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एक तरही ग़ज़ल - मैं रंग मुहब्बत का थोड़ा सा लगा दूँ तो ( गिरिराज भंडारी )

221     1222     221      1222

 

चिलमन को ज़रा ऊपर , नज़रों से उठा दूँ तो

पर्दों की हक़ीक़त क्या , दुनिया को बता दूँ तो

 

ख़्वाबों में ख़यालों में , जीने का मज़ा क्या है

कुछ रंग हक़ीकत के , आज उसपे चढ़ा दूँ तो

 

ये उखड़ी हुई सांसे , लगतीं हैं बुलातीं सी

उन सांसों में मै अपनीं , सांसें भी मिला दूँ तो

 

नज़रों ने कही थी जो , नज़रों से कभी मेरी

वो बात सरे महफिल , मैं आज बता दूँ तो

 

राहे वफा में फैले , गर ख़ार डराते हैं

वो ख़ार हटा कर मैं , फूलों से सजा दूँ तो  

 

सौ रंग लगाया है , होली में जहाँ तू ने  

मैं रंग मुहब्बत का थोड़ा सा लगा दूँ तो.

**************************************

मौलिक एवँ अप्रकाशित

 

 

 

 

 

 

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सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on March 2, 2015 at 11:48am

बहुत बहुत आभार आपका , आदरनीय जितेन्द्र भाई , हौसला अफज़ाई के लिये ।

Comment by जितेन्द्र पस्टारिया on March 2, 2015 at 11:28am

बहुत-बहुत सुंदर गजल,आदरणीय गिरिराज जी. हर एक शेर दिल को छू जाता है, तहे दिल से बधाई स्वीकारें


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on March 2, 2015 at 11:24am

आदरनीया राजेश जी , आपकी सराहना से मन आश्वस्थ हुआ ! सराहना के लिये आपका हार्दिक आभार ।


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on March 2, 2015 at 11:19am

वाह तीसरी ये  तरही ग़ज़ल पढ़ रही हूँ ...होली की धूम मच रही है क्या कहने आपकी ग़ज़ल का भी जबाब नहीं आदरणीय गिरिराज जी 

ख़्वाबों में ख़यालों में , जीने का मज़ा क्या है

कुछ रंग हक़ीकत के , आज उसपे चढ़ा दूँ तो---क्या कहने 

नज़रों ने कही थी जो , नज़रों से कभी मेरी

वो बात सरे महफिल , मैं आज बता दूँ तो------ये धमकी है या ब्लेकमेलिंग  जी ?? :))))) उम्दा शेर 

सौ रंग लगाया है , होली में जहाँ तू ने  

मैं रंग मुहब्बत का थोड़ा सा लगा दूँ तो.---शानदार ...हाँ एक बात यदि सौ रंग के लिए आया है तो सौ रंग लगाए हैं होना चाहिए 

आपको बहुत बहुत बधाई इस सुन्दर रंगीली ग़ज़ल के लिए 

 

 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on March 2, 2015 at 10:41am

आदरणीय सर्वेश भाई , हौसला अफज़ाई का तहे दिल से शुक्रिया ॥

Comment by khursheed khairadi on March 2, 2015 at 9:17am

आदरणीय गिरिराज सर ,,,मेरी टिप्पणी में आ.बागी टाइप हुआ है जो दरअसल आदरणीय बागी साहब है ,,,आ.बागी साहब को पूरे अद्दर के साथ ..क्षमापार्थी |

Comment by सर्वेश कुमार मिश्र on March 2, 2015 at 3:11am
वाह! मन आनन्दमय हो गया...

‘’सौ रंग लगाया है, होली में जहाँ तू ने
मैं रंग मुहब्बत का थोड़ा सा लगा दूँ तो.’’

हर शे’र लाजवाब! बधाई स्वीकारें

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on March 1, 2015 at 10:55pm

आदरणीय शिज्जु भाई , हौसला अफज़ाई के लिये आपका दिली शुक्रिया ॥


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by शिज्जु "शकूर" on March 1, 2015 at 10:46pm

आदरणीय गिरिराज सर बेहद कसी हुई ग़ज़ल है गज़लियत से भरी हुई बहुत बहुत बधाई आपको


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on March 1, 2015 at 9:26pm

आदरणीया प्राची जी , बहुत दिनों बाद आपओ मंच मे देखा , बड़ी खुशी हुई ॥ गज़ल की सराहना के लिये आपका हृदय से आभारी हूँ ॥

कृपया ध्यान दे...

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