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दोहे भाग 3

घूँघट पट क्यों ओढ़ती,तुम पर मैं बलिहार

घट मेरे बसती सदा,तुम पर जान निसार ॥

गोरी तुम मैं सांमला,प्रीत घनेरी होय

राधा वर मैं बन गया,जो होए सो होय ॥

बंशी मेरी टेरती , तुम को सुबहो शाम

दर्शन श्यामा के बिना ,हमें कहाँ आराम॥

बहुत हुआ अब चुप रहो,नटवर नागर नन्द

मदन माधुरी डालते, भरते दिल आनन्द ॥

पुष्प लता है  बावरी ,प्रेमातुर संसार

कंठ कंठ में रम रहा ,दामोदर करतार॥

मौलिक व अप्रकाशित 

कल्पना…

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Added by kalpna mishra bajpai on March 4, 2015 at 3:00pm — 9 Comments

गीतिका ... ८+८+६ २२-२२-२२-२२-२२-२.....आ जायें

इस होली पर रंग लगाने आ जायें

बचपन के कुछ यार पुराने आ जायें

 

होली-फागुन बरखा-सावन या जाड़ा

यादें तेरी ढूंढ बहाने आ जायें

 

दीवाने हो झूमा करते थे जिन पर

होठों पर वे मस्त तराने आ जायें

 

होली सुलगे भस्म न हो प्रहलाद कभी

सब नेकी का साथ निभाने आ जायें

 

सतरंगी थे इनके वादे कल यारों

लोग सियासी आज निभाने आ जायें

 

जीवन में हो पागलपन भी थोड़ा सा

दीवानों के संग सयाने आ…

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Added by khursheed khairadi on March 4, 2015 at 1:40pm — 7 Comments

'जिन्दगी'

१२१ २२ १२२

अजीब है ये जिन्दगी

सलीब है ये जिन्दगी

न जान तू किस खता की

नसीब है ये जिन्दगी

इश्क जिसे है,उसी की

रकीब है ये जिन्दगी

गिने जु सांसे, बहुत ही

गरीब है ये जिन्दगी

निकाह मौत तुझसे औ

हबीब है ये जिन्दगी

‘मौलिक व अप्रकाशित’

Added by Krish mishra 'jaan' gorakhpuri on March 4, 2015 at 11:00am — 14 Comments

शादी की दावत -2

शादी की दावत-2

द्वार पर चुनमुनिया थी |

“भईया आप लोग बारात नहीं चलेंगे |उहाँ सब लोग तैयार हो गए हैं |बैंड-बाजा वाले भी आ गए हैं |सभी औरत लोग लावा लेने जा रही हैं |”

कितना बोलती है तू !क्या तू भी बारात चेलेगी ?मैंने कहा

“और क्या ?उहाँ चलकर फुलकी ,रसगुल्ला ,टिकिया खाने वाला भी तो चाहिए ना |”

“अच्छा तू चल ,हम लोग नया कपड़ा पहनकर आते हैं |”महेश भईया बोले

उसके मुड़ते ही महेश भईया ने कहा - “चलों जवानों ,कूच करते हैं |”

“मैं विद्रोह पर हूँ !शादी में…

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Added by somesh kumar on March 3, 2015 at 11:30pm — 4 Comments

बन्द मुट्ठी का आसमान

मेरी बन्द मुट्ठी में

कसमसाता हुआ आसमान 

मुझे छोड दो

बाकी आसमान तुम्हारा है 

तलवों से ढ़की धरती

मुझे छोड दो  

बाकी धरती तुम्हारी है 

मेरे माथे की तीनों लकीरें 

तुम्हारे झुँझलाते हुये उन प्रश्नों 

का उत्तर हैं

जो किये थे तुमने 

मेरे हारते समय 

बर्षों से बन्द मेरी जुबान

शायद गल चुकी है

अब इसे तनिक भी हिलाया 

तो टूट जायेगी

तुम्हारे नाम के सिवाय 

इसे कुछ बोलना नहीं था

मगर तुमने इसकी 

इजाजत न दी

तो…

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Added by umesh katara on March 3, 2015 at 9:00pm — 6 Comments

चले आओ

तुझे वो याद करके दिल जलाती है चले आओ

तड़प कर गीत वो गम के सुनाती है चले आओ

बुलाती हैं तुझे हरदम तुम्‍हारे गॉंव की गलियॉं

तुम्‍हें वो याद करके अश्‍क बहाती है चले आओ

न भूलेगीं कभी गलियॉं शरारत याद है तेरी

कसम तुमको शरारत की दिलाती है चले आओ

जले है हाथ फिर भी सेकती रोटी तुम्‍हारी मॉं

तुम्‍हारा नाम ले ले वो बुलाती है चले आओ

न सुख मिलता यहॉं शहरी न बिजली है न बत्‍ती है

मगर खुद चॉंदनी रस्‍ता…

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Added by Akhand Gahmari on March 3, 2015 at 7:13pm — 20 Comments

तेरी मुस्कान तेरी शान तेरा ये जलवा

२१२२  ११२२   १२२२   २२/११२

तेरी मुस्कान तेरी शान तेरा ये जलवा

काजू किशमिश से भरा जैसे बादामी हलवा

तू न होता तो भला कैसे दिल से दिल मिलते

ऐ हंसी गुल किसी जूही से मुझे  भी मिलवा

तेरी खुशबू में छुपा धड़कने दूंगा दिल की

बात जैसे भी बने बात तो मेरी बनवा

फायले दिल में हैं उनके तमामों नाम लिखे

फैसला होने से पहले मेरी अर्जी…

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Added by Dr Ashutosh Mishra on March 3, 2015 at 4:30pm — 11 Comments

मौसम--

अचानक घिर आये बादलों को देखकर बल्लू घबरा गया , हवाएँ भी तेज हो गयी थीं | मार्च का महीना , गेहूं की फसल अपनी जवानी पर थी , बालियां निकल आई थीं और कुछ दिनों में इनके पकने की शुरुवात होने वाली थी |

कल खेत से लौटते हुए मन कितना हर्षित था उसका , इस बार तो बैंक का क़र्ज़ चुका ही देगा | पिछले हफ्ते ही नोटिस आया था क़िस्त जमा करने के लिए और उसने उसे बेफिक्री से फेंक दिया था | एक गाय भी लेनी थी उसे इस बार , फिर तो दूध से भी थोड़ी आमदनी बढ़ जाएगी | रात में उसने पत्नी को प्यार से बाँहों में भींच लिया ,…

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Added by विनय कुमार on March 3, 2015 at 1:32pm — 24 Comments

ग़ज़ल: खोह घाटी का सफर ....

२१२२   २१२२  २१२२ २१२२ 
कामयाबी रंग लाये  तब  जमाना पास आये |

रंज  बैरी भूल   जाये  हाथ थामे  रास  आये |

पात ना आये अगर डाली कहीं  सूखी हुई  हो  , 

फूल डाली पर खिले जैसे  नजारा खास आये |…

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Added by Shyam Narain Verma on March 3, 2015 at 1:00pm — 12 Comments

गीत - होली कैसे खेलूँ

मैं होली कैसे खेलूँ रे
साँवरिया तोरे संग
बादल अपनी पिचकारी से
रंग भंग कर जाते हैं
रखा गुलाल धुंध उड़ती है
राग जंग कर जाते हैं
कोई रोको इस धरती की
हरियाली हो गई तंग
मैं होली कैसे .............. ।
सूरज ने आँखें ना खोलीं
सिमटा उसका ताप
तारों की झिलमिल रंगोली
गायब अपने आप
कहीं सिमट बैठे हैं सारे
रंग बिरंगे रंग
मैं होली कैसे खेलूँ रे
साँवरिया तोरे संग ।

पूनम शुक्ला
मौलिक एवं अप्रकाशित

Added by Poonam Shukla on March 3, 2015 at 11:30am — 9 Comments

अपने धंधे , अपने तरीके हैं --- डॉo विजय शंकर

धंधे को मान देना ,

धंधे की बात है ।

पेशेवर खिलाड़ियों को मान-ईनाम ,

खुद एक पेशे की बात है ।

सैनिक के शहीद होने को

पेशे से जोड़ना दुःख की बात है ।



लोगों को हिफाजत दे नहीं पाते ,

वो हादसे के शिकार हो जाएँ

तो बड़ी बड़ी शोक सभाएं ,

कैंडल-मार्च निकलवाते हैं ,

और किया तो कोई गली

सड़क उसके नाम करवाते हैं।



प्रतिभा को हम तभी जानते हैं

जब दूसरे कोई विदेशी

पहले उसे पहचानते हैं ,

तब बड़े जोश खरोश से हम

उसे अपना अपना… Continue

Added by Dr. Vijai Shanker on March 3, 2015 at 10:45am — 20 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
ग़ज़ल - छग्गन तेरी फसलें....(मिथिलेश वामनकर)

22--22—22--22--22—2

 

दिल्ली से जो बासी रोटी आई है

अपने हिस्से में केवल चौथाई है…

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Added by मिथिलेश वामनकर on March 3, 2015 at 9:30am — 31 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
( अंध ) विश्वास - अतुकांत - ( गिरिराज भंडारी )

ओ भाई ,

नहीं , आपसे नहीं , होली दिवाली वालों से नहीं

किसी भी कौम के आस्तिकों नहीं 

मै उनसे मुखातिब हूँ  

अंध श्रद्धा , अंध विश्वास का ढोल पीटने वाले भाइयों से   

हाँ , आपसे ही कह रहा हूँ

कितनी बार देखे हैं सर्टिफिकेट, डाक्टरी

इलाज कराने से पहले

जांचे हैं कभी ?

भेजे यूनिवर्सिटी तस्दीक करने के लिये सही है या गलत ,

फर्जी तो नहीं है  सर्टिफिकेट देखे कभी , अपनीं आँखों से

कर लिये न.... विश्वास , वही.....अंध…

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Added by गिरिराज भंडारी on March 3, 2015 at 8:20am — 20 Comments

नया रेट

"नया रेट"

"जीजी कहाँ हो?" कहती हुयी देवरानी रसोईघर में आ गयी और मुझे बरतन माँजते देख झट बोल पड़ी। "अरे जीजी, क्या हुआ? काम वाली नही आयी।

बस मैं भी शुरू हो गयी। "अरे होना क्या है नीलु। वही मुआ बजट का रोना।" "रसोई के खर्चे,स्कूली फीसे,बिजली-पानी अब सब पर तो बजट का असर पड़ जाता है ना और बच्चो का जेब खर्च अलग से।" नीलु को बात से सहमत देख मैंने अपनी बात जारी रखी। "अब 'इन्होने' तो खर्चा बढ़ाने से मना कर दिया।" "बस सोचा, कामवाली को ही मना कर देती हूँ। टाईम भी पास हो जायेगा और घर का बजट… Continue

Added by VIRENDER VEER MEHTA on March 3, 2015 at 7:45am — 17 Comments

शादी की दावत -1 (कहानी )

शादी की दावत -1

स्टेशन से सीधे हम अजय भईया के घर पहुँचे |मड़वा में स्त्रियाँ उन्हें हल्दी-उबटन मल रही थीं |बड़े बाउजी यानि की मानबहादुर सिंह परजुनियों को काम समझाने में व्यस्त थे |बीच-बीच में वे द्वार पर आ रहे मेहमानों से मिलते उनकी कुशल-खैर पूछते और आगे बढ़ जाते |

“अरे सीधे ,स्टेशन से आ रहे हो क्या ?” हमारा समान देखकर शायद उन्हें अंदाज़ा हो गया था |

“जी,हमनें आपस में बात कर ली थी |गाड़ी आने के समय में भी ज़्यादा फ़र्क नहीं था इसलिए हम सब स्टेशन पर ही - -- “बारी-बारी से…

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Added by somesh kumar on March 2, 2015 at 11:03pm — 7 Comments

राह : कुकुभ छन्द: हरि प्रकाश दुबे

डरना हो तो बुरे कर्म से , डरना सीखो मतवाले !

उनको चैन कभी ना मिलता , जिनके होते मन काले !!

तोल सको तो पहले तोलो, बिन तोले कुछ मत बोलो !

मौन रहो जितना संभव हो , कम बोलो मीठा बोलो !!

 

खाना हो तो गम को खाओ, आंसू पीकर खुश होना  !

गम सहने की चीज है बंधू , अपना गम न कहीं रोना !!

जला सको तो अहं जला दो , वरना अहं जला देगा !

हिरण्यकश्यप रावण के सम, तुमको भी मरवा देगा !!

 

दिखा सको तो राह दिखाओ , उसको जो पथ में भूला !

भगत…

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Added by Hari Prakash Dubey on March 2, 2015 at 9:00pm — 16 Comments

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Added by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on March 2, 2015 at 2:30pm — 21 Comments

ग़ज़ल : गाँव कम हैं प्रधान ज्यादा हैं

बह्र : २१२२ १२१२ २२

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फ़स्ल कम है किसान ज़्यादा हैं

ये ज़मीनें मसान ज़्यादा हैं

 

टूट जाएँगे मठ पुराने सब

देश में नौजवान ज़्यादा हैं

 

हर महल की यही कहानी है

द्वार कम नाबदान ज़्यादा हैं

 

आ गई राजनीति जंगल में

जानवर कम, मचान ज़्यादा हैं

 

हाल क्या है वतन का मत पूछो

गाँव कम हैं प्रधान ज़्यादा हैं

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(मौलिक एवम् अप्रकाशित)

Added by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on March 2, 2015 at 1:00pm — 41 Comments

भूखा बलिदान....(लघुकथा)

पूरी कॉलोनी वालों की बेफ़िक्र नींद का राज़ था - रानी,  वो पालतू न होते हुए भी कॉलोनी में रात के समय भौंक भौंक कर,  किसी भी अपरिचित को नहीं घुसने देती थी.  बदले में कॉलोनी के लोग भी रानी को खाने के लिये कुछ न कुछ दे देते थे. समय के साथ रानी ने गर्भधारण भी किया, लेकिन उन दिनों में उसकी थकान के बाद भी उसे खाने को कम ही मिलता.  जब उसे प्रसव पीड़ा आरम्भ हुई, तब भी वो अकेली थी. उसने पांच बच्चों को जन्म दिया,  प्रसव के पश्चात्, रानी को बड़ी तेज़ भूख लगी, लेकिन आज उसके पास खाने को  किसी ने कुछ रखा ही…

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Added by जितेन्द्र पस्टारिया on March 2, 2015 at 11:19am — 30 Comments

भरत वो हो नहीं सकता - लक्ष्मण धामी ’मुसाफिर’

चुभन मत  याद  रखना  तुम मिली जो खार से यारो

रहे  बस  याद  फूलों  की  मिले   जो  प्यार  से  यारो

*****

नहीं शिव तो हुआ क्या फिर उपासक तो उसी के हम

गटक  लें  द्वेष  का  विष  अब चलो संसार से यारो

*****

न समझो  हक  तम्हें  तब तक  सुमारी दोस्तो में है

रखो गर  दुश्मनी  भी  तो  मिलो  अधिकार से यारो

*****

हमें जल  के  ही  मरना था जलाया नीर ने तन मन

खुशी  दो  पल   रही   केवल   बचे  अंगार  से  यारो

*****

भरत  वो  हो  नहीं  सकता  सदा …

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Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on March 2, 2015 at 11:00am — 11 Comments

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