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दबी हर बात जिंदा क्यूँ करें हम (ग़ज़ल)

बह्र -मुफाईलुन मुफाईलुन फ़ऊलुन

तुम्हारा राज़ इफ़शा क्यूँ करें हम|
दबी हर बात जिन्दा क्यूँ करें हम||

न हो जो भाग्य को यारों गवारा,
फिर उसकी ही तमन्ना क्यूँ करें हम||

जगाती दर्द हो जो बात दिल में,
उसी का रोज चर्चा क्यूँ करें हम||

लगा दे आग जो सारे जहाँ में ,
कोई भी ऐसी रचना क्यूँ करें हम||

जिसे करके रहे अफ़सोस मन में,
कोई भी काम ऐसा क्यूँ करें हम||

बहन माँ बेटियाँ तुहफ़ा ख़ुदा का,
उन्ही पे कोई हिंसा क्यूँ करें हम||

बमुश्किल चार दिन की ज़िंदगी में,
महब्बत छोड़ झगड़ा क्यूँ करें हम||

(मौलिक व अप्रकाशित)

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Comment by नाथ सोनांचली on September 20, 2017 at 8:32pm
आद0 अफरोज भाई जी सादर अभिवादन, शुक्रिया आपका ग़ज़ल पसन्द करने के लिए।
Comment by नाथ सोनांचली on September 20, 2017 at 8:31pm
आद0 सुरेंदर इंसान जी ग़ज़ल पर आपकी सुखनवाजी के लिए हृदय से आभार।
Comment by Afroz 'sahr' on September 20, 2017 at 8:23pm
आदरणीय सुरेंद्रजी जी बहुत बधाई आपको ग़ज़ल अच्छी कही आपने !
Comment by surender insan on September 20, 2017 at 8:11pm
वाह बहुत अच्छी ग़ज़ल हुई सुरेन्द्र जी। बहुत बहुत बधाई हो जी । सादर नमन जी
Comment by नाथ सोनांचली on September 20, 2017 at 7:31am
आद0 समर साहब जी आपका आभार, महब्बत और मुहब्बत में सही शब्द से अवगत कराने के लिए। सादर
Comment by नाथ सोनांचली on September 20, 2017 at 7:29am
आद0 बसन्त कुमार शर्मा जी आपकी ग़ज़ल पर उपस्थिति और मुबारकबाद का शुक्रिया। सादर
Comment by नाथ सोनांचली on September 20, 2017 at 7:27am
आद0 अफरोज जी सादर अभिवादन, ग़ज़ल पर आपकी उपस्थिति और मुबारकबाद का शुक्रिया।
Comment by नाथ सोनांचली on September 20, 2017 at 7:26am
आद0 तस्दीक अहमद खान जी सादर अभिवादन, आपकी मुहब्बतों का शुक्रिया।
Comment by नाथ सोनांचली on September 20, 2017 at 7:24am
आद0 मोहम्मद आरिफ भाई आपकी ग़ज़ल पर उपस्थिति और उत्साहवर्धन का अतिशय आभार,
Comment by Afroz 'sahr' on September 19, 2017 at 2:39pm
आदरणीय सुरेंद्र जी वाह ख़ूबबसूरत ग़ज़ल के लिए बधाई स्वीकार करें

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