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खुद से मुझ को अलग करो----- ग़ज़ल पंकज मिश्र द्वारा

22 22 22 22

खुद से मुझ को अलग करो तो
फिर कहना तुम ज़िंदा भी हो

याद मुझे करते हो तुम भी
हिचकी से ये कहलाया तो

कोल कर दिया अरमाँ जिससे
कोहेनूर बन कर चमकें वो

दुर्लभ एक सुकून प्यास में
साक़ी को ही लौटाया तो

बदली छाई मानो तुमने
ज़ुल्फ़ घनी फिर बिखराया हो


मौलिक अप्रकाशित

मौलिक अप्रकाशित

Added by Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" on September 15, 2017 at 5:30pm — 16 Comments

"हिन्दी-दिवस" -अर्पणा शर्मा भोपाल

राजभाषा हिन्दी के दिवस का

अवसर है पधारा,

14 सितम्बर 1949 के दिन

देवनागरी हिन्दी को

हमने अपनी

राजभाषा स्वीकारा,

यही ऐतिहासिक दिन

हिन्दी दिवस नाम से

जाता है पुकारा,

भारत की अनेकों भाषाओं के बीच

हिन्दी का आकर्षण

सबसे न्यारा,

ज्यों विशाल समुद्र में

मिल…

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Added by Arpana Sharma on September 15, 2017 at 3:00pm — 4 Comments

ग़ज़ल (अपनी तक़दीर फिर आज़माएँगे हम )

ग़ज़ल (अपनी तक़दीर फिर आज़माएँगे हम )

-----------------------------------------------------

(फ़ाइलुन -फ़ाइलुन -फ़ाइलुन -फ़ाइलुन)

 

अपनी तक़दीर फिर आज़माएँगे हम |

उनके कुचे से वापस न जाएँगे हम |

 

ज़ुल्म कितने भी ढा ले सितमगार तू

ग़म के हर दौर में मुस्कराएँगे हम |

 

आपको तो अज़ीज़ों से फ़ुर्सत नहीं

किस तरह हाल दिल का सुनाएँगे हम |

 

जब भी मिलता है देता है वो ज़ख़्मे नौ

दस्त उलफत का कब तक मिलाएँगे…

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Added by Tasdiq Ahmed Khan on September 14, 2017 at 10:23pm — 14 Comments

अरमान और बिदाई (लघुकथा) /शेख़ शहज़ाद उस्मानी

"लगता है कि रास्ता भूल गई है।"



"काफ़ी देर से बैठी है, कोई मानसिक रोगी है या पागल है!"



"नहीं भाई, कपड़े तो साफ़ सुथरे हैं, शायद किसी से बिछड़ गई है!"



एक पेड़ के नीचे बैठी वह औरत लोगों की टिप्पणियां सुन तो रही थी लेकिन कहीं खोई हुई थी। उसके कानों में अभी भी बैंड-बाज़ों की आवाज़ें सुनाई दे रहीं थीं। फूल-मालाओं से लदे जीप में बैठे अपने पति के अपने प्रति रवैए से वह बहुत आहत थी। अत्यल्प-शिक्षित थी। बरसों से अपने बेटे-बहू के साथ ही 'किसी तरह' रह रही थी। पति द्वारा लाख… Continue

Added by Sheikh Shahzad Usmani on September 14, 2017 at 7:54pm — 6 Comments

हिंदी क्यूँ ऐसे लगती ज्यूँ वृदाश्रम की माई है ;अलका 'कृष्णांशी'

समीक्षार्थ.........छंद-- तांटक  (एक प्रयास)

*******

हिन्दी का घटता रुझान पर , भाषा में गहराई है

हिंदी क्यूँ ऐसे लगती ज्यूँ वृदाश्रम की माई है

.

नव पीढ़ी ने हिंदी में अब, लिखना पढ़ना छोड़ा है

परिवर्तन ऐसा आया दिल ,अंग्रेजी से जोड़ा है

निज भाषा का परचम लहराने का करते हैं दावा

मंचों से ही है चिंतन अंग्रेजी पर बोलें धावा

.

अंग्रेजी स्टेटस सिंबल है, हिंदी दिखती काई है

हिंदी क्यूँ ऐसे लगती ज्यूँ वृदाश्रम की माई है

.…

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Added by अलका 'कृष्णांशी' on September 14, 2017 at 7:00pm — 15 Comments

अधकटा पेड़(लघुकथा)

सुंदर से बाग़ के एक कोने में एक अधकटा पेड़ लोगों को आकर्षित तो कर रहा था पर उसकी बदसूरती पर लोग तरह तरह की बातें कर रहे थे |

और क्यों न हो चर्चा उसकी , एक बड़ा सा पेड़ जिसकी छाँव में कभी लोग बैठा करते थे आज उसकी ऐसी हालत ! एक तरफ से लग रहा थे मानो किसीने उसकी टहनियों को तोड़ कर उसकी खूबसूरती को उससे छीन लिया था |" पर ऐसा कोई क्यों करेगा ?" एक राहगीर ने दूसरे से पूछा |

" मुझे लगता है यह काम माली का ही होगा | बड़ा पागल होगा यह माली , पेड़ की कटाई करनी हो तो ढंग से तो करता |" मुँह बिचकाते…

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Added by KALPANA BHATT ('रौनक़') on September 14, 2017 at 4:30pm — 10 Comments

ग़ज़ल (सबसे रहे ये ऊँची मन में हमारी हिन्दी)

भाषा बड़ी है प्यारी जग में अनोखी हिन्दी,

चन्दा के जैसे सोहे नभ में निराली हिन्दी।



पहचान हमको देती सबसे अलग ये जग में,

मीठी जगत में सबसे रस की पिटारी हिन्दी।



हर श्वास में ये बसती हर आह से ये निकले,

बन के लहू ये बहती रग में ये प्यारी हिन्दी।



इस देश में है भाषा मजहब अनेकों प्रचलित,

धुन एकता की डाले सब में सुहानी हिन्दी।



शोभा हमारी इससे करते 'नमन' हम इसको,

सबसे रहे ये ऊँची मन में हमारी हिन्दी।





आज हिन्दी दिवस…

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Added by बासुदेव अग्रवाल 'नमन' on September 14, 2017 at 11:30am — 65 Comments

हिंदी की हकीकत(लघु कथा)

हिंदी की हकीकत

*****

विभाग(संस्था) में राजभाषा के कार्यान्वयन की समीक्षा का कार्यक्रम चल रहा था। बुलाया तो सभी अधीनस्थ विभागों के आला अधिकारियों को गया था।पर कुछ विभागों से जरा उच्च पदस्थ अधिकारियों को छोड़ दिया जाय,तो शेष विभागों से कुछ कम वरीय अधिकारी ही उपस्थित हुए थे।किसी विभाग का कार्यकलाप पूर्व में रिपोर्ट किये गए स्तर से बेहतर था,तो किसीका ले देकर यथावत।यथोचित टिप्पणियाँ प्रेषित की जा रही थीं।राजभाषा में किये गए अच्छे कार्यों की सराहना के शब्द उच्चरित हो रहे थे।यथाक्रम एक विभाग… Continue

Added by Manan Kumar singh on September 14, 2017 at 7:56am — 7 Comments

निहारता तो हूँ तुम्हें, चोरी से चुपके से- गजल, पंकज मिश्र

1212 1212 222 222

निहारता तो हूँ तुम्हें, चोरी से चुपके से
विचारता तो हूँ तुम्हें, झपकी ले चुपके से

कभी तुम्हारे नाम से ज्यादा कुछ लिक्खा कब?
सँवारता तो हूँ तुम्हें, कॉपी पे चुपके से

मिलन को जब भी तुम मेरे सपनों में आई हो
निखारता तो हूँ तुम्हें, लाली दे चुपके से

बजे है जल तरंग सी छन छन तेरी पायल जब
उतारता तो हूँ तुम्हें, वंशी पे चुपके से

उदासियों से जब भी घिर जाता है मेरा मन
पुकारता तो हूँ तुम्हें, आ भी रे चुपके से

Added by Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" on September 14, 2017 at 12:05am — 12 Comments

ग़ज़ल

1222 1222 122

रकीबों को उठाया जा रहा है ।

किसी पर जुल्म ढाया जा रहा है ।।



मैं छोड़आया तुम्हारी सल्तनत को।

मगर चर्चा चलाया जा रहा है ।।



मुखौटे में मिले हैं यार सारे ।

नया चेहरा दिखाया जा रहा है।।



सुखनवर की किसी गंगा में देखा ।

नया सिक्का चलाया जा रहा है ।।



सही क्या है गलत क्या है ग़ज़ल में ।

नया कुछ इल्म लाया जा रहा है ।।



अदब से वास्ता जिसका नहीं था ।

उसे आलिम बताया जा रहा है ।।



सिकेंगी रोटियां अब… Continue

Added by Naveen Mani Tripathi on September 13, 2017 at 5:30pm — 11 Comments

गज़ल - बेटों से कहीं ज्यादा मैं बेटी की तरफ हूं

सोने की चमक छोड़ के मिट्टी की तरफ हूं

बेटों से कहीं ज्यादा मैं बेटी की तरफ हूं



तुम लोग तो जालिम के तरफदार हो लेकिन

मैं आज भी इस देश में गांधी की तरफ हूं



जब साथ दिया मैंने किसी अहले सितम का

एहसास हुआ मुझको मैं गलती की तरफ हूं



आंखो को मेरी ख्वाब ना दौलत के दिखाओ

मैं भूख से बेचैन हूं रोटी की तरफ हूं



मैं डूबने दूंगा ना गरीबों का सफीना

तूफां के मुकाबिल हूं मैं मांझी की तरफ हूं



ये शहर का माहौल मुबारक हो आपको

मैं…

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Added by Er Kumar Nusrat on September 13, 2017 at 11:00am — 12 Comments

ग़ज़ल - शर्मिन्दा कर रहा है कोई " सलीम रज़ा

.221 2121 1221 212

..................................

अपने हसीन रुख़ से हटा कर निक़ाब को,  

शर्मिन्दा  कर  रहा  है  कोई माहताब को 

.

कोई  गुनाहगार   या   परहेज़गार    हो,

रखता है रब सभी केअमल के हिसाब को 

.

उनकी निगाहे नाज़ ने मदहोश कर दिया,

मैं  ने  छुआ  नहीं है क़सम से शराब को 

.

दिल चाहता है उनको दुआ से नावाज़ दूँ,

जब देखता हूँ बाग में खिलते गुलाब को 

.

ये ज़िन्दगी तिलिस्म के जैसी है…

Continue

Added by SALIM RAZA REWA on September 13, 2017 at 8:00am — 17 Comments

ग़ज़ल - वफ़ाओं के बदले वफ़ा चाहता हूँ

बह्र : 122 122 122 122



वफ़ाओं के बदले वफ़ा चाहता हूँ

सभी की तरह मैं ये क्या चाहता हूँ



दिवानों का मुझ पर असर हो गया है

ख़ता तो नहीं की सज़ा चाहता हूँ



ख़ुदा ही सही पर हटो सामने से

मैं थोड़ी सी ताज़ा हवा चाहता हूँ



वही बस वही बस वही चाहिए बस

नहीं कुछ भी उसके सिवा चाहता हूँ



यहाँ है, वहाँ है, कहाँ है मुहब्बत

बताओ मैं उसका पता चाहता हूँ



वो कैसा था ये जानने के लिए ही

वो कैसा है ये जानना चाहता हूँ



ज़माने… Continue

Added by Mahendra Kumar on September 12, 2017 at 6:34pm — 29 Comments

दिल ये कैसे बदल गया

अरकान:'फ़ेलुन फ़ेलुन फ़ेलुन फ़ा'

दिल ये कैसे बदल गया
यादों से ही बहल गया

देखी जो तस्वीर तेरी
मेरा दिल फिर मचल गया

ज़ालिम हैं सब लोग यहाँ
दिल ये सुनकर दहल गया

डूबा था मैं यादों में
दिन तेज़ी से निकल गया

मेरा क़िस्सा सुनते ही
पत्थर का बुत पिघल गया

#संतोष
(मौलिक एवं अप्रकाशित)

Added by santosh khirwadkar on September 12, 2017 at 4:30pm — 8 Comments

ग़ज़ल - जो मुद्दत से मुझे पहचानता है

1222 1222 122

मेरी पहचान को खारिज़ किया है ।

जो मुद्दत से मुझे पहचानता है ।।



खुशामद का हुनर बख्सा है रब ने ।

खुशामद से वो आगे बढ़ रहा है ।।



जतन कितना करोगे आप साहब ।

ये भ्रष्टाचार अब तक फल रहा है ।।



यकीं होता नही जिसको खुदा पर ।

वही इंसां खुदा से माँगता है ।।



उन्हें ही डस रहें हैं सांप अक्सर ।

जो सापों को घरों में पालता है ।।



गया मगरिब में देखो आज सूरज ।

पता वह चाँद का भी ढूढता है ।।



मदारी के लिए… Continue

Added by Naveen Mani Tripathi on September 12, 2017 at 1:58pm — 13 Comments

कविता कपुतली

औरत की जिन्दगी बन गई एक कठपुतली

जिन्दगी डोर कभी इस हाथ में, तो कभी उस हाथ में

नही रहा कुछ अपने हाथ में

बचपन की डोर मॉ बाप के हाथ में

यौवन की डोर बंधी पति के हाथ में

इधर नाचती उधर नाचती

पहुची जब आखिरी पडाव में

जा पहुची बच्चों के हाथ में

औरत की जिन्दगी बन गई एक कठपुतली

सारी उमर बीत गई सोचते सोचते

क्या रहा अपने हाथ में

समझती रही सबके इशारे

करके हर अपने अरमान किनारे

औरत की जिन्दगी बन गई एक कठपुतली

सबको अपनाया सबको दुलराया

जब… Continue

Added by Sweet Panday on September 11, 2017 at 5:07pm — 5 Comments

*अनुवांशिक गुण*(लघुकथा)राहिला

पिताजी हमेशा के लिए शांत हो चुके थे ।और अपने पीछे छोड़ गए थे अपने ग़ुस्सैल स्वभाव ,बुरी आदतों और थोपे गए फैसलों के अनगिनत किस्से ।साथ ही बड़े और मंझले भाई के रूप में अपनी छाया।लेकिन अपने गिरेवान में झांकने की जुर्रत कौन करता ।भूल से यदि कोई उन्हें आईना दिखा देता, तो झट अनुवांशिक लक्षणों की आड़ में ठीकरा, पिता के सिर पर फूटता ।आज पिताजी के फूल थे।और घर की बैठक में घरु लोगों की बैठक जमी थी।

"अब बुआ !मुझे कोई क्यों दोष दे,गुस्सा तो पिताजी की ही देन है ।स्वभाव और व्यक्तित्व एक दिन में थोड़ी ना बन… Continue

Added by Rahila on September 11, 2017 at 1:30pm — 10 Comments

कविता - भावी गान

मै लिख दूंगा कोई गा देगा,

मेरा गीत अमर हो जायेगा।

अधरोँ पर शब्द मेरे होंगे

जिह्वा पर शब्द मेरे होंगे,

कण्ठो के उच्छवासोँ मे भी,

श्रवणोँ मे शब्द मेरे होंगे।

संगीत मे कोई सजा देगा,

मेरा गीत अमर हो जायेगा।

मै लिख...............

स्पन्दन मे; अजवन्दन मे,

परिहास और अभिनन्दन मे;

उत्साह और अभिलाषा मे,

करुणा मे निर्जन कानन मे।

शब्दो कि वायु बहा देगा,

मेरा गीत अमर हो जायेगा।

मै…

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Added by ARUNESH KUMAR 'Arun' on September 10, 2017 at 4:00pm — 6 Comments

वो तुम थी....

मेरे घर, मेरे शहर, मेरे लफ्जों को

एक आहट सी लगी,

कि कोई उन्हें छूकर चला गया.. 



वो ठंडी सी छुवन, 

एक भंवर सी कम्पन... 

लगा पहाड़ों से कोई 

मंदाकिनी आ गयी.. 

लगा मेरे लफ्जों को, 

एक आवाज सी मिल गयी.. 

जैसे मेरे गीतों को, 

कोई छूकर चला गया... 



उन्हें कहें भी,

क्या कहें..

किस हक़ से कहें ?

कि दीदार तो जरूरी था..

इन्तजार तो जरूरी था,

या वो ऐतबार भी जरूरी था.. 

जैसे मेरा कोई अपना हो,

जो छूकर चला…

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Added by BS Gauniya on September 10, 2017 at 2:00pm — 5 Comments

रोशनी में सिसकियां (लघुकथा) /शेख़ शहज़ाद उस्मानी

रोशनी की किरण के रास्ते को जब उस युवती ने अपनी हथेली से बाधित किया तो उसकी चारों उंगलियां लालिमा पाकर उसे भाव संसार में ले गईं।

"लोकतंत्र के चारों स्तंभों में नारी भी सक्रिय है, नारी का महान योगदान है!" यही तो उसकी मां ने उसे बताया, समझाया और फिर इस लायक बनाया कि वह आज इन सभी के संपर्क में है बतौर मीडियाकर्मी। मां की मधुर स्मृतियां उसे भाव संसार में ले गईं। कुछ पल ही गुज़रे कि उसकी आंखों से आंसू लाल गालों को गर्माहट सी देने लगे।

"परिपक्व कहलाने वाले हमारे इस लोकतंत्र के चारों स्तंभ आज… Continue

Added by Sheikh Shahzad Usmani on September 9, 2017 at 11:23pm — 12 Comments

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