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गुल्लक - (लघुकथा ) –

गुल्लक -  (लघुकथा ) –

"क्या कमला,तूने तो परेशान करके रख दिया!आज तीन दिन बाद शक्ल दिखाई है"!

"मैम साब, मैं क्या करूं,आप ही बताओ,मेरा बेटा अस्पताल में भर्ती है,मुझे दो हज़ार रुपये चाहिये"!

"कमला,तू पहले ही दो महीने की पगार एड्वांस ले चुकी है"!

" एक एक पैसा चुका दूंगी ,मैम साब"!

"कमला, इस बार तो तू मुझे माफ़ कर दे, मेरे पास नहीं है इतने पैसे"!

सुनीता की सात साल की बेटी मिनी यह वार्तालाप सुनकर अपने कमरे में से बाहर निकली,

"कमला काकी, यह लो सत्रह सौ पचास रुपये, इनसे आप बबलू का इलाज़ करा लो"!

"मिनी ,तुम्हारे पास इतने पैसे कहॉ से आये"!

"मम्मी, मैंने अपनी गुल्लक तोड दी"!

"पर मिनी, वह पैसे तो तुम अपनी गुडिया की शादी के दहेज़ के लिये इकट्ठा कर रही थी"!

"मम्मी, बबलू का इलाज़ ज़्यादा ज़रूरी है,  मेरी गुडिया की शादी तो बिना दहेज़ के भी हो सकती है”!

मौलिक व अप्रकाशित

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Comment by TEJ VEER SINGH on January 19, 2016 at 12:42pm

हार्दिक आभार अदरणीय गिरिराज भंडारी जी!


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on January 18, 2016 at 7:48am

आदरनीय तेज़वीर भाई , आपकी संदेश परक लघुकथा के लिये दिली बधाई ।

Comment by TEJ VEER SINGH on January 13, 2016 at 7:15pm

हार्दिक आभार आदरणीय समर क़बीर साहब जी!आप सरीखे गुणी और पारखी सख्सियत की हौसला अफ़ज़ाई मेरे जैसे मामूली लघुकथाकार के लिये बहुत मायने रखती है!कृपा बनाये रखें!

Comment by TEJ VEER SINGH on January 13, 2016 at 7:10pm

हार्दिक आभार आदरणीय मुकेश श्रीवास्तव जी!

Comment by TEJ VEER SINGH on January 13, 2016 at 7:04pm

हार्दिक आभार आदरणीय शेख उस्मानी जी!यह सब आप जैसे गुणी लोगों की सोहबत का असर है!पुनः आभार!

Comment by Samar kabeer on January 13, 2016 at 5:56pm
जनाब तेजवीर सिंह जी आदाब,कमाल लिखते हैं आप,इस शानदार सबक़ आमोज़ लघुकथा के लिये ढेरों बधाई स्वीकार करें |
Comment by MUKESH SRIVASTAVA on January 13, 2016 at 3:59pm

niceee

Comment by Sheikh Shahzad Usmani on January 13, 2016 at 3:11pm
वाााह... सहजता से गंभीर बात कहते हुए संदेश वाहक प्रस्तुति के लिए बहुत बहुत बधाई आपको आदरणीय तेज वीर सिंह जी।

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