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PHOOL SINGH
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PHOOL SINGH posted a blog post

सड़क की बेबसी

कभी खूनी, कभी कातिलकभी गुनाहों का मार्ग कहलातीजुर्म को होते देख चीखतीखून खराबे से मैं थर्रातीकभी खून की प्यासी तोकभी डायन हूँ कहलातीचाह के भी कुछ कर ना पातीबेबसी पर नीर बहाती || हैवानियत की, कभी बलात्कार की,   ना चाह मैं साक्षी बनतीहत्या कभी षडयंत्रो काअंजान देने पथ भी बनतीतैयार की गई हर साजिश को   हादसो का मैं नाम दिलाती   निर्दयता में साथ निभा तेराआत्मा को अपनी फटकार लगातीभयानक दर्द से मै चीख चीख कर  अपनी बेबसी जब नीर बहाती|| घटित हर अपराध कीगवाही देने का पुरजोर लगातीपर कशमश की स्थिति पातीकभी…See More
Wednesday
PHOOL SINGH commented on PHOOL SINGH's blog post पेड़-पोधे और हम
""कबीर साहब" को कोटि-कोटि प्रणाम और मेरी होसला अफजाई के लिए धन्यवाद|"
May 1
Samar kabeer commented on PHOOL SINGH's blog post पेड़-पोधे और हम
"जनाब फूल सिंह जी आदाब,अच्छी रचना है,बधाई स्वीकार करें ।"
Apr 29
PHOOL SINGH posted a blog post

पेड़-पोधे और हम

वो भी क्या दिन थे यारोजब मिलजुल कर मौज मनाते थेकभी पेड़ की डाल पर चढ़ जातेकभी तालाब में डुबकी लगाते थेरंग-बिरंगे फूलों से तबभरे रहते थे बाग-बगीचेसुंदर वातावरण बनाते औरआँगन को महकाते थे || कू-कू करती कोयल केहम सुर से सुर मिलाते थेरंग-बिरंगे तितलियों के पीछेसरपट दौड़ लगाते थेपक्षियों की चहचाहट मेंजैसे, खुद को ही भूल जाते थेमिलजुल कर मौज मनाते थे || स्वच्छ वायुं की कमी नहीं थीऔर हरियाली हर ओर फैली थीनीर भरे तालाब थे सारेंनदियाँ मदमस्त हो, बहती थीसमय पर ऋतुयें आतीऔर पर्यावरण में ताजगी थीपेड़ पोधे लगाकर…See More
Apr 26
PHOOL SINGH commented on PHOOL SINGH's blog post हैरान हो जाता हूँ, जब कभी
""भाई ब्रिजेश" हौसलाअफजाई के लिए आपका कोटि कोटि धन्यवाद|"
Apr 22
बृजेश कुमार 'ब्रज' commented on PHOOL SINGH's blog post हैरान हो जाता हूँ, जब कभी
"उत्तम सन्देशप्रद रचना आदरणीय..बधाई"
Apr 19
PHOOL SINGH posted a blog post

आओ मिलकर घर बनाये

ईट पत्थर से बना मकानउसमें रहते दो इंसानरिश्तों को वो कदर न करतेएक-दूजे से बात ना करतेकहने को एक मकान में रहतेपर एक-दूजे से घृणा करतेमकान की परिभाषाको सिद्ध करते || कच्ची मिटटी का एक, छोटा घरस्वर्ग से सुंदर, प्यारा घरएक परिवार की जान था, जो  प्रेम की सुंदर मिशाल था, वोसब सदस्य साथ में रहतेहसतें-खेलतें घुल-मिल रहतेनारी के सम्मान के संग सब  एक दूजे का आदर करतेंमुश्किल यदि कोई, घर पर आयेमिलजुल कर समाधान खोजतेऐसे अपने घर में रहते || आओ मिलकर धेय बनायेमकान नहीं, हम घर बनायेसंग में रहने की मंशा…See More
Apr 18
PHOOL SINGH commented on PHOOL SINGH's blog post हैरान हो जाता हूँ, जब कभी
"कबीर साहब, हौसलाअफजाई के लिए आपका बहुत बहुत धन्यवाद, मुझे खुशी है कि आप मेरी रचना को पढ़ते है और कुछ अच्छा लिखने के लिए प्ररित भी|"
Apr 16
Samar kabeer commented on PHOOL SINGH's blog post हैरान हो जाता हूँ, जब कभी
"जनाब फूल सिंह जी आदाब,अच्छी रचना हुई है,बधाई स्वीकार करें ।"
Apr 16
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Apr 16
PHOOL SINGH posted a blog post

हैरान हो जाता हूँ, जब कभी

आँखों में अश्रु निकल आते है मेरेइतिहास में जा, जब खोजता हूँनारी उत्पीडन की प्रथाओ कीकड़ी से कड़ी मै जोड़ता हूँहैरान हो जाता हूँ, जब कभीइतिहास में जा, जब खोजता हूँ कैसी नारी कुचली जातीचुप होके क्यों, सब सहती थीबालविवाह जैसी, कुरूतियों की खातिरसूली क्यों चढ जाती थीसती होने की कुप्रथा में क्योंइतिहास नया लिख जाती थीचुप होके क्यों, सब सहती थीसूली क्यों चढ जाती थी || जब कभी में सोचता हूँइंसा नहीं क्या पशु थी वोजो काम नरबलि में भी आती थीरही सही जो कसर बची तोदेवदासी बन जाती थीविधवा होने पर ना कभीशादी वो…See More
Apr 16
vijay nikore commented on PHOOL SINGH's blog post जीना हमकों सिखा दिया
"रचना अच्छी लिखी है, आदरणीय फूल सिंह जी"
Apr 16
PHOOL SINGH commented on बृजेश कुमार 'ब्रज''s blog post नवगीत-वेदना ने नेत्र खोले-बृजेश कुमार 'ब्रज'
"रातरानी खिलखिलाईरुत रचाती है सगाई आ गया मौसम बसंती प्रीत पंछी ले हिंडोले वेदना ने नेत्र खोले ब्रिजेश जी, सुंदर रचना बधाई स्वीकारें|"
Apr 15
PHOOL SINGH commented on प्रदीप देवीशरण भट्ट's blog post गांव का युवा और शहर के गिद्ध
"एक अच्छा प्रस्तुतिकरण सुंदर बधाई स्वीकारें|"
Apr 15
PHOOL SINGH commented on प्रदीप देवीशरण भट्ट's blog post श्वान  का दर्द
"श्वान हैरान परेशान घूमता रहता इधर उधर जाए भी तो जाए कहाँ गली ना कूंचा ना घर आश्चर्य अब उसे कोई भी नहीं करता है तंग अब वो भी रहता है मौन नही करता निंद्रा भंग अच्छी रचना के लिए बधाई स्वीकारें|"
Apr 15
PHOOL SINGH commented on बसंत कुमार शर्मा's blog post नवगीत- राजनीति के पंडे
"खंडित जन विश्वास हो रहा संबंधों का ह्रास हो रहा जंगल, दंगल की भाषा का, अद्भुत यहाँ विकास हो रहा   अब वादों की फसलें होंगी, मुर्गे देंगे अंडे बहुत सुंदर बधाई स्वीकारे|"
Apr 15

Profile Information

Gender
Male
City State
DELHI
Native Place
DELHI
Profession
KALSHANIA CONSULTANCY
About me
NOTHING MUCH

जीवन संगिनी

हार हार का टूट चुका जब

तुमसे ही आश बाँधी है

मैं नहीं तो तुम सही

समर्थ जीवन की ठानी है||

 

मजबूर नहीं मगरूर नहीं मैं 

मोह माया में चूर नहीं मैं

साथ तुम्हारा मिल जाए तो

लक्ष्य से भी दूर नहीं मैं ||

 

सुख दुःख की घटना तो

जीवन में घटती रहती है

छोटी छोटी नोक झोंक भी

हर रिश्ते में होती है 

छोड़ न देना साथ निभाना

तुमसे, प्रेम की डोर जो बाँधी है||

 

गलत किये थे कुछ निर्णय

ये बात भी स्वीकारी है

मैं  गलत और तुम सही

गलती मैंने मानी है

मझधार में फसीं जिंदगी की

नैया पार लगानी है||

 

जीवन संगिनी बनकर,

मेरी जिंदगी, सँवारी है

घर नहीं मेरे दिल में रहना

बस ख़्वाहिश ये हमारी है

मैं नहीं तो तुम सही

समर्थ जीवन की ठानी है||

 

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सड़क की बेबसी

कभी खूनी, कभी कातिल

कभी गुनाहों का मार्ग कहलाती

जुर्म को होते देख चीखती

खून खराबे से मैं थर्राती

कभी खून की प्यासी तो

कभी डायन हूँ कहलाती

चाह के भी कुछ कर ना पाती

बेबसी पर नीर बहाती ||

 

हैवानियत की, कभी बलात्कार की,   

ना चाह मैं साक्षी बनती

हत्या कभी षडयंत्रो का

अंजान देने पथ भी बनती

तैयार की गई हर साजिश को   

हादसो का मैं नाम दिलाती…

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Posted on August 20, 2019 at 4:29pm

पेड़-पोधे और हम

वो भी क्या दिन थे यारो

जब मिलजुल कर मौज मनाते थे

कभी पेड़ की डाल पर चढ़ जाते

कभी तालाब में डुबकी लगाते थे

रंग-बिरंगे फूलों से तब

भरे रहते थे बाग-बगीचे

सुंदर वातावरण बनाते और

आँगन को महकाते थे ||

 

कू-कू करती कोयल के

हम सुर से सुर मिलाते थे

रंग-बिरंगे तितलियों के पीछे

सरपट दौड़ लगाते थे

पक्षियों की चहचाहट में

जैसे, खुद को ही भूल जाते थे

मिलजुल कर मौज मनाते थे ||

 

स्वच्छ वायुं…

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Posted on April 26, 2019 at 2:32pm — 2 Comments

आओ मिलकर घर बनाये

ईट पत्थर से बना मकान

उसमें रहते दो इंसान

रिश्तों को वो कदर न करते

एक-दूजे से बात ना करते

कहने को एक मकान में रहते

पर एक-दूजे से घृणा करते

मकान की परिभाषा

को सिद्ध करते ||

 

कच्ची मिटटी का एक, छोटा घर

स्वर्ग से सुंदर, प्यारा घर

एक परिवार की जान था, जो  

प्रेम की सुंदर मिशाल था, वो

सब सदस्य साथ में रहते

हसतें-खेलतें घुल-मिल रहते

नारी के सम्मान के संग सब  

एक दूजे का आदर…

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Posted on April 16, 2019 at 4:47pm

हैरान हो जाता हूँ, जब कभी

आँखों में अश्रु निकल आते है मेरे

इतिहास में जा, जब खोजता हूँ

नारी उत्पीडन की प्रथाओ की

कड़ी से कड़ी मै जोड़ता हूँ

हैरान हो जाता हूँ, जब कभी

इतिहास में जा, जब खोजता हूँ

 

कैसी नारी कुचली जाती

चुप होके क्यों, सब सहती थी

बालविवाह जैसी, कुरूतियों की खातिर

सूली क्यों चढ जाती थी

सती होने की कुप्रथा में क्यों

इतिहास नया लिख जाती थी

चुप होके क्यों, सब सहती थी

सूली क्यों चढ जाती थी ||

 

जब कभी…

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Posted on April 16, 2019 at 10:45am — 4 Comments

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