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एक तरही ग़ज़ल - होली है हुलासों की // --सौरभ

221 1222   221 1222

चुपचाप अगर तुमसे अरमान जता दूँ तो !
कितना हूँ ज़रूरी मैं, अहसास करा दूँ तो !
 
संकेत न समझोगी.. अल्हड़ है उमर, फिर भी..
फागुन का सही मतलब चुपके से बता दूँ तो
 
ये होंठ बदन बाहें रुख़सार बसंती हैं..
मैं रंग मुहब्बत का थोड़ा सा लगा दूँ तो ..?
 
तुम आँख दिखाओ पर होली है हुलासों की
मेरा है असर तुम पर.. ये शोर मचा दूँ तो !
 
इक चोर नज़र उसकी उलझी है दुपट्टे में
उस मीन पियासी को कुछ बूँद पिला दूँ तो !
 
जब रात गयी उठ कर कुछ बोल दिखे बिखरे
बिस्तर से उठा उनके अनुवाद सुना दूँ तो !!
 
मौसम के इशारे मैं, हाँ ! खूब समझता हूँ
हर ढंग निभाऊँगा, कुछ फ़र्ज़ निभा दूँ तो..
***********
--सौरभ
(मौलिक और अप्रकाशित)

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Comment

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Comment by बृजेश नीरज on March 28, 2015 at 9:13am

बहुत सुन्दर ग़ज़ल आदरणीय! आपको हार्दिक बधाई!

Comment by Chhaya Shukla on March 28, 2015 at 9:03am

बेमिसाल ! बेमिसाल ! बेमिसाल
आदरणीय शब्द शब्द अर्थ पूर्ण
और गायन क्षमता की प्रचुरता है आपकी गजल में
इसे कई बार पढ़ी |
हार्दिक बधाई आपकी लेखनी को नमन !

Comment by Neeraj Neer on March 1, 2015 at 11:34am

वाह वाह क्या खूब... बहुत सुंदर और इसके क्या कहने इक चोर नज़र उसकी उलझी है दुपट्टे में
उस मीन पियासी को कुछ बूँद पिला दूँ तो !... बहुत खूब 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on February 28, 2015 at 7:49am

आदरणीय सौरभ भाई , क्या रूमानी ग़ज़ल कही इस बार , एक एक शे र पढ़ता गया और मेरी उम्र कम होती गई , आपने फिर मुझे पुराने दिनो मे पहुँचा दिया । आपकी कहन का तो कहूँ ही क्या , बस एक पाठशाला है मेरे लिये ॥ ढेर सारी बधाइयाँ गज़ल के लिये , होली की शुभ कामनाओं के साथ स्वीकार करें ॥

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on February 27, 2015 at 1:49pm

आदरणीय  सौरभ जी 'शृंगार'  टाइप अशुद्धि की क्षमा चाहता हूँ i सादर i

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on February 27, 2015 at 1:45pm

आ० सौरभ जी

आपकी इस परीजमाल गजल का नख से लेकर शिख तक अवलोकन टीप कर्ताओ ने किये और  उसके हुस्न की तारीफ भी की i ऐसी शृंगारिक रचना जो आसन्न होली में गुदगुदी  दे आपकी कलम से निस्सृत हुयी  i रचना सोलह शृंगार से परिपूर्ण है i  इसमें तो कोई संदेह नहीं मुझे आपकी भाव-दशा पर अभिमान होता है  i आपकी गजल हर मैंने में गजल है i जब सभी बंद उद्धरणीय  है तो निदर्शन या बानगी  क्या दूं -------- है  रंग  यहाँ  बिखरा क्या गर्द अबीरो  की  

                               कर संयम मैं मन का यह मांग सजा दूं तो ----------- सादर  i

                               

Comment by khursheed khairadi on February 27, 2015 at 9:20am

तुम आँख दिखाओ पर होली है हुलासों की
मेरा है असर तुम पर.. ये शोर मचा दूँ तो !
 
इक चोर नज़र उसकी उलझी है दुपट्टे में
उस मीन पियासी को कुछ बूँद पिला दूँ तो !
 
जब रात गयी उठ कर कुछ बोल दिखे बिखरे
बिस्तर से उठा उनके अनुवाद सुना दूँ तो !! 
 आदरणीय सौरभ सर ,बेहतरीन और शालीन -अल्हड़ ग़ज़ल पर ढेरों दाद कबूल फरमावें |मंच को आपने फागुनी रंग से रंग दिया है |ख़ूब सराबोर किया ,,,,हार्दिक बधाई स्वीकार करें ..सर |सादर अभिनन्दन |

Comment by Dr. Vijai Shanker on February 26, 2015 at 11:02pm
संकेत न समझोगी.. अल्हड़ है उमर, फिर भी..
फागुन का सही मतलब चुपके से बता दूँ तो ॥
होली का आगमन शुभ हो, रचना हेतु बधाई हो, आने वाली होली शुभ हो।
Comment by Krish mishra 'jaan' gorakhpuri on February 26, 2015 at 10:33pm

तुम आँख दिखाओ पर होली है हुलासों की
मेरा है असर तुम पर.. ये शोर मचा दूँ तो !

प्रणाम स्वीकार करें आदरणीय ! एक एक शेर सबक है हम जैसे नवागंतुको के लिए ! आप इसी प्रकार हमें अपनी कलम की रोशनी में रक्खें !

Comment by Samar kabeer on February 26, 2015 at 10:18pm

जनाब सौरभ पाँडे जी,आदाब,इन्तिहाई ख़ूबसूरत ग़ज़ल से नवाज़ा है आपने मंच को,एक एक शैर मोतियों से जड़ा है,दाद के साथ मुबारकबाद क़ुबूल फ़रमाऐं |

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