सुना सहसा उसने
और दिल बैठ गया
तड़प रहे अंतस में
नया डर पैठ गया
तकिये पर सिर छिपा
विवश वह लेट गया
आंसुओं की परतें अनगिन
दर्द में समेट गया
अगले रविवार फिर
वही मंजर आयेगा
मौन-प्रेम सिसकेगा
तडपकर मर जाएगा
एक कन्या बेमन से अनचाहा वर वरेगी
प्यार के शव पर ही मांग वह भरेगी
अभी उसके व्याह का…
ContinueAdded by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on February 23, 2015 at 7:38pm — 24 Comments
प्रेम अगन है प्रेम लगन हैं.....
प्रेम अगन है प्रेम लगन हैं
प्रेम धरा है प्रेम गगन है
प्रेम मिलन है प्रेम विरह है
श्वास श्वास का प्रेम बंधन है
प्रेम ईश है प्रेम है पूजा
स्मृति घाट का प्रेम मधुबन है
पावन गंगा सा प्रेम समेटे
लिप्त बूंदों में प्रेम नयन है
मौन अधरों में गुन गुन करता
प्रेम में डूबा प्रेम कम्पन है
आत्मसात का भाव समेटे
प्रेम हकीकत प्रेम स्वप्न है
प्रेम अलौकिक अपरिभाषित
हृदय नयन का प्रेम अंजन…
Added by Sushil Sarna on February 23, 2015 at 7:30pm — 16 Comments
Added by Neeraj Nishchal on February 23, 2015 at 12:36pm — 10 Comments
2122 2122
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पाप का अवसान मागूँ
पुण्य का उत्थान मागूँ
**
सत्य की लम्बी उमर हो
झूठ को विषपान मागूँ
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व्यर्थ है आकाश होना
सिर्फ लधु पहचान मागूँ
**
राजपथ की राह नीरस
पथ सदा अनजान मागूँ
**
स्वर्ण देने की न सोचो
मैं तो बस खलिहान मागूँ
**
कोयलों का वंश फूले
आज यह वरदान मागूँ
**
साथ ही पर काक के हित
इक मधुर सा गान मागूँ
**
मिल गए नवरात …
Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on February 23, 2015 at 11:31am — 26 Comments
ग़ज़ल में दर्द ढल कर आ रहा है अब
कोई दरिया मचल कर आ रहा है अब
बड़े साहब ने इक साँचा बनाया है
जिसे देखो पिघल कर आ रहा है अब
ज़रा सा होश खोते ही हुआ जादू
जुबां पर सच निकल कर आ रहा है अब
चलो अच्छा हुआ जो ठोकरें खायी
गिरा लेकिन सँभल कर आ रहा है अब
बनाया मोम से पत्थर जिसे मैंने
मेरी जानिब उछल कर आ रहा है अब
गरज़ ढुलते ही रस्ता हो गया चिकना
मेरे घर वो फिसल कर आ रहा है…
ContinueAdded by khursheed khairadi on February 23, 2015 at 10:23am — 21 Comments
Added by Dr. Vijai Shanker on February 23, 2015 at 10:08am — 14 Comments
Added by दिनेश कुमार on February 23, 2015 at 6:30am — 17 Comments
“हर बार, वह उस आखिरी ‘समोसे’ की तरह मन मसोस कर रह जाता, जिसे कोई नहीं खाता था, आखिर वह अपने डिग्री कॉलेज की क्रिकेट टीम का ‘१२ वाँ खिलाड़ी जो था’ पर आज उसने हिम्मत जुटाकर ‘कप्तान’ से कहा ‘सर’ एक बार मुझे भी खेलने का मौका चाहिए!”
“अरे यार, तुम तो टीम के अभिन्न अंग हो, तुम तो बस मैच का आनन्द लो, हां बस बीच –बीच में चाय, पानी, समोसा, कोल्डड्रिंक, जूस –वूस ले आया करो !”
“समय बदला और फाइनल मैच से ठीक एक दिन पहले कप्तान और उसका प्रिय खिलाड़ी कार दुर्घटना में जख्मीं हो गए, और उस दिन…
ContinueAdded by Hari Prakash Dubey on February 23, 2015 at 2:48am — 18 Comments
212 / 1222 / 212 / 1222 |
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वाकिया हुआ कैसे बाद ये जमानों के |
मस्ज़िदी भजन गाये मंदिरी अजानों के |
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हौसला चराग़ों का यूं चला तबीयत… |
Added by मिथिलेश वामनकर on February 22, 2015 at 11:30pm — 31 Comments
2122 2122 212
पढ़ चुके जब से किताबें चार हम
भूल बैठे आपसी सब प्यार हम
बादलों ने ढक लिया सूरज अगर
मान लें सूरज की कैसे हार हम
उम्र भर कागज़ किये काले मगर
कह न पाए शेर भी दो चार हम
है भरोसा तेरे झूठे वादे पे
यार दिल के हाथ हैं लाचार हम
जीतना तो चाहते हैं दिल मगर
फिर जमा क्यों कर रहे हथियार हम
बस डकैती लूट हत्या अपहरण
देखते डरने लगे अखबार हम
मौलिक व…
ContinueAdded by gumnaam pithoragarhi on February 22, 2015 at 5:53pm — 5 Comments
Added by दिनेश कुमार on February 22, 2015 at 12:30pm — 11 Comments
212 212 212 212
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जिन्दगी थी बहुत ही सुहानी मेरी
मौज मस्ती कभी थी निशानी मेरी
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एक ज़लसा हुआ था मेरे गाँव में
मिल गयी उसमें परियों की रानी मेरी
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सिलसिला चल पडा फिर मुलाकात का
मुझको लगने लगी जिन्दगानी मेरी
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बात अबकी नहीं है मेरे दोस्तो
ये कहानी बहुत ही पुरानी मेरी
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एक साज़िश रची थी रक़ीबों ने फिर
और साज़िश में शामिल दिवानी मेरी
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मैं तो मरने लगा…
Added by umesh katara on February 22, 2015 at 10:30am — 16 Comments
Added by Dr. Vijai Shanker on February 22, 2015 at 9:52am — 17 Comments
Added by Usha Choudhary Sawhney on February 22, 2015 at 9:35am — 9 Comments
‘दो टिकट बछरावां के लिए’ –मैंने सौ का नोट देते हुए बस कंडक्टर से कहा I
‘टूटे दीजिये, मेरे पास चेंज नहीं है I’
‘कितने दूं ?’
‘बीस रुपये ‘
मैंने उसे बीस रूपए दे दिये और पर्स सँभालने में व्यस्त हो गया I वह रुपये लेकर आगे बढ़ गया I
-'क्या कंडक्टर ने टिकट दिया ?'- सहसा मैंने पत्नी से पूछा i
‘नहीं तो ‘ उसने चौंक कर कहा I तभी बगल की सीट पर बैठा एक अधेड़ बोल उठा –‘टिकट भूल जाइये साहेब , बछरावां के दो टिकट तीस रुपये के हुए उसने आपसे बीस ही तो लिए i दस का…
ContinueAdded by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on February 21, 2015 at 8:39pm — 19 Comments
Added by Samar kabeer on February 20, 2015 at 11:14pm — 42 Comments
Added by Neeraj Nishchal on February 20, 2015 at 8:00pm — 22 Comments
आवाज़ का रहस्य (कहानी )
प्रशिक्षु चिकित्सक के रूप में दिनेश और मुझे कानपुर देहात के अमरौली गाँव में भेजा गया था |नया होने के कारण हमारी किसी से जान-पहचान ना थी इसलिए हमने अस्पताल के इंचार्ज से हमारे लिए आस-पास किराए पर कमरा दिलाने को कहा |उसने हमे गाँव के मुखिया से मिलवाया |
“ किराए पे तो यहाँ कमरा मिलने से रहा |तुम अजनबी भी हो और जवान भी | परिवार भी नहीं है !ऐसे में कोई गाँव वाला - - - “
“ ऐसे में ये लड़के चले जाएंगे |फिर गाँव वालों का ईलाज - - - - कितनी बार लिखने…
ContinueAdded by somesh kumar on February 20, 2015 at 11:12am — 4 Comments
Added by दिनेश कुमार on February 20, 2015 at 7:04am — 27 Comments
“मंत्री जी, शानदार पुल बनकर तैयार है, आपके नाम की शिला भी रखवा दी है, बस जल्दी से उद्घाटन कर दीजिये !”
“अरे यार देख रहे हो कितना व्यस्त चल रहा हूँ आजकल, लेन-देन तो हो गया है न, फिर तुम्हे उद्घाटन की इतनी चिंता क्यों है ?”
“साहब, चिंता उद्घाटन की नहीं है, बारिश की है !”
© हरि प्रकाश दुबे
"मौलिक व अप्रकाशित”
Added by Hari Prakash Dubey on February 20, 2015 at 3:13am — 31 Comments
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