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श्राद्ध.....लघुकथा..../अलका 'कृष्णांशी'

श्राद्ध

" पर....? हर बार तो आनंद ही ..." दूसरी तरफ की कड़क आवाज़ में बात अधूरी ही रह गई

"जी ,जैसा आप ठीक समझें ,पैरी पै..." बात पूरी होने से पहले ही दूसरी तरफ से मोबाइल कट गया ....

रुआंसी सी प्राप्ति सोफे में ही धंस गई , बंद आँखों से अश्क बह निकले

"८ बरसों में जड़ें भी मिटटी पकड़ चुकी थी ......"

"पर आंगन को फूल देना कितना जरूरी है ये एहसास देवरानी के बेटा पैदा होने के बाद हुआ ....."

"नर्म हवाओं ने तूफान बन कर सब रौंदते हुए रुख जब आनंद की ओर किया तो आनंद ने बिना किसी से सलाह किये ये किराए का मकान ले लिया " मेरे विरोध के स्वर ये कह कर चुप करा दिए "सबके बीच भी तो तुम अकेली ही हो ,कहती नहीं हो तो क्या मुझे दिखता भी नहीं।"

पर आज....!

जाने क्या क्या सोचते हुए दिन अश्को संग ही बह गया शाम तक प्राप्ति "समझदारी दिखाने" का फैसला ले चुकी थी..... "बड़े बेटे के अधिकार छीने जा सकते है फ़र्ज़ नहीं। "

और बाजार जाकर आटे की थैली , दाल, चीनी, फल वगैरह एक बाल्टी में मग और तौलिया समेत लेकर घर आ गई।

जब मन की बात आनंद को बताई तो.... "पर बाई को क्यों , मम्मी तो पंडितों .... "

आनंद की बात को बीच में ही काटते हुए प्राप्ति बोली ......"दिल से निकली दुआएं पूर्वजो तक पहुंचाने के लिए ...

"भरे हुए पेट में खीर डालने" जैसी रस्मों का श्राद्ध जरूरी है......"

नम आँखों से आनंद ने बड़े प्यार से प्राप्ति के दोनों हाथ कस कर पकड़ लिए। हाथो से होती हुई प्रेम की अनुभूति किराये के मकान को घर बन रही थी 

"मौलिक व अप्रकाशित"

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Comment by अलका 'कृष्णांशी' on October 1, 2017 at 12:48pm

आदरणीया Nita Kasar ji ,रचना पर उत्साहवर्धक टिप्पणी के लिए हार्दिक धन्यवाद। कोशिश सफल न हो पाई, पर फिर भी और सिख कर कोशिश जरूर करूंगी।  सादर 

Comment by Nita Kasar on September 21, 2017 at 4:30pm
कथा के जरिये आपने बहुत उम्दा संदेश देना चाहा है पर स्पष्ट ना हो पाया है ।फ़िलहाल बधाई आद० अलका जी ।
Comment by अलका 'कृष्णांशी' on September 20, 2017 at 5:45pm

आदरणीय Samar Kabeer जी ,सादर अभिवादन ,रचना पर उत्साहवर्धक टिप्पणी के लिए हार्दिक धन्यवाद। सादर। 

Comment by अलका 'कृष्णांशी' on September 20, 2017 at 5:42pm

आदरणीय  Mohammed Arif  जी,सादर अभिवादन, रचना को समय देने व् कमी बताने के लिए हार्दिक आभार..... लघुकथा कहने के प्रयास में शायद में असफल हुई ,रचना लिखते वक्त बस इतना ही भाव था की  कुछ पुरानी रस्में अक्सर सिर्फ बड़ों का मान रखने के लिए निभाई जाती है। पर वही बड़े कई बार कुछ मामलों में  बड़प्पन नहीं दिखा पाते। आहत मन जब अपने हिसाब से सोचता है तब सबसे पहले उन रूढ़ियों को तोड़ता है जो प्रैक्टिकली गलत लगती है। यहां भी प्राप्ति ने श्राद्ध में  भरे पेट यानि की (पंडित जी) को दान देने के बजाए जरूरतमंद बाई (घर में कामवाली ) को दान की वस्तुए देना ज्यादा सही समझा।   सादर

Comment by Samar kabeer on September 20, 2017 at 11:58am
मोहतरमा अलका जी आदाब,लघुकथा का प्रयास अच्छा है,बधाई ।
Comment by Mohammed Arif on September 20, 2017 at 8:26am
आदरणीया अलका जी आदाब, आखिर आप इस लघुकथा के बहाने क्या कहना चाहती हैं ?

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