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भारतीय वीरों को समर्पित गजल (महर्षि त्रिपाठी )

२२१२  २२१ २२२ 

जय हिन्द की आवाज़ सीमा पर 

होगा समर आगाज़ सीमा पर 

सुधरेंगे कब हालात सीमा पर 

कबतक मरें जाबाँज सीमा पर 

जारी रही यूँ सेंध दुश्मन की 

बदलेंगे हम अल्फाज सीमा पर 

कुर्बा किया है जान वीरों नें 

रखकर वतन की लाज सीमा पर 

काटेंगे सर-ओ-हाथ दुश्मनों की 

पहना शरम का ताज सीमा पर 

 

जबतक रहें यूँ वीर भारत में 

तबतक करें हम नाज सीमा पर 

********************************

"मौलिक व् अप्रकाशित "

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Comment by maharshi tripathi on January 12, 2016 at 7:09pm
आ. समर सर,त्रुटी इंगित करने हेतु आपका आभार, मैं त्रुटी हटा देता हूँ !!!!
Comment by maharshi tripathi on January 12, 2016 at 7:05pm
आ. गिरिराज सर,रचना पर आपकी उत्साहवर्धक प्रतिक्रिया हेतु हार्दिक आभार !!
Comment by Samar kabeer on January 12, 2016 at 5:51pm
जनाब महर्षि त्रिपाठी जी आदाब,देश भक्ति पर अच्छी ग़ज़ल कही आपने,बधाई स्वीकार करें |
चोथे शैर में "कुर्बा"शब्द सही नहीं,सही शब्द है"क़ुर्बान"या कुरबा,बा पर चन्द्र बिन्दू,देख लीजियेगा |

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on January 12, 2016 at 4:19pm

आदरणीय महर्षि भाई , बहुत सुन्दर देश भक्ति से ओत प्रोत ग़ज़ल कही है , आपको दिली बधाई

Comment by Ram Ashery on January 11, 2016 at 4:47pm

बहुत अच्छी गजल प्रस्तुत आपको बधाई 

Comment by Shyam Narain Verma on January 11, 2016 at 4:13pm
बहुत सुन्दर गजल।  ढेरों दाद कुबूल करें। सादर

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