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मुद्दों में मुद्रायें (लघुकथा) /शेख़ शहज़ाद उस्मानी

"मैंने यह तो कहा नहीं कि शादी के बाद हम यह देश ही छोड़ देंगे! मैं तो यह कह रहा हूं कि अधिक से अधिक डॉलर जुटाने के लिए अभी से नोटों की जुगाड़ करनी चाहिए हम दोनों को!"
"सही कहा तुमने। आदर्शवादी बनने और सबका सोचने के चक्कर में न देश में मज़े कर पाये और न ही विदेश में! तुम अपने पिता से अपना हक़ मांगों और मैं दहेज़ के बजाय नक़द पैसों की बात कर लूंगी पापा से!"
अरुण के विचारों का समर्थन करते हुए मंजू ने एक बार फिर से अनुरोध करते हुए उस से कहा- "अब हमें अपनी शादी और नहीं टालनी चाहिए। इतनी क्वालिफिकेशन और अनुभव हासिल करने के बाद इस देश में अब कोई नौकरी करने की इच्छा भी नहीं होती।!"
"यही बात मैं तुमसे कहना चाहता था। मुझे वीजा मिलने ही वाला है। सादगी से शादी कर के अब विदेश में ही सेटल हो जाना बेहतर है। अब हम भी वहां दोस्तों जैसी रंगीन दुनिया बसायेंगे!"- अरुण ने मंजू को सीने से लगाते हुए कहा।
"लेकिन अरुण, उस रंगीन दुनिया में रिश्तों में हम यहां जैसे रंग भर पायेंगे या नहीं? कहीं रिश्ते रंगहीन न हो जायें!"
"मंजू, रिश्तों में रंग अब जज़्बात से नहीं, मुद्रा से भरे जाते हैं, नोट, डॉलर हो या हो पाउण्ड!" अरुण ने ठहाका लगाते हुए कहा और मंजू की सवालिया नज़रें उस पर टिकी रह गईं।

(मौलिक व अप्रकाशित)

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Comment by Sheikh Shahzad Usmani on September 26, 2017 at 7:04pm
रचना पटल पर उपस्थित हो कर हौसला अफज़ाई और मार्गदर्शन प्रदान करने के लिए तहे दिल से बहुत-बहुत शुक्रिया मुहतरम जनाब शिज्जू शकूर साहब, जनाब महेंद्र कुमार साहब, आदरणीय कल्पना भट्ट जी, आदरणीय सुरेन्द्र नाथ सिंह 'कुशक्षत्रप' जी, आदरणीय सलीम रज़ा रेवा साहब और आदरणीय समर कबीर साहब।
Comment by Samar kabeer on September 17, 2017 at 9:52pm
जनाब शैख़ शहज़ाद उस्मानी जी आदाब,बहुत उम्दा लघुकथा लिखी आपने,इस प्रस्तुति पर बधाई स्वीकार करें ।
Comment by KALPANA BHATT ('रौनक़') on September 17, 2017 at 7:34pm

आ सुरेन्द्र नाथ जी से सहमत हूँ आदरणीय शहजाद जी | सादर |

Comment by सुरेन्द्र नाथ सिंह 'कुशक्षत्रप' on September 17, 2017 at 4:23am
आद0 शेख शहज़ाद उस्मानी साहब सादर अभिवादन। चुकि लगभग हर लघुकथा आपकी पड़ता हूँ, और आप बेहद उम्दा लिखते बी हैं, इसलिए आपका प्रशंशक भी हूँ, पर इस लघुकथा में मुझे उस कसावट की कमी लगी, जो दूसरी में होती है।
आपके कथानक और एक प्रश्न छोड़ती लघुकथा के लिए कोटिस बधाइयाँ।
Comment by SALIM RAZA REWA on September 16, 2017 at 7:04pm
जनाब उस्मानी साहब,
ख़ूबसूरत कहानी के लिए मुबारक़बाद,

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by शिज्जु "शकूर" on September 16, 2017 at 1:57pm

लघुकथा के शिल्प पर तो गुणीजन प्रकाश ़डालेंगे मेरी तरफ से इस प्रस्तुति के लिए बधाई

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