pm — 14 Comments

तरही गजल

1222 1222 122

.

नही हमको जो भाता क्यों करें हम

कोई झूठा बहाना क्यों करें हम



हमीं से रौशनी है चार सू जब

तो बुझने का इरादा क्यूँ करें हम



खमोशी की सदा अक्सर सुनी है

न सुनने का बहाना क्यूँ करें हम



भरोसा जब नहीं खुद पे हमें ही

*वफ़ादारी का दावा क्यूँ करें हम*



हो झगड़ा आपसी सुलझाएँ खुद ही

ज़माने में तमाशा क्यों करें हम



न होता झूठ का कोई ठिकाना

फिर उसको ही तराशा क्यूँ करें हम



मौलिक…

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Added by सतविन्द्र कुमार राणा on September 19, 2017 at 6:00am — 12 Comments

जय हे काली

जय हे काली,करालि,कालिके

वसुधा का प्रांगण स्वच्छ करो

दुर्व्यसनी दुष्ट पिशाचों का

संहार करो,संहार करो



विषयी,कामातुर,कुलहंता

करते कलियों का शीलभंग

ऐसे पापी व्यभिचारियों का

तुम अंत त्वरित अविलम्ब करो



नहीं जिन्हें शील कुल की लज्जा

बढ़ रहे रक्तबीजों से जो

उन निर्लज्जों के शोणित का

खप्पर भर भरकर पान करो



पर धन हर्ता महिषासुरों का

जब दर्प भंग कर आओगी

कलियुग के शुंभ निशुंभों का

जब मान रौंदकर आओगी



तब… Continue

Added by Usha Awasthi on September 18, 2017 at 11:29pm — 7 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
ग़ज़ल - दो पहर की धूप भी अच्छी लगी ( गिरिराज भंडारी )

2122    2122    212

दो पहर की धूप भी अच्छी लगी

साथ उनके हर कमी अच्छी लगी

 

यादों की थीं खुश्बुयें फैलीं वहाँ

तुम न थे फिर भी गली अच्छी लगी

 

कब कहा मैनें कि मैं था शादमाँ

कुल मिला कर ज़िन्दगी अच्छी लगी

 

सब में रहता है ख़ुदा ये मान कर

जब भी की तो बन्दगी अच्छी लगी

हाँ, ज़बाँ से भी कहा था कुछ मगर  

जो नज़र ने थी कही, अच्छी लगी

 

दोस्ती तो थी हमारी नाम की  

पर तुम्हारी दुश्मनी,…

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Added by गिरिराज भंडारी on September 18, 2017 at 3:30pm — 17 Comments

मुट्ठी भर ताकतवर और बुद्धिमान



मुट्ठी भर 

ताकतवर 

और बुद्धिमान 

लोगों ने 

इकठ्ठा किया 

ढेर सारे लोगों को 

और 

आवाहन किया  

कहा 

"हमें इस धरती को 

स्वर्ग बनाना है 

और बेहतर बनाना है "



और हम 

चल पड़े 

तमाम जंगल काटते हुए 

पहाड़ों को रौंदते…

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Added by MUKESH SRIVASTAVA on September 18, 2017 at 3:29pm — 3 Comments

जिसे ख़यालों में रखता हूँ - सलीम रज़ा रीवा



1212 1122 1212 22

............................................

जिसे ख़यालों में रखता हूँ शायरी की तरह.

मुझे वो जान से प्यारा है जिंदगी की तरह.

.

क़सम जो खाता था उल्फ़त में जीने मरने की.

वो सामने  से गुज़रता है अजनबी की तरह.

.

यूँ ही न बज़्म  से  तारीकियाँ  हुईं रुख़सत.

कोई न कोई तो आया है रोशनी की तरह.

.

खड़े हैं छत पे  हटा कर…

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Added by SALIM RAZA REWA on September 18, 2017 at 9:30am — 22 Comments

दबी हर बात जिंदा क्यूँ करें हम (ग़ज़ल)

बह्र -मुफाईलुन मुफाईलुन फ़ऊलुन



तुम्हारा राज़ इफ़शा क्यूँ करें हम|

दबी हर बात जिन्दा क्यूँ करें हम||



न हो जो भाग्य को यारों गवारा,

फिर उसकी ही तमन्ना क्यूँ करें हम||



जगाती दर्द हो जो बात दिल में,

उसी का रोज चर्चा क्यूँ करें हम||



लगा दे आग जो सारे जहाँ में ,

कोई भी ऐसी रचना क्यूँ करें हम||



जिसे करके रहे अफ़सोस मन में,

कोई भी काम ऐसा क्यूँ करें हम||



बहन माँ बेटियाँ तुहफ़ा ख़ुदा का,

उन्ही पे कोई हिंसा… Continue

Added by नाथ सोनांचली on September 18, 2017 at 8:00am — 27 Comments

तरही ग़ज़ल

दीप रिश्तों का' बुझाया जो', जला भी न सकूँ 

प्रेम की आग की’ ये ज्योत बुझा भी न सकूँ  |

हो गया जग को’ पता, तेरे’ मे’रे नेह खबर 

राज़ को और ये’ पर्दे में’ छिपा भी न सकूँ |

गीत गाना तो’ मैं’ अब छोड़ दिया ऐ’ सनम 

गुनगुनाकर भी’ ये’ आवाज़, सुना भी न सकूँ |

वक्त ने ही किया’ चोट और हुआ जख्मी मे’रे’ दिल 

जख्म ऐसे किसी’ को भी मैं’ दिखा भी न सकूँ |

बेरहम है मे’रे’ तक़दीर, प्रिया को लिया’…

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Added by Kalipad Prasad Mandal on September 17, 2017 at 8:57pm — 11 Comments

ठहर जाता तो अच्छा था- एक ग़ज़ल बसंत की

१२२२ १२२२ १२२२ १२२२

 

मापनी 1222 1222 1222 1222

इधर  जाता तो अच्छा था, उधर जाता तो अच्छा था.

रहा भ्रम में, कहीं पर यदि, ठहर जाता तो अच्छा था.

 

उभर आता तो अच्छा था, हृदय का घाव चेहरे पर,

हमारा  दर्द  भी हद से, गुजर जाता तो अच्छा था.

 …

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Added by बसंत कुमार शर्मा on September 17, 2017 at 5:30pm — 17 Comments

ग़ज़ल ,,,,चराग़ ए सुख़न हूँ,,,,,,,

अर्कान,,,122/122/122/122



मुहब्बत में होना फ़ना चाहता हूँ

अजब में दिवाना हूँ क्या चाहता हूँ।



चराग़ ए सुख़न हूँ जला चाहता हूँ

ग़ज़ल में नया फ़लसफ़ा चाहता हूँ।



रहा कब हूँ झूटी अना का में काइल

ख़ुदाया तिरी बस रज़ा चाहता हूँ।



सुख़नवर बहुत हैं अनोखे जहाँ में

में अंदाज़ अपना जुदा चाहता हूँ।



जुनूँ ने ख़िरद से ये क्या कह दिया है

तिरी हिकमतों का पता चाहता हूँ।



जहाँ भी रहे बस महकता रहे तू

फ़कत ये ख़ुदा से दुआ… Continue

Added by Afroz 'sahr' on September 17, 2017 at 1:00pm — 20 Comments

एक पति की आत्मस्वीक्रति

  चुन्नों, मेरा चश्मा कंहा रखा है ? चुन्नो मेरी नयी वाली कमीज नहीं मिल रही है, चुन्नो तुमने मेरा रुमाल देखा है क्या? चुन्नो एक कप चाय मिलेगी क्या? चुन्नो चुन्नो चुन्नो सच घर आते ही चुन्नो चुन्नो के नाम की माला जपने लगता हूं। सच आफिस मे रहता हूं तो आफिस की छोटी छोटी बातें नही भूलती पर घर आते ही जैसे यादें हैं कि साथ छोड के फिर से आफिस मे ही दुपुक जाती हैं ये कह के कि जाओ अब अपनी चुन्नो के साथ ही रहो मेरी क्या जरुरत है वो जो है न तुम्हारी और…

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Added by MUKESH SRIVASTAVA on September 17, 2017 at 11:30am — 5 Comments

गजल(आज तो हर शख्स इतना पूछता)

2122 2122 212

आज तो हर शख्स इतना पूछता

हो गया क्या कत्ल? दिखता उस्तुरा।1



चंद घड़ियों में खबर देती रुला

मौत का मंजर यही हासिल हुआ।2



'वह' खड़ा है जुर्म के इकरार में

लग रहा अब यह जरा-सा अटपटा।3



जानते हैं लोग लगता मर्म भी

भेद कितना चुप्पियों में है छिपा!4



न्याय का डंडा खुदाया मौन क्यूँ?

देखना है,सच कहाँ तक साधता।5



चोर बन बैठे सिपाही आजकल

हो गया कितना कठिन यह भाँपना?6



रोशनी का दान भी व्यापार… Continue

Added by Manan Kumar singh on September 17, 2017 at 8:00am — 12 Comments

ग़ज़ल....धीरे धीरे रीत गया - बृजेश कुमार 'ब्रज'

22 22 22 22 22 22 22 2

यादों के गलियारे होकर जब मैं आज अतीत गया

लाख सँभाला आँखों ने पर धीरे धीरे रीत गया



नाम पुकारा कुछ ने मेरा कुछ के अश्क़ छलक आये

कुछ तस्वीरें मुस्काईं तो गूँज कहीं संगीत गया



ख्वाब सुहाने कुछ बचपन के टूट गये कुछ रूठ गये

कैसे जी को समझाऊँ मैं क्या गुजरी क्या बीत गया



ऐसा क्या माँगा था उनसे ऐसी क्या मज़बूरी थी

बीच भँवर क्यों हाथ छुड़ाकर बेदर्दी मनमीत गया



खेल रचा क्या भावों का हाथों की चन्द लकीरों ने

हार गया… Continue

Added by बृजेश कुमार 'ब्रज' on September 16, 2017 at 8:25pm — 27 Comments

ग़ज़ल नूर की -जैसे धुल कर आईना फ़िर चमकीला हो जाता है,

22/ 22/ 22/ 22/ 22/ 22/ 22/ 2 

.

जैसे धुल कर आईना फ़िर चमकीला हो जाता है,

रो लेता हूँ, रो लेने से मन हल्का हो जाता है.

.

मुश्किल से इक सोच बराबर की दूरी है दोनों में,

लेकिन ख़ुद से मिले हुए को इक अरसा हो जाता है.

.

फोकस पास का हो तो मंज़र दूर का साफ़ नहीं रहता,

मंजिल दुनिया रहती है तो रब धुँधला हो जाता है.

.

मन्दिर मस्जिद गुरुद्वारे में कोई काम नहीं मेरा

अना कुचल लेता हूँ अपनी तो सजदा हो जाता…

Continue

Added by Nilesh Shevgaonkar on September 16, 2017 at 2:30pm — 55 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
ग़ज़ल - मैं उसकी ताब से खो कर हवास बैठा था ( गिरिराज भंडारी )

1212   1122   1212   22  

नहीं ये ठीक, मैं तन्हा उदास बैठा था

मैं उसकी ताब से खो कर हवास बैठा था

                                                                                    

नज़र उठा के तेरी सिम्त कैसे करता मैं

नज़र से चल के कोई दिल के पास बैठा था

 

कहीं नदी की रवानी थमी थी पत्थर से

कहीं लिये कोई सदियों की प्यास बैठा था

 

है मोजिज़ा कि ख़ुदा का करम बहा मुझ पर   

वो तर बतर हुआ जो मेरे पास बैठा…

Continue

Added by गिरिराज भंडारी on September 16, 2017 at 8:00am — 29 Comments

मुद्दों में मुद्रायें (लघुकथा) /शेख़ शहज़ाद उस्मानी

"मैंने यह तो कहा नहीं कि शादी के बाद हम यह देश ही छोड़ देंगे! मैं तो यह कह रहा हूं कि अधिक से अधिक डॉलर जुटाने के लिए अभी से नोटों की जुगाड़ करनी चाहिए हम दोनों को!"

"सही कहा तुमने। आदर्शवादी बनने और सबका सोचने के चक्कर में न देश में मज़े कर पाये और न ही विदेश में! तुम अपने पिता से अपना हक़ मांगों और मैं दहेज़ के बजाय नक़द पैसों की बात कर लूंगी पापा से!"

अरुण के विचारों का समर्थन करते हुए मंजू ने एक बार फिर से अनुरोध करते हुए उस से कहा- "अब हमें अपनी शादी और नहीं टालनी चाहिए। इतनी… Continue

Added by Sheikh Shahzad Usmani on September 16, 2017 at 2:19am — 6 Comments

वादों की बरसात न कर

मापनी  २२ २२ २२ २ 

इतनी ज्यादा बात न कर

वादों की बरसात न कर



टूट न  जाए नाजुक दिल,

उससे भीतरघात  न कर



ख्यात न हो, कुछ बात नहीं,…

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Added by बसंत कुमार शर्मा on September 15, 2017 at 8:30pm — 18 Comments

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