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स्वप्न को समर्पित (लघुकथा)

लेखक उसके हर रूप पर मोहित था, इसलिये प्रतिदिन उसका पीछा कर उस पर एक पुस्तक लिख रहा था| आज वो पुस्तक पूरी करने जा रहा था, उसने पहला पन्ना खोला, जिस पर लिखा था, "आज मैनें उसे कछुए के रूप में देखा, वो अपने खोल में घुस कर सो रहा था"

फिर उसने अगला पन्ना खोला, उस पर लिखा था, "आज वो सियार के रूप में था, एक के पीछे एक सभी आँखें बंद कर चिल्ला रहे थे"

और तीसरे पन्ने पर लिखा था, "आज…

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Added by Dr. Chandresh Kumar Chhatlani on January 13, 2016 at 5:46pm — 6 Comments

माफी



सुबह उठने के बाद रमेश की पत्नी ने कहा कि क्या दूध वाला चला जायेगा तभी जाओगे। यह सुनते ही वह तुरन्त उठ कर दूध लाने के लिए तैयार होकर जब वह बाहर आया तो अभी प्रातः काल की सुहानी हवा चल रही थी। वह धीरे-धीरे चलते हुए सामने के दूध वाले के पास पहुंचा जहां कि दूध के बर्तन लिए काफी संख्या में मुहल्ले वाले उपस्थित थे। भैंसे दूही जा रही थी। पास ही चैकी पर दूध की बड़ी सी बाल्टी रखी थी। जिसमें से ग्वाला दूध नाप कर दे र हा था।

रमेश के प हुंचते ही माना काकी ने पूछा कि रमेश देर से क्यो आये यहां तो…

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Added by indravidyavachaspatitiwari on January 13, 2016 at 4:33pm — 2 Comments

पत्थर की मूर्ति

सुना तो यह गया है, वह पत्थर की देवी थी।  पत्थर की मूर्ति। संगमरमर का तराशा हुआ बदन। एक - एक नैन नक्श, बेहद खूबसूरती से तराशे हुए। मीन जैसी ऑखें ,सुराहीदार गर्दन, सेब से गाल। गुलाब से भी गुलाबी होठ। पतली कमर। बेहद खूबसूरत देह यष्टि। जो भी देखता उस पत्थर की मूरत को देखता ही रह जाता। लोग उस मूरत की तारीफ करते नही अघाते थे। सभी उसकी खूबसूरती के कद्रदान थे। कोई ग़ज़ल लिखता कोई कविता लिखता। मगर इससे क्या। . .. ? वह तो एक मूर्ति भर थी। पत्थर की मूर्ति।

सुना तो यह भी गया था, कि वह हमेसा से…

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Added by MUKESH SRIVASTAVA on January 13, 2016 at 1:00pm — 7 Comments

शिक्षिका , प्रथम और अंतिम ( लघु - कथा ) - डॉo विजय शंकर

माँ बच्चे की प्रथम शिक्षिका होती है।
.
.
.
.
और पत्नि , पति की अंतिम शिक्षिका होती है।
.
.
क्योंकि माँ बच्चे को जो सिखाती है वो वह कभी भूलता नहीं।
और पत्नि जो सिखाती है , पति वह भूल सकता नहीं।

मौलिक एवं अप्रकाशित

Added by Dr. Vijai Shanker on January 13, 2016 at 11:20am — 11 Comments

गुल्लक - (लघुकथा ) –

गुल्लक -  (लघुकथा ) –

"क्या कमला,तूने तो परेशान करके रख दिया!आज तीन दिन बाद शक्ल दिखाई है"!

"मैम साब, मैं क्या करूं,आप ही बताओ,मेरा बेटा अस्पताल में भर्ती है,मुझे दो हज़ार रुपये चाहिये"!

"कमला,तू पहले ही दो महीने की पगार एड्वांस ले चुकी है"!

" एक एक पैसा चुका दूंगी ,मैम साब"!

"कमला, इस बार तो तू मुझे माफ़ कर दे, मेरे पास नहीं है इतने पैसे"!

सुनीता की सात साल की बेटी मिनी यह वार्तालाप सुनकर अपने कमरे में से बाहर निकली,

"कमला काकी, यह लो सत्रह सौ…

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Added by TEJ VEER SINGH on January 13, 2016 at 8:47am — 8 Comments

इन्हें रोकना मैं बहुत चाहता हूँ........

इन्हें रोकना मैं बहुत चाहता हूँ।।



ये चोरी छिनैती अपहरण की घटना

बालात्कार और अभिहरण वाली घटना

मगर,

करना कुछ मैं नहीं चाहता हूँ

हाँ !

इन्हें रोकना मैं बहुत चाहता हूँ।।



गर्भस्थ शिशु की हत्या न चाहूँ

स्त्री को उसका अधिकार चाहूँ

मगर,

लड़ना खुद मैं नहीं चाहता हूँ

हाँ !

इन्हें रोकना मैं बहुत चाहता हूँ।।



गरीबों के आँसूं द्रवित कर रहे हैं

भूखे ये बच्चे दुखित कर रहे हैं

मगर,

मरना खुद मैं नहीं चाहता… Continue

Added by Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" on January 12, 2016 at 10:50pm — 8 Comments

ग़ज़ल-नूर - माँगते इंसाफ़ किस से बिस्मिलों के वास्ते

२१२२/२१२२/२१२२/२१२ 



माँगते इंसाफ़ किस से बिस्मिलों के वास्ते

अदलिया थी दिल बिछाए क़ातिलों के वास्ते.

.

रास्ते आपस में उलझे, मंजिलें पिन्हा हुईं,     

रास्ते गरचे बने थे मंज़िलों के वास्ते.

.

साहिलों पर कश्तियाँ महफूज़ रहती हैं मगर

कश्तियाँ कब थी बनाईं साहिलों के वास्ते.

.

इक निगाहे-शोख से हम ने लड़ाई थी नज़र

चंद क़िस्से छोड़ आए महफ़िलों के वास्ते.

.

कुछ तेरा ग़म और कुछ अग्यार की तंज़-ओ-निगाह  

और भी आसाँ हुए हम मुश्किलों के…

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Added by Nilesh Shevgaonkar on January 12, 2016 at 7:30am — 12 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
गज़ल -- जिधर ग़ुज़रे उधर बांटे बुखार अपना ( गिरिराज भंडारी )

1222     1222     1222 

बजाहिर जो लगे हैं ग़मगुसार अपना

छिपा लाये हैं फूलों में वो ख़ार अपना

 

बहुत गर्मी यहाँ मौसम ने दी हमको

जिधर ग़ुज़रे उधर बांटे बुखार अपना

 

जो लूटे हैं वो वापस क्या हमें देंगे

चलो हम ही कहीं खोजें करार अपना

 

ज़रा रुकना, उन्हें गाली तो दे आयें 

नहीं अच्छा रहे बाक़ी उधार अपना

 

बुढ़ापा बोलता तो है , सहारा  ले

मगर अब भी उठाता हूँ,मैं भार अपना

 

मै सीरत…

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Added by गिरिराज भंडारी on January 12, 2016 at 7:30am — 19 Comments

नेताजी – ( लघुकथा )

 नेताजी – ( लघुकथा ) 

 "दादीजी, आज सारे गॉव की गलियों में सफ़ाई और पानी का छिड्काव हो रहा है!पंचायत घर में भी लाउड्स्पीकर बज रहा है!लोग वहां फ़ूलों की मालायें लिये खडे हैं!कोई नेताजी आ रहे हैं क्या"!

"हां मेरी बच्ची, भविष्य के नेताजी आ रहे हैं"!

“भविष्य के नेताजी, दादीजी, मैं कुछ समझी नहीं"!

"प्रधान जी का बेटा आरहा है शहर से,इस बार वही प्रधानी का चुनाव लडेगा, इसलिये इतना प्रचार किया जा रहा है"!

"यह तो अच्छी बात है,नया खून आगे आयेगा तो विकास तेज़…

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Added by TEJ VEER SINGH on January 11, 2016 at 10:38am — 20 Comments

स्वप्न

ए सी केब से उतर कर कैमरा,जूम लैंस,बाईनाकुलर सम्हाल भरतपुर बर्ड सेंचुरी में दस दिन बिताने का प्रोग्राम..

"यह क्या भाई सा ? कोई चहल पहल नहीं, बंद है क्या?"

"नहीं तो लोग आते है,दो घंटे में देख कर चले जाते हैं।"

"दो घंटे में तो अंदर झील तक ही नहीं पहुंच पायेंगे।"

"कहां की झील,सब सूखा पड़ा है।"

"यें... कहाँ गए वे दरख्त, घास के हरे भरे मैदान, झील पानी और कलरव।"

"सब झुलस गऐ, सूख गऐ, पिछली साल जो पंछी बचे थे, गर्मी में पेड़ों से पके फलों की तरह टपक गऐ, साइबेरियन क्रेन…

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Added by Pawan Jain on January 11, 2016 at 8:30am — 8 Comments

"कायापलट" लघुकथा

मसरूर पठान का नाम दूर दूर तक इज़्ज़त से लिया जाता था,ख़ानदानी आदमी थे,हज़ारों एकण ज़मीन के मालिक थे,शहाना मिज़ाज रखते थे ,सरकारी अमले में भी उनके नाम का दब दबा था,बहुत अच्छे इंसान थे,लेकिन उनकी एक बुरी आदत भी थी,उन्हें शिकार का बहुत शौक़ था,और खाने में उन्हें रोज़ शिकार किये हुए जानवर का गोश्त सब से ज़्यादा पसंद था ,वो ख़ुद जानवरों का शिकार किया करते थे,नोकर चाकर उनके साथ होते थे,एक शिकारी गाइड जो ड्राईवर भी था और जो उन्हें शिकार की जगह ले जाता था !

एक रात की बात है,मसरूर पठान अपनी शिकारी जीप में… Continue

Added by Samar kabeer on January 11, 2016 at 7:52am — 28 Comments

तू जीता है,मगर ज़िंदा नहीं है (ग़ज़ल)

1222 1222 122



अगर दिल में तेरे करूणा नहीं है

तू जीता है, मगर ज़िंदा नहीं है



वो क्या समझे किसी की अहमियत को

कि जिसने कुछ,कभी खोया नहीं है



तेरी आँखों के मयखाने में बैठा

कहे ये दिल,कोई तुझ सा नहीं है



उगाते हैं जो दाना,उनके घर में

कभी चावल,कभी आटा नहीं है



मिलेगा फल यहीं कर्मों का तेरे

अलग कोई,कहीं दुनिया नहीं है



मेरी मंज़िल खड़ी है जिस जगह पर

वहां तक रास्ता जाता नहीं… Continue

Added by जयनित कुमार मेहता on January 10, 2016 at 10:14pm — 23 Comments

ग़ज़ल

2122 ----2122 -----2122 ----212

आप की गलियों के कुछ मंज़र हमें अच्छे लगे 

ठोकरें खाते हुए पत्थर हमें   अच्छे लगे 

सुनके हर्फ़े आरज़ू माथे पे शिकनें पड़ गयीं

हुस्न के बिगड़े हुए तेवर हमें अच्छे लगे 

इस तरफ आहो फ़ुग़ाँ और उस तरफ रंगीनियाँ

अहलेज़र से मुफ़लिसों के घर हमें अच्छे लगे 

नर्म गद्दों के बजाये सो गए इक टाट पर

फ़ाक़ाकश मज़दूर के बिस्तर हमें अच्छे लगे 

वक़्ते रुख़सत ग़म के मारे आगये जो आँख…

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Added by Tasdiq Ahmed Khan on January 10, 2016 at 7:00pm — 17 Comments

भारतीय वीरों को समर्पित गजल (महर्षि त्रिपाठी )

२२१२  २२१ २२२ 

जय हिन्द की आवाज़ सीमा पर 

होगा समर आगाज़ सीमा पर 

सुधरेंगे कब हालात सीमा पर 

कबतक मरें जाबाँज सीमा पर 

जारी रही यूँ सेंध दुश्मन की 

बदलेंगे हम अल्फाज सीमा पर 

कुर्बा किया है जान वीरों नें 

रखकर वतन की लाज सीमा पर 

काटेंगे सर-ओ-हाथ दुश्मनों की 

पहना शरम का ताज सीमा पर 

 

जबतक रहें यूँ वीर भारत में 

तबतक करें हम नाज सीमा…

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Added by maharshi tripathi on January 10, 2016 at 6:20pm — 6 Comments

गजल

2212 2212 2212

कटते सिपाही ठग रही अब भीत है

बस मर्सिया पढ़ना यहाँ की रीत है।1



शर्मोहया ढूँढ़ें कहाँ,तू कह रहा-

कटते सिपाही खोखले! तू रीत है।2



बगुला बना तू रे चकाचक हो गया

गाता रहा तबसे पुराना गीत है।3



तू मछलियाँ लपका किया बस बेधड़क

जीता किसीने कह रहा निज जीत है।4



बँट ता रहा घर -बार है तेरी दुआ

रे दुखहरण! तुझसे समां भयभीत है।5



हर बार काँटा है चुभा परसे दही

रे छा रही संकट-घटा विस्फीत है।6



है फेंकता… Continue

Added by Manan Kumar singh on January 10, 2016 at 1:21pm — 2 Comments

लोक मानस के बीच का राग

भाषा क्या है ?

चेतन प्राणियों में

वैचारिक अभिव्यक्ति का साधन

भाषा होती होगी

पशु-पक्षियों की भी

बस उसे हम समझते नहीं

जैसे विश्व की तमाम भाषाये

बाहर है

ह्मारी समझ की परिधि से

पर भाषा महत्वपूर्ण इसलिए नहीं है

कि उससे मनोभावों की तरह ही

संप्रेषित होते है विचार

भाषा का महत्त्व और उसकी ताकत

लोक मानस के बीच का वह राग भी है

वह अंतर्संबंध भी है 

जिसका जन्म होता है उसी भाषा से

जिससे होता…

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Added by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on January 10, 2016 at 12:33pm — 3 Comments

मेंढक और कुँआँ (कविता)

हर मेंढक अपनी पसंद का कुँआँ खोजता है

मिल जाने पर उसे ही दुनिया समझने लगता है

 

मेढक मादा को आकर्षित करने के लिए

जोर जोर से टर्राता है

पर यह पूरा सच नहीं है

वो जोर जोर से टर्राकर

बाकी मेंढकों को अपनी ताकत का अहसास भी दिलाता है

और बाकी मेंढकों तक ये संदेश पहुँचाता है

कि उसके कुँएँ में उसकी अधीनता स्वीकार करने वाले मेंढक ही आ सकते हैं

 

गिरते हुए जलस्तर के कारण

कुँओं का अस्तित्व संकट में है

और संकट में है…

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Added by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on January 9, 2016 at 8:18pm — 6 Comments

सुनता है मेरा खुदा (लघुकथा )राहिला

"बात तब या अब की नहीं जुबान की है बहिन जी!आपकी मांग, अगर रिश्ता तय करने से पहले पता चल जाती तो हम ये रिश्ता करते ही नहीं । लेकिन शादी के ऐन सात दिन पहले ऐसी बात. ..."कह उनके चेहरे से बेबसी झलक गई।

"तो ठीक है अब तोड़ दीजिये,हमारा क्या बिगड़ेगा?बदनामी तो आपकी बेटी की होगी ।और वैसे भी आपने अपनी बेटी की शक्ल देखी है कभी?ऐसी लड़की को तो वैसे भी ज्यादा से ज्यादा ले दे के ठिकाने लगाना पड़ेगा । वो तो एहसान मानिये हमारा जो हम सिर्फ उसकी उच्च शिक्षा के बूते पर उसे कुबूल कर रहे हैं वरना.."कहते -कहते… Continue

Added by Rahila on January 8, 2016 at 10:37pm — 14 Comments

शादी (लघुकथा)

बचपन से ही मेरी माँ ने मुझे फ्राक की जगह पेंट शर्ट पहनाया, मेरा राजा बेटा बड़ा बहादुर है,सुन सुन बड़ी हुई। पर आज क्यों मेरा नाम ले लेकर रो रही हैं।

"क्या इसी दिन के लिए पढाया लिखाया अपने पैरों पर खड़ा किया?"

"माँ यह क्या घिसा पिटा डायलॉग,मैं ऐसा क्या गलत कर रही हूँ? मैं नहीं प्रदर्शित कर सकती अपने आप को ट्रे लेकर चाय के कपों के समान।"

"तो कोई अपने मन का लड़का ढूंढ ले,तुझे इतनी आजादी तो दी है।"

"क्या लडका ढूंढ लूँ,सब लिजलिजे, ढुलमुल।एक फटकार में पेंट गीला कर दें।"

"तो…

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Added by Pawan Jain on January 8, 2016 at 1:30pm — 11 Comments

मुक्तिदाता मृत्यु

मैं स्वछन्द घूमती रहती

जिसको चाहे उसे ले जाती

भनक भी न उसे लगाती

दुखो से मुक्ति झट दे जाती

मृत्यु मैं जो कहलाती

जीवन का दस्तूर बताती

लालसा को परिपूर्ण कराती

बर्बरस्ता को यूँ मिटाती

पूर्ण आनंद का अनुभव कराती

मृत्यु मैं जो कहलाती

खुले क्षितिज में तुम्हे घुमाती

जीवन- मरण का भेद कराती

रिस्तो का तुम्हे बोध करा

सत्यता की दुनिया दिखाती

मृत्यु मैं जो कहलाती

फल बुराई का तुझे दिखाती

अंत समय जब मैं…

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Added by PHOOL SINGH on January 8, 2016 at 11:30am — 3 Comments

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