For any Query/Feedback/Suggestion related to OBO, please contact:- admin@openbooksonline.com & contact2obo@gmail.com, you may also call on 09872568228(योगराज प्रभाकर)/09431288405(गणेश जी "बागी")

All Blog Posts (19,169)

बेपरवाही नहीं, प्रिया मेरी ! विश्वास ह्रदय का मेरा है ||

बेपरवाही नहीं, प्रिया मेरी! विश्वास ह्रदय का मेरा है | 

तुमको सब कुछ सौंप दिया , जो मेरा है सो तेरा है ||

मुक्त हुआ , कुछ फिक्र नहीं | 

तू सच है, केवल जिक्र नहीं | 

मैं चाहे जहाँ रहूँ लेकिन, तेरे नयन ह्रदय का डेरा है | 

बेपरवाही नहीं, प्रिया मेरी! विश्वास ह्रदय का मेरा है ||

मैं सोता, तू जगती है | 

धीरज रोज , परखती है | 

है बन्द आँख में ख्वाब तेरा, भले नींद ने घेरा है | 

बेपरवाही नहीं, प्रिया मेरी! विश्वास ह्रदय का मेरा है…

Continue

Added by Ganga Dhar Sharma 'Hindustan' on February 28, 2015 at 9:00am — 8 Comments


मुख्य प्रबंधक
तरही ग़ज़ल : तू रात की रानी है (गणेश जी बागी)

          221-1222-221-1222

पत्थर से तेरे दिल को मैं मोम बना दूँ तो 

चिंगारी दबी है जो फिर उसको हवा दूँ तो.



इस शहर में चर्चे हैं तेरे रूप के जादू के

मैं अपनी मुहब्बत का इक तीर चला दूँ तो.



क्या नाज़ से बैठी हो फागुन के महीने में

मैं रंग मुहब्बत का थोड़ा सा लगा दूँ तो.



तुम कहते हो होली में इस बार न बहकूँगा

गुझिया व पुओं में मैं कुछ भंग मिला दूँ तो.…

Continue

Added by Er. Ganesh Jee "Bagi" on February 27, 2015 at 11:00pm — 28 Comments

होली गीत

छाई रंगों की मधुर फुहार

रंगीली आई होली

सखी री आई होली

 

अंग सजन के रंग लगाऊँ

मन ही मन में खूब लजाऊँ

फगुनिया चलती बयार

सखी री आई होली

 

नेह में डूबी पवन बावरी

मन मंदिर में पी छवि सांवरी

नथुनिया की होठों से रार

सखी री आई होली

 

शाम सिंदूरी अति हर्षाये

अखियों से मदिरा छलकाए

चंदनियाँ करे मनुहार

सखी री आई होली

 

चम्पा चमेली गजरे में महके

दर्पण देख के मनवा…

Continue

Added by kalpna mishra bajpai on February 27, 2015 at 8:00am — 18 Comments

उलझी हुयी प्रेमकहानी

मैं एक कवि हूँ 

मुझे प्रेम है 

पहाडों से 

नदी से

सागर में उठती हुयी लहरों से

गिरते हुये झरनों से

सुन्दर सुन्दर फूलों 

की महक से

मीठी मीठी 

पंछियों की चहक से

मैं एक कवि हूँ 

मुझे प्रेम है 

बंजड हुये उस पेड से

जिसने कभी छाया दी थी 

फल दिये 

मुझे प्रेम है

उन तेज नुकीले काँटे से

जिसने खुद को सुखाकर 

फूल को खिलाया 

मुझे जितना सुख से प्रेम है 

उतना ही प्रेम दुख से है

तुम कहती हो 

मैं…

Continue

Added by umesh katara on February 27, 2015 at 7:30am — 18 Comments

नारी और देवी तुल्य ? (अनन्या )

नारी बरसों से   देवी तुल्य कहलाती है 

मगर यह बात मुझे अचंभित कर जाती है 

केवल कागजों में छपी हैं यह कागज़ी बातें 

सच्चाई मगर.. कुछ और बयां कर जाती है 

चीखें दबी -दबी सी ,साँसे घुटी. घुटी सी 

पथराई आँखें बदहवास सी नज़र आती है 

रुदन को गुप्त रख स्मित बरसाती है   

निशब्द सी धडकनें  डरकर रह जाती है 

जज्बात उसके  सदा सहमें से लगते हैं 

घरोंदे में छुपकर  वह जीवन बिताती है 

सिंदूर में रंग कर…

Continue

Added by डिम्पल गौड़ on February 27, 2015 at 1:00am — 18 Comments

कितना कम चाहिए...

कितना कम चाहिए 

नून, तेल, गुड के अलावा 

फिर भी मिल नही पाता 

मुंह बाये आ खड़ी होती है 

लाचारी सी हारी-बीमारी 

डागदर-दवाई में चुक जाती है 

जतन से जोड़ी रकम 

जबकि हमारी इच्छाएं है कितनी कम...

कितना कम चाहिए

रोटी और कपड़े के अलावा 

फिर भी मिल नही पाता 

आ धमकता वन-करमचारी

थाने का सिपाही 

या अदालत का सम्मन 

और हम बेमन 

फंसते जाते इतना 

कि छूटते इनसे बीत जाती उमर

दीखती न मुक्ति की कोई डगर.....

(मौलिक…

Continue

Added by anwar suhail on February 26, 2015 at 10:08pm — 8 Comments

रख के गिरवी अपनी जाँ तुम्हें फिर माँग लूँगा मैं

बनके अश्रु जब टपकेगी दिल की बेचैनी

मोहब्बत है तुझे हमसे फिर मान लूँगा मैं |



बयां कर न कर पढ़ के चेहरे की हालत

जरुरत है तुझे मेरी फिर जान लूँगा मैं |



जाके मिल गयी तुम गर सितारों में

देख चमकने की अदा फिर पहचान लूँगा मैं |



पकड़ हाथों में हाथ बनाके दिल की रानी

जहाँ कोई न हो दुश्मन फिर जहान लूँगा मैं |



सुनहरे केश और आँखों पे पलकों का ज़ेबा

बनाके तुझे भेजा उसका फिर एहसान लूँगा मैं |



बुलावा आ गया तेरा गर मुझ से पहले…

Continue

Added by maharshi tripathi on February 26, 2015 at 10:00pm — 14 Comments

ग़ज़ल .........;;;गुमनाम पिथौरागढ़ी

२१२२ २१२२

नीम सी कोई दवा हूँ

आदमी मैं काम का हूँ

भाग से मैं हूँ बुरा पर

शख्स लेकिन मैं भला हूँ

दो घडी रूकता ना कोई

मैं सड़क का हादसा हूँ

स्वार्थ भर को ही जरूरत

क्या मैं कोई देवता हूँ

ढूँढता हूँ अपनी मंजिल

ख़त कोई पर बेपता हूँ

गुमनाम पिथौरागढ़ी

मौलिक व अप्रकाशित

Added by gumnaam pithoragarhi on February 26, 2015 at 6:16pm — 13 Comments


सदस्य टीम प्रबंधन
एक तरही ग़ज़ल - होली है हुलासों की // --सौरभ

221 1222   221 1222

चुपचाप अगर तुमसे अरमान जता दूँ तो !

कितना हूँ ज़रूरी मैं, अहसास करा दूँ तो !

 

संकेत न समझोगी.. अल्हड़ है उमर, फिर भी..

फागुन का सही मतलब चुपके से बता दूँ तो

 

ये होंठ बदन बाहें…

Continue

Added by Saurabh Pandey on February 26, 2015 at 6:00pm — 16 Comments

सीप में बंद मोती .....

सीप में बंद मोती .....

दूर उस क्षितिज पर

रोज इक सुबह होती है

रोज सागर की सूरज से

जीवन के आदि और अंत की बात होती है

जब थक जाता है सूरज

तो सागर के सीने पर

अपना सर रख देता है

और रख देता है

अपने दिन भर के

सफ़र की थकान को

अपने हर सांसारिक

अरमान को

बिखेर देता है

अपनी सुनहरी किरणों की

अद्वितीय छटा को

सागर की शांत लहरों पर

फिर अपने अस्तित्व को

धीरे-धीरे निशा में बदलती

सुरमई सांझ के आलिंगन में…

Continue

Added by Sushil Sarna on February 26, 2015 at 1:07pm — 18 Comments

इस जिस्म में अब पंख लगाना ही पड़ेगा

२२१२ २२११ २२१ १२२

अब हाले दिल ये उनको सुनाना ही पड़ेगा

लगता है अपने ओंठ हिलाना ही पड़ेगा

छत पे खड़े हैं आज वो ऊंचे मकान की 

इस जिस्म में अब पंख लगाना ही पड़ेगा 

लौटे हैं कितने रिंद उन्हें मान के पत्थर 

जल्वा- ग़ज़ल का उनको दिखाना ही पड़ेगा 

छुप छुप के देखें आह भरें होगा न हमसे  

नजरों के तीखे तीर चलाना ही पड़ेगा 

ग़ज़लों पे रखिये आप यकी आज भी अपनी 

जलता हुआ दिल ले उन्हें आना ही…

Continue

Added by Dr Ashutosh Mishra on February 26, 2015 at 10:30am — 15 Comments

माँ हो क्या

एक स्त्री हो तुम

पत्नि नाम है तुम्हारा 

लेकिन कभी कभी 

खुद से अधिक

मेरी चिन्ता में डूब जाती हो

तुम्हारा इतना चिन्तित होना

मेरे अन्तर्मन में भ्रम पैदा करता है

कि तुम मेरी अर्धांगिनी होकर

माँ जैसा व्यवहार करती हो

कैसा बिचित्र संयोजन हो तुम

ईश्वर का 



जीवन के उस समय में 

जब कोई नहीं था सहारे के लिये 

दूर दूर तक

तब एक भाई की तरह 

मेरे साथ खडे होकर 

भाई बन गयी थीं तुम

उस दिन मुझे आश्चर्य हुआ था 

कि स्त्री होकर भी…

Continue

Added by umesh katara on February 26, 2015 at 10:16am — 17 Comments

गीतिका ... ८+८+६ २२-२२-२२-२२-२२-२

आहत युग का दर्द चुराने आया हूं

बेकल जग को गीत सुनाने आया हूं

 

कोमल करुणा भूल गये पाषाण हुये

दिल में सोये देव जगाने आया हूं

 

आँगन आँगन वृक्ष उजाले का पनपे

दहली दहली दीप जलाने आया हूं

 

ग़ालिब तुलसी मीर कबीरा का वंशज

मैं भी अपना दौर सजाने आया हूं

 

दिल्ली बतला गाँव अभावों में क्यूं है

नीयत पर फिर प्रश्न उठाने आया हूं

 

सिस्टम इतना भ्रष्ट हुआ, जिंदा होकर

इसके दस्तावेज़ जुटाने आया…

Continue

Added by khursheed khairadi on February 26, 2015 at 10:09am — 11 Comments

एक प्रश्न (दोहे)



1.    

पावन पवित्र प्रेम को, करते क्यों बदनाम ।

स्वार्थ मोह में क्यों भला, देकर प्रेमी जान ।।

2.    

एक प्रश्न मैं पूछती, देना मुझे जवाब ।

छोरा छोरी क्यो भला, करते प्रेम जनाब ।।

3.    

तेरा सच्चा प्यार है, मेरा है बेकार ।

माॅ की ममता क्यों भला, होती है लाचार ।।

4.    

सोलह हजार आठ में, मिले न राधा नाम ।

सारा जग फिर क्यो भला, जपते राधे श्याम ।।

5.    

मातु पिता के बात पर, जिसने किया विवाह ।

होते उनके भी प्रबल, इक दूजे…

Continue

Added by रमेश कुमार चौहान on February 25, 2015 at 9:30pm — 8 Comments

''साल दंगों का''

लुट रही है फसल-ए-बहार दंगो में..

आराम फरमा रहे हैं वो जंगों में...

दिया किसने ये हक़ इन्हें ए-ख़ुदा

ख़ुदी है सो रही खिश्त-ओ-संगों में..

किसने बनाये हैं ये सनमकदे...

ख़ुदा भी बंट गया बन्दों में...

मेरी इन्ही आँखों ने,नजर में तेरी ए-सनम

देखा है खुद को कई रंगों में..

है किसे तौफ़ीक जो गैरों के चाक सिले?

मै भी नंगा हो गया नंगों में....

‘’मौलिक व अप्रकाशित’’

२०१४ में उ.प्र. में फैले दंगों के…

Added by Krish mishra 'jaan' gorakhpuri on February 25, 2015 at 9:00pm — 2 Comments

कारवां देखते रहे

उम्मीद तो 

मुझे अपने आप से भी थी 

उम्मीद तो 

मुझे अपनों से भी थी ... 

सोचता तो 

अपने के लिए भी था 

सोचता तो 

दूसरों के लिए भी था 

सुधार की गुंजाईश 

अपने आप से भी थी 

सुधार की गुंजाईश 

दूसरों से भी थी 

इन्हीं ... 

उहापाहो में

सफर काटता रहा ... 

जब उम्मीद 

अपनी पूरी नहीं हुयी 

सोच अपनी न रही 

सुधार खुद को न पाया 

तो शिकायत 

अब किससे 

और…

Continue

Added by Amod Kumar Srivastava on February 25, 2015 at 8:58pm — 11 Comments

''कलमा''

तू मेहरबां है के खफा है मुझे पता तो लगे..

गुलशन में बातें सुलग रहीं है..जरा हवा तो लगे..

मोहब्बतों में ऐसा जलना भी क्या?बुझना भी क्या?

जले तो आंच न आये,बुझे तो न धुँआ लगे..

अजब हो गया है अब तो चलन मुहब्बतों का..

मै वफ़ा करूँ तो है उसको बुरा लगे...

वो चाहता है के मै उसके जैसा बन जाऊ...

है जो हमारे दरमियाँ न किसी को पता लगे..

इस साल भी बेटी न ब्याही जाएगी...

गन्ने/गल्ले का दाम देख किसान थका-थका सा…

Continue

Added by Krish mishra 'jaan' gorakhpuri on February 25, 2015 at 8:00pm — 14 Comments

नए कल्प में सागर मंथन

फिर हुआ सागर-मंथन

नए कल्प में

इस बार रत्न निकले तेरह   

देवता व्यग्र ! विष्णु हैरान !

कहाँ गया अमृत-घट ?

 

समुद्र ने कहा

अब वह जल कहाँ

जिसमे होता था अमृत

जिसे मेरी गोद में

डालती थी गंगा

जिससे भरता था घट

 

अब तो शिव ने भी

दो टूक कह दिया है 

नहीं…

Continue

Added by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on February 25, 2015 at 5:00pm — 6 Comments

जला बैठे

न देखी थी कभी सूरत मगर अपना बना बैठे

खता कुछ हो गई मुझसे तभी तुझको गवा बैठे

सजा कर माँग तेरी मैं तुझे अपना बनाया था

तुम्हारे साथ मिल कर मैं घरौंदा इक बसाया था

खिले जब फूल आँगन में हुआ पूरा सभी सपना

तुम्हारे बिन नहीं कोई जमाने में लगे अपना

मगर ये भूल थी मेरी जो तुम से दिल लगा बैठे

ख़ता कुछ हो गई मुझसे तभी तुझको गवा बैठे

न देखी थी कभी सूरत मगर अपना बना बैठे

बना कर सेज़ फूलों की उसे सबने सजाया था

उठा कर मैं जमीं से फिर…

Continue

Added by Akhand Gahmari on February 25, 2015 at 2:05pm — 6 Comments

ग़ज़ल--१२२२--१२२२--१२२२--१२२२...मुझे मालूम है यारों

मेरा देहात क्यूँ रोटी से भी महरूम है यारों

कहाँ अटका है रिज़्के-हक़ मुझे मालूम है यारों

 

उठा पेमेंट उसका क्यूँ नरेगा की मज़ूरी से

घसीटाराम तो दो साल से मरहूम है यारों

करें किससे शिकायत हम , कहाँ जायें गिला लेकर

व्यवस्था हो गई ज़ालिम बशर मज़लूम है यारों

सिखाओ मत इसे बातें सियासत की विषैली तुम

मेरा देहात का दिल तो बड़ा मासूम है यारों

लिए फिरता है वो कानून अपनी जेब में हरदम

जो कायम कायदों पर है बशर वो बूम…

Continue

Added by khursheed khairadi on February 25, 2015 at 12:49pm — 22 Comments

Monthly Archives

2026

2025

2024

2023

2022

2021

2020

2019

2018

2017

2016

2015

2014

2013

2012

2011

2010

1999

1970

कृपया ध्यान दे...

आवश्यक सूचना:-

1-सभी सदस्यों से अनुरोध है कि कृपया मौलिक व अप्रकाशित रचना ही पोस्ट करें,पूर्व प्रकाशित रचनाओं का अनुमोदन नही किया जायेगा, रचना के अंत में "मौलिक व अप्रकाशित" लिखना अनिवार्य है । अधिक जानकारी हेतु नियम देखे

2-ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार यदि आपको अच्छा लगा तो अपने मित्रो और शुभचिंतको को इस परिवार से जोड़ने हेतु यहाँ क्लिक कर आमंत्रण भेजे |

3-यदि आप अपने ओ बी ओ पर विडियो, फोटो या चैट सुविधा का लाभ नहीं ले पा रहे हो तो आप अपने सिस्टम पर फ्लैश प्लयेर यहाँ क्लिक कर डाउनलोड करे और फिर रन करा दे |

4-OBO नि:शुल्क विज्ञापन योजना (अधिक जानकारी हेतु क्लिक करे)

5-"सुझाव एवं शिकायत" दर्ज करने हेतु यहाँ क्लिक करे |

6-Download OBO Android App Here

हिन्दी टाइप

New  देवनागरी (हिंदी) टाइप करने हेतु दो साधन...

साधन - 1

साधन - 2

Latest Activity

रवि भसीन 'शाहिद' commented on Jaihind Raipuri 's blog post वो समझते हैं मस्ख़रा दिल हैं
"आदरणीय Jaihind Raipuri साहिब, नमस्कार। बढ़िया ग़ज़ल हुई है, बधाई स्वीकार करें। /ये मेरा…"
yesterday
आशीष यादव added a discussion to the group धार्मिक साहित्य
Thumbnail

चल मन अब गोकुल के धाम

चल मन अब गोकुल के धाम अद्भुत मनहर बाल रूप में मिल जाएंगे श्याम कि चल मन अब……………………….कटि करधनी शीश…See More
yesterday
अखिलेश कृष्ण श्रीवास्तव replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-132 (विषय मुक्त)
"आदरणीय अशोक भाईजी धन्यवाद ... मेरा प्रयास  सफल हुआ।"
Tuesday
अखिलेश कृष्ण श्रीवास्तव replied to Admin's discussion 'ओबीओ चित्र से काव्य तक' छंदोत्सव अंक 177 in the group चित्र से काव्य तक
"वाह वाह वाह !!! बहुत दिनों बाद ऐसी लाजवाब प्रतिक्रिया पढने में आई है। कांउटर अटैक ॥ हजारों धन्यवाद…"
Tuesday
Ashok Kumar Raktale replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-132 (विषय मुक्त)
"  आदरणीय शेख शाहज़ाद उस्मानी जी सादर, सरकारी शालाओं की गलत परम्परा की ओर ध्यान आकृष्ट कराती…"
Tuesday
अखिलेश कृष्ण श्रीवास्तव replied to Admin's discussion 'ओबीओ चित्र से काव्य तक' छंदोत्सव अंक 177 in the group चित्र से काव्य तक
"सार्थक है आपका सुझाव "
Tuesday
Sheikh Shahzad Usmani replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-132 (विषय मुक्त)
"आदाब।‌ रचना पटल पर उपस्थिति और समीक्षाओं हेतु हार्दिक धन्यवाद आदरणीया प्रतिभा पाण्डेय जी। मेरी…"
Tuesday
अखिलेश कृष्ण श्रीवास्तव replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-132 (विषय मुक्त)
"हार्दिक धन्यवाद आदरणीया प्रतिभाजी ।  इसमें कुछ कमी हो सकती है लेकिन इस प्रकार के आयोजन शहरों…"
Tuesday
Ashok Kumar Raktale replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-132 (विषय मुक्त)
"आदरणीय अखिलेश कृष्ण श्रीवास्तव साहब सादर, बिना सोचे बोलने के परिणाम पर सुन्दर और संतुलित लघुकथा…"
Tuesday
Ashok Kumar Raktale replied to Admin's discussion 'ओबीओ चित्र से काव्य तक' छंदोत्सव अंक 177 in the group चित्र से काव्य तक
"अमराई में उत्सव छाया,कोयल को न्यौता भिजवाया। मौसम बदले कपड़े -लत्ते, लगे झूमने पत्ते-…"
Tuesday
Ashok Kumar Raktale replied to Admin's discussion 'ओबीओ चित्र से काव्य तक' छंदोत्सव अंक 177 in the group चित्र से काव्य तक
"ठण्ड गई तो फागुन आया। जन मानस में खुशियाँ लाया॥ आम  लगे सब हैं बौराने। पंछी गाते सुर में…"
Tuesday
pratibha pande replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-132 (विषय मुक्त)
"लघुकथा किसी विसंगति से उभरती है और अपने पीछे पाठको के पीछे एक प्रश्न छोड़ जाती है। सबकुछ खुलकर…"
Tuesday

© 2026   Created by Admin.   Powered by

Badges  |  Report an Issue  |  Terms of Service