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*अनुवांशिक गुण*(लघुकथा)राहिला

पिताजी हमेशा के लिए शांत हो चुके थे ।और अपने पीछे छोड़ गए थे अपने ग़ुस्सैल स्वभाव ,बुरी आदतों और थोपे गए फैसलों के अनगिनत किस्से ।साथ ही बड़े और मंझले भाई के रूप में अपनी छाया।लेकिन अपने गिरेवान में झांकने की जुर्रत कौन करता ।भूल से यदि कोई उन्हें आईना दिखा देता, तो झट अनुवांशिक लक्षणों की आड़ में ठीकरा, पिता के सिर पर फूटता ।आज पिताजी के फूल थे।और घर की बैठक में घरु लोगों की बैठक जमी थी।
"अब बुआ !मुझे कोई क्यों दोष दे,गुस्सा तो पिताजी की ही देन है ।स्वभाव और व्यक्तित्व एक दिन में थोड़ी ना बन जाता है।"बात-बेबात पर आसमान सिर पर उठा लेने वालेे बड़े भैया ने अपनी सफाई दी।
"अब जिनके बाप के कर्म पूरी ज़िंदगी ऐसे रहे हों,तो उनके पूतों को क्या कोसना।गुन तो पूरे उन्हीं के आ गए ,इसमें हम क्या कर सकते थे।बल्कि मैनें तो बहुत चाहा फूफाजी! कोई काम जमा लूँ,लेकिन उनकी कुढ़ -कुढ़ के कारण कभी कुछ नहीं कर पाया ।"अफ़सोस की मुद्रा में
कुर्सी पर बेतरतीब से बैठे मंझले भैया ने अपना आवारापन और अलाली भी पिताजी पर डाल दी।
"अरे तो अब डाल लो कोई काम ,अभी कौन सी देरी हो गयी ।"
"फूफाजी !हर काम की एक उम्र होती है ।अब वैसा मन भी नहीं रहा।"
"काम ना करने के सौ बहाने हैं ।यही हाल तेरे बाप का था।यदि अनुकंपा की अनुकंपा नहीं हुई होती तो तुम सब भीख मांग रहे होते।"बुआ तुनक कर बोली।
तभी अचानक छोटे को जाने क्या हुआ वह तेजी से उठा और बैठक से बाहर निकल गया।पीछे से ऊँची आवाज में बड़े भैया ने उसे टोका ।
"अरे तुम्हें क्या हुआ !तुम कहाँ चले?"आवाज़ सुन , वह रुका और बैठक की ड्योढ़ी तक वापस लौट के बोला-
"कुछ नहीं भैया !बस यूँ ही"
"नहीं-नहीं कुछ बात तो है।जिस तेवर में तुम उठ कर जा रहे थे ऐसा आभास होता है जैसे तुम्हें कोई बात बुरी लग गई हो।"
"बिल्कुल बुरी लगी होंगी भाईसाहब!इसे हमारी बातें। ये अम्माँ पर गया है ना ।"मंझले ने ऐसे माहौल में भी चुटकी ली।
"नहीं भाईसाहब ! बुरी तो क्या ,लेकिन मरे हुए व्यक्ति को अब इस तरह से कोसना कहाँ तक उचित है?और ये क्या बात हुई कि अम्माँ पर गया हूँ ।गया तो आप दोनों की तरह मैं भी पिताजी पर ही हूँ।वह भी मरते दम तक ज़िद्दी और अडिग रहे अपनी सोच,अपने फैसलों पर, और मैं भी ज़िद्दी और अडिग हूँ उन्हीं की तरह अपनी सोच और अपने फैसलों पर।सफल जीवन का असली गुर तो वही सिखा कर गए मुझे।तो उनके लिए ऐसी बातें कुछ असहनीय हो गई थीं।"
"ज़रा हम भी तो सुने ,ऐसा क्या सिखा गए तुझे!" मंझले भैया ने कुर्सी सीधी कर ,त्योरियां चढ़ाई।
"यही कि किसी भी स्थिति में उन जैसा नहीं बनना हैं ।"वह उन सब की प्रतिक्रिया देखे बगैर ,एक संक्षिप्त,
सपाट सा उत्तर देकर मां के कमरे की ओर बढ़ गया।




मौलिक एवम अप्रकाशित

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Comment by Rahila on Thursday
आप सभी आदरनीय सुधिजनो का बहुत-बहुत आभार।
Comment by KALPANA BHATT ('रौनक़') on September 14, 2017 at 4:25pm

सुंदर कथा हुई है आदरणीय राहिला जी | हार्दिक बधाई |

Comment by ARUNESH KUMAR 'Arun' on September 12, 2017 at 9:10pm

बेहद सुन्दर लघु कथा है ।

Comment by Mohammed Arif on September 12, 2017 at 2:27pm
आदरणीया राहिला जी आदाब, अच्छी लघुकथा । बधाई स्वीकार करें तथा गुणीजनों की बातों पर गौर करें ।
Comment by पंकजोम " प्रेम " on September 12, 2017 at 9:58am
वाह दी बहुत खूब
Comment by Rahila on September 12, 2017 at 6:38am
आदरणीय महेंद्र सर जी!बहुत-बहुत आभार रचना पर प्रतिक्रिया के लिए।बेशक़ रचना थोड़ी लंबी हो गयी।शायद किसी भी पात्र की वार्ता और प्रतिक्रिया को ना हटा पाने के मोह ने गुंजाइश पैदा कर दी।फिर काम करूंगी इसपर ।रही बात टाइपिंग समस्या की तो मैंने आदरणीय रवि सर जी!से मेसेंजर पर काफी पहले ये प्रॉब्लम शेयर की है।शायद व्यस्तता के चलते उन्होंने msg पर प्रतिक्रिया नहीं की। और समय नियोजन का प्रयास कर, मंच पर और लोगों की रचना पर प्रतिक्रिया देने की अवश्य कोशिश करूंगी।सादर
Comment by Mahendra Kumar on September 11, 2017 at 9:38pm

आ. राहिला जी, लघुकथा अच्छी है किन्तु सम्पादन की गुंजाइश मौजूद है. मेरी तरफ़ से हार्दिक बधाई स्वीकार कीजिए. इस मंच पर आ रही टाइपिंग सम्बन्धी समस्या के लिए मुझे लगता है कि आपको कार्यकारणी सदस्यों या आ. प्रधान सम्पादक जी से संपर्क करना चाहिए. आ. समर सर की बात से मैं भी सहमत हूँ. निश्चित ही दूसरी रचनाएँ भी आपकी बहुमूल्य प्रतिक्रिया का इंतज़ार करती हैं. सादर.

Comment by Rahila on September 11, 2017 at 8:41pm
आदरणीय तेजवीर सर जी !सादर आभार।
आदरणीय कबीर सर जी!आदाब,सर जी !बड़ी मुश्किल से व्यस्तता के बाबजूद खुद को सक्रिय रख पा रही हूं।दूसरी बड़ी समस्या ये है कि इस मंच पर पता नहीं क्यों टाइपिंग सपोर्ट नहीं करता।मैं कहीं और टाइप कर, कट पेस्ट से रचनाएँ और कमेंट पोस्ट करती हूँ।यहाँ जो भी टाइप करती हूं शब्द से अक्षर बन जाता है।कुछ टाइप नहीं होता ।इसलिए इस मंच से और दूर हो गयी हूँ।रचना की सराहना हेतु आभार।
Comment by Samar kabeer on September 11, 2017 at 6:00pm
मोहतरमा राहिला जी आदाब,अच्छी लगी आपकी लघुकथा,इस प्रस्तुति पर बधाई स्वीकार करें ।
एक निवेदन ये कि पटल की दूसरी रचनाएँ भी आपकी बहुमूल्य प्रतिक्रया का इन्तिज़ार करती हैं,कृपया मंच पर अपनी सक्रियता बनाये रखें ।
Comment by TEJ VEER SINGH on September 11, 2017 at 5:46pm

हार्दिक बधाई आदरणीय राहिला जी।बेहतरीन लघुकथा।

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