For any Query/Feedback/Suggestion related to OBO, please contact:- admin@openbooksonline.com & contact2obo@gmail.com, you may also call on 09872568228(योगराज प्रभाकर)/09431288405(गणेश जी "बागी")

All Blog Posts (19,169)

ग़ज़ल : मारो बम गोली या पत्थर कलम नहीं मिटती

बह्र : २२ २२ २२ २२ २२ २२ २

 

माना मिट जाते हैं अक्षर कलम नहीं मिटती

मारो बम गोली या पत्थर कलम नहीं मिटती

 

जितने रोड़े आते उतना ज़्यादा चलती है

लुटकर, पिटकर, दबकर, घुटकर कलम नहीं मिटती

 

इसे मिटाने की कोशिश करते करते इक दिन

मिट जाते हैं सारे ख़ंजर कलम नहीं मिटती

 

पंडित, मुल्ला और पादरी सब मिट जाते हैं

मिट जाते मज़हब के दफ़्तर कलम नहीं मिटती

 

जब से कलम हुई पैदा सबने ये देखा है

ख़ुदा मिटा करते…

Continue

Added by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on February 25, 2015 at 12:30pm — 29 Comments

ग़ज़ल - निर्मल नदीम

गिरा के अपनी ही आँखों से खून काग़ज़ पर,

तलाश करता रहा दिल सुकून काग़ज़ पर.



जला के खाक ही कर दे जहान को आशिक़,

अगर उतार दे अपना जुनून काग़ज़ पर..

ग़ज़ल का एक भी मिसरा नहीं कहा मैनें,

थिरक रहा है किसी का फुसून काग़ज़…

Continue

Added by Nirmal Nadeem on February 25, 2015 at 12:00pm — 24 Comments

फागुनी दोहे २

 

लहकी कलियाँ डाल पर ,आँगन छिटकी धूप

चौपाले रौशन हुईं ,बाल बृंद सुर भूप ॥

 

सगुन  चिरैया भोर में, देती शुभ संदेश

पीहर आवे लाडली…

Continue

Added by kalpna mishra bajpai on February 25, 2015 at 11:30am — 9 Comments

ग़ज़ल--122--122 / 122 --122 चमन की कहानी

कहूँ आपसे क्या थकन की कहानी

न समझोगे गाफ़िल बदन की कहानी

 

बनाती है ज़र्रे को रोशन सितारा

लुभाती बहुत है लगन की कहानी

 

समझ लो य’ अश्कों का सावन निरख कर

लबों से कहूँ क्या नयन की कहानी

 

जली उँगलियों से ज़रा पूछ आओ

कहेंगे फफोले हवन की कहानी

 

हर इक गम को ढाला ग़ज़ल में मुसल्सल

है झूठी अदीबों ग़बन की कहानी

 

सुनाते मिलेंगे चहकते चहकते

कफ़स में परिंदे चमन की कहानी

 

किरन दर…

Continue

Added by khursheed khairadi on February 25, 2015 at 11:00am — 8 Comments

शेरों की दुनियाँ---डा० विजय शंकर

शेरों की दुनियाँ अजीब ,

जमाना अजीब होता है,

हर शेर अज़ब होता है,

हर शेर गज़ब होता है,

शेर सवाल, शेर जवाब होता है

शेर का जवाब भी शेर होता है

शेर पर शेर , सवा सेर होता है |



हमको भी शौक चर्राया,

हम भी आ गए शेरों के बीच ,

अपने चूहे बिल्ली लेकर ,

उन्होंने वो हंगमा बरपाया

कि शेर शेर घबड़ाया , बोला ,

अरे ,ये कौन शेर के जंगल में चला आया |



शेरों की अपनी एक तहजीब होती है ,

एक अदब , एक तमीज होती है ,

क़यामत होती है , एक… Continue

Added by Dr. Vijai Shanker on February 25, 2015 at 10:55am — 24 Comments

राष्ट्रधर्म: छन्द- दोहा

राष्ट्रधर्म ही सार है, राष्ट्रधर्म ही मूल ,

लेशमात्र सन्देह भी, कर देगा सब धूल !

 

रहे राष्ट्र के प्यार में, मानव का हर कृत्य,

रोम–रोम में राष्ट्रहित, क्या अफसर क्या भृत्य !

 

राष्ट्रघात या द्रोह से, जग में प्रलय दिखाय,

राष्ट्रप्रेम वह शक्ति है, विश्वविजय हो जाय !

 

राष्ट्र इतर अस्तित्व सब, समझो है बेजान ,

राष्ट्र रहे तो सब रहे, आन बान औ शान !

 

लहू बहा दो राष्ट्रहित, और बहा दो स्वेद,

प्राण जाय गर…

Continue

Added by Hari Prakash Dubey on February 25, 2015 at 9:30am — 13 Comments

धुंध का परदा हटाओ - लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'

2122    2122    2122    212

*******************************

झील के पानी  को  फिर से बादलों ताजा करो

नीर हो  झरते  रहो तुम मत कभी ठहरा करो

***

सिर्फ गर्जन  के लिए  कब  धूप जनती है तुम्हें

प्यास  खेतों  की  बुझाओ  खेल  से  तौबा करो

***

जान का भय  किसलिए है परहितों की बात जब

धुंध  का  परदा   हटाओ   दूर   तक   देखा   करो

***

सूर्य  के  तुम  वंशजों  में  छोड़   दो  मायूसियाँ

त्याग दो  जीवन भले ही तम को मत पूजा करो

***

यूँ अँधेरों की  तिजारत …

Continue

Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on February 25, 2015 at 6:00am — 14 Comments

ऐ मौला

जीवन कठिनाईयों मे 

गुजर रहा है ऐ मौला 

रात गुजर रही है 

बगैर नींद के ऐ मौला 

बेपरवाह एक जुगनू 

खलल डाल रहा ऐ मौला 

सफर मे चला जा रहा हूँ 

मंजिल की तलाश मे ऐ मौला

कहता बहुत हूँ, चीखता बहुत हूँ 

सुनता कोई नहीं ऐ मौला 

काली रात कटेगी, सुबह तो होगी 

इंतजार मे हूँ ऐ मौला 

जख्म इतना दिया कि 

इंतहा कि हद कर दी 

जख्म के दर्द का अहसास न रहा ऐ मौला

खारा हो गया हूँ जैसे समंदर का पानी 

अब…

Continue

Added by Amod Kumar Srivastava on February 24, 2015 at 8:07pm — 14 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
ग़ज़ल

122 122 122 122



ये अकुलाहटें मेरे मन की कहूँ क्या

तड़प बेकरारी नयन की कहूँ क्या



उठे है धुआँ सा दिलो जाँ से मेरे

जली है ज़मीं भी चमन की कहूँ क्या



चला जा रहा हूँ सफ़र में मैं पैहम

नहीं इंतिहा है थकन की कहूँ क्या



तरसता रहा उम्र भर फूल को वो

ये आराइशें इस कफ़न की कहूँ क्या



मुझे लूटकर घर तलक छोडा़ उसने

वफ़ा देखिये राहजन की कहूँ क्या



निशां बह गया वक्त की मौज के साथ

अदा रह गई बांकपन की कहूँ… Continue

Added by शिज्जु "शकूर" on February 24, 2015 at 7:36pm — 14 Comments


प्रधान संपादक
कामवाली (लघुकथा)

"अरी भागवान, क्यों हमेशा कामवाली के पीछे हाथ धोकर पडी रहती हो ?"

"आजकल इसका दिमाग बहुत ख़राब हो गया है।"  

"आखिर बात क्या हुई?"  

"एक हो तो बताऊँ। बिना बताये छुट्टी मार जाती है, काम करते हुए मौत पड़ती है इसे, पर एडवांस हर महीने चाहिए मुई को"

"अरे शान्त रहो, वो सुन रही है।"     

"सुनती है तो सुने, गर्मियों के बाद उठा कर बाहर फ़ेंक दूँगी इसको।"

"मगर कामवाली के बगैर घर के इतने सारे काम कौन करेगा ?"

"क्यों ? बेटे की शादी करके नई बहू किस लिए ला रहे हैं…

Continue

Added by योगराज प्रभाकर on February 24, 2015 at 12:48pm — 20 Comments

मैं एक हिंदुस्तानी औरत हूँ - परी ऍम. 'श्लोक'

आदमी क्या खूब कोशिश करते हैं

गम मिटाने के लिए...

ले कर जाम हाथों में अपने

रोज़ कहते हैं

कि वो टूटे हैं बिखरे हैं बेहाल बेहद हैं

रोज़ कहते हैं

करता हूँ नशा सबकुछ भूल जाने के लिए

फूंकता हूँ सिगरेट हर फ़िक्र धुंए में उड़ाने के लिए

सोचती हूँ कि

कितनी तरकीब हैं आदमी के पास

अपने आपको सुकून पहुँचाने के लिए

मगर

मेरे पास अपने दर्द में असीर रहने के सिवा

कोई राह राहत की नज़र नहीं आती

मैं ये शौक भी अता नहीं फरमा सकती

हाँ! मुझे अक्सर ये… Continue

Added by Pari M Shlok on February 24, 2015 at 11:07am — 19 Comments

हमको हमीं से छुपाता कौन है -- डॉ o उषा चौधरी साहनी

सुनते आये हैं, सारी नज़ाकत 

कायनात को हम नारियों से मिली है ,

बीर बहूटी को मखमल ,

गुलाब को लाली, हमीं से मिली है ,

कायनात खुद कहीं-कहीं बेइंतहा सख्त है ,

चट्टान है, आंधी है , धूल है , तूफ़ान है,

फिर भी गुलाब हैं, तितलियाँ हैं, चाँद है,

चाँदनी है, ठंडी हवाएँ हैं , नदियों में चढ़ाव है.

ये कठोर कायनात की ही करामात है ,

हमारी मासूमियत पर रोज़ ये ग्रहण लगाता कौन है.

हमारी मासूमियत हमसे चुराता कौन है,

बचपन से हमको हरदम डराता कौन है,

ये चेहरे पे…

Continue

Added by Usha Choudhary Sawhney on February 24, 2015 at 10:45am — 18 Comments

कल और आज...(लघुकथा)

“बेटा!.. तुझे याद है न.. जब तू स्कूल में प्रथम श्रेणी  में आया था ,  मुझे कितनी ख़ुशी हुई थी . सभी लोग  यही कह रहे  थे  कि मेरा बेटा है" 

“ हाँ!..पर रात-दिन पढाई मैंने की थी, आपने जो किया था  वो आपका फर्ज था "

“ हाँ! बेटा यही समझ ले, बस मुझे इसी घर में रहने दे. अब गली-गली दरबदर फिरूंगा, तो लोग यही कहेंगे की तेरा बाप हूँ...”

    जितेन्द्र पस्टारिया

 (मौलिक व् अप्रकाशित )

 

Added by जितेन्द्र पस्टारिया on February 24, 2015 at 10:39am — 27 Comments

फागुनी दोहे

आम्र मंजरी झूमती ,मादक महके बाग

-हर्षित कोयल कूकती,बौराया सा काग ।

 

बाबा देवर बन गए, फागुन में वो बात

ललचाये हर बाल मन,…

Continue

Added by kalpna mishra bajpai on February 24, 2015 at 10:30am — 17 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
ग़ज़ल - सब रस्ते इन शहरों के बातूनी हैं ( गिरिराज भंडारी )

22   22  22  22   22  2

ये कैसी महफिल में मुझको ले लाया

हर कोई लगता है गुमसुम, थर्राया

 

सब रस्ते इन शहरों के बातूनी हैं

गाँवों की गलियों को सब ने फुसलाया

 

साहिल साहिल बात चली है लहरों में

तूफ़ाँ ने जब तोड़ी कश्ती, इतराया                                                                                                                                                               

क्या जज़्बा हाथों से बहते रहता है ?

धोते ही…

Continue

Added by गिरिराज भंडारी on February 24, 2015 at 10:07am — 22 Comments

ऊर्ध्वारोहण

एक सत्यान्वेषी ,

मुक्ति का अभिलाषी

था उर्ध्वारोही।

कर रहा था आरोहण

पर्वत की दुर्लंघ्य ऊचाईयां का।

पर्वत से उतरती नदी ने कहा :

मैदानों में तो जीवन कितना सरल , सुगम है,

यहाँ जीवन है कितना दुष्कर।

अविचलित रहकर इसपर

दिया उसने उत्तर

मैंने भीतर जाकर देखा है,

वाह्य सौंदर्य तो धोखा है।

मैदानों में जीवन सरल है,

पर राह लक्ष्य की वक्र है।

जीवन रथ मे लगे

कर्म फल के दुष्चक्र हैं।

मैं राह सीधी लेना चाहता हूँ।

इसलिए नीचे…

Continue

Added by Neeraj Neer on February 24, 2015 at 8:48am — 12 Comments

मिलते ही धूप का ठण्डा हो जाना

तुम्हारा मुझसे मिलना 

मिलते ही धूप का ठण्डा हो जाना

ये बडा ही अनौखा विज्ञान था मेरे लिये 

जिसे मैं आज तक नहीं समझा हूँ

.

काँटों से भरे रास्तों पर

तुम्हारे साथ साथ दूर तक चले जाना

तलवों में बने काँटों के निशान

एक असीम आनन्द देते थे

ये कैसा विज्ञान था पता नहीं 

.

क्या तुम्हें याद है 

जब साथ साथ की थी हमने नदी की सैर

छेद हुयी टूटी नौका में बैठकर

और लिया था डूबने का आनन्द

ये कैसे सम्भव हुआ था 

इस विज्ञान से भी…

Continue

Added by umesh katara on February 24, 2015 at 6:00am — 10 Comments

आम आदमी हूँ , रोज़ गिरता संभलता हूँ , क्या करूँ ..............

मैं रोज़ ढलता हूँ पर , निकलता हूँ , क्या करूँ

सूरज हूँ ,  मगर रोज़ जलता हूँ , क्या करूँ //

मैं मिट्टी नहीं , न हि पानी न कोई खुश्बू

मैं हवा का इक झोंखा हूँ , आँख मल्ता हूँ , क्या करूँ //

मैं बचपन भी कहाँ अब , जवानी भी नहीं हूँ मैं

बुढ़ापा हूँ मैं , इसीलिए खलता हूँ , क्या करूँ//

न कोई सफ़र हूँ मैं , न कोई पड़ाव न सराय कोई

मील का पत्थर हूँ मैं , बस टलता हूँ , क्या करूँ //

कहाँ खुद्दार हूँ मैं , अना वाला भी नहीं हूँ…

Continue

Added by ajay sharma on February 24, 2015 at 12:29am — 8 Comments

संसार की समस्त सम्भावनाओं का क्षेत्र......हरि प्रकाश दुबे

क्यों

घबराते हो

परिवर्तन से ?

परिवर्तन तो होगा  

होता रहा है, होगा बार- बार

किसी के लिए अच्छा भी हो सकता है  

किसी के लिए अवांछनीय भी हो सकता है 

पर सृष्टी का नियम है, बदल सकते हो क्या ?

पर एक बात जान लो, परिवर्तन से ही इंसान लड़ता है

आगे बढता है ,परिवर्तन से ही इंसान सड़ जाने से बचता है !!

क्यों

घबराते हो

समस्याओं से ?

समस्यायें तो आयेंगी

आती रही है, आयेंगी बार – बार

जीवन ऐसे ही चलता है…

Continue

Added by Hari Prakash Dubey on February 23, 2015 at 10:30pm — 15 Comments

ग्रहण

सुना सहसा उसने

और दिल बैठ गया

तड़प रहे अंतस में  

नया डर पैठ गया

 

तकिये पर सिर छिपा

विवश वह लेट गया

आंसुओं की परतें अनगिन

दर्द में समेट गया

 

अगले रविवार फिर  

वही मंजर आयेगा

मौन-प्रेम सिसकेगा

तडपकर मर जाएगा

 

एक कन्या बेमन से अनचाहा वर वरेगी

प्यार के शव पर ही मांग वह भरेगी

अभी उसके व्याह का…

Continue

Added by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on February 23, 2015 at 7:38pm — 24 Comments

Monthly Archives

2026

2025

2024

2023

2022

2021

2020

2019

2018

2017

2016

2015

2014

2013

2012

2011

2010

1999

1970

कृपया ध्यान दे...

आवश्यक सूचना:-

1-सभी सदस्यों से अनुरोध है कि कृपया मौलिक व अप्रकाशित रचना ही पोस्ट करें,पूर्व प्रकाशित रचनाओं का अनुमोदन नही किया जायेगा, रचना के अंत में "मौलिक व अप्रकाशित" लिखना अनिवार्य है । अधिक जानकारी हेतु नियम देखे

2-ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार यदि आपको अच्छा लगा तो अपने मित्रो और शुभचिंतको को इस परिवार से जोड़ने हेतु यहाँ क्लिक कर आमंत्रण भेजे |

3-यदि आप अपने ओ बी ओ पर विडियो, फोटो या चैट सुविधा का लाभ नहीं ले पा रहे हो तो आप अपने सिस्टम पर फ्लैश प्लयेर यहाँ क्लिक कर डाउनलोड करे और फिर रन करा दे |

4-OBO नि:शुल्क विज्ञापन योजना (अधिक जानकारी हेतु क्लिक करे)

5-"सुझाव एवं शिकायत" दर्ज करने हेतु यहाँ क्लिक करे |

6-Download OBO Android App Here

हिन्दी टाइप

New  देवनागरी (हिंदी) टाइप करने हेतु दो साधन...

साधन - 1

साधन - 2

Latest Activity

रवि भसीन 'शाहिद' commented on Jaihind Raipuri 's blog post वो समझते हैं मस्ख़रा दिल हैं
"आदरणीय Jaihind Raipuri साहिब, नमस्कार। बढ़िया ग़ज़ल हुई है, बधाई स्वीकार करें। /ये मेरा…"
yesterday
आशीष यादव added a discussion to the group धार्मिक साहित्य
Thumbnail

चल मन अब गोकुल के धाम

चल मन अब गोकुल के धाम अद्भुत मनहर बाल रूप में मिल जाएंगे श्याम कि चल मन अब……………………….कटि करधनी शीश…See More
yesterday
अखिलेश कृष्ण श्रीवास्तव replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-132 (विषय मुक्त)
"आदरणीय अशोक भाईजी धन्यवाद ... मेरा प्रयास  सफल हुआ।"
Tuesday
अखिलेश कृष्ण श्रीवास्तव replied to Admin's discussion 'ओबीओ चित्र से काव्य तक' छंदोत्सव अंक 177 in the group चित्र से काव्य तक
"वाह वाह वाह !!! बहुत दिनों बाद ऐसी लाजवाब प्रतिक्रिया पढने में आई है। कांउटर अटैक ॥ हजारों धन्यवाद…"
Tuesday
Ashok Kumar Raktale replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-132 (विषय मुक्त)
"  आदरणीय शेख शाहज़ाद उस्मानी जी सादर, सरकारी शालाओं की गलत परम्परा की ओर ध्यान आकृष्ट कराती…"
Tuesday
अखिलेश कृष्ण श्रीवास्तव replied to Admin's discussion 'ओबीओ चित्र से काव्य तक' छंदोत्सव अंक 177 in the group चित्र से काव्य तक
"सार्थक है आपका सुझाव "
Tuesday
Sheikh Shahzad Usmani replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-132 (विषय मुक्त)
"आदाब।‌ रचना पटल पर उपस्थिति और समीक्षाओं हेतु हार्दिक धन्यवाद आदरणीया प्रतिभा पाण्डेय जी। मेरी…"
Tuesday
अखिलेश कृष्ण श्रीवास्तव replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-132 (विषय मुक्त)
"हार्दिक धन्यवाद आदरणीया प्रतिभाजी ।  इसमें कुछ कमी हो सकती है लेकिन इस प्रकार के आयोजन शहरों…"
Tuesday
Ashok Kumar Raktale replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-132 (विषय मुक्त)
"आदरणीय अखिलेश कृष्ण श्रीवास्तव साहब सादर, बिना सोचे बोलने के परिणाम पर सुन्दर और संतुलित लघुकथा…"
Tuesday
Ashok Kumar Raktale replied to Admin's discussion 'ओबीओ चित्र से काव्य तक' छंदोत्सव अंक 177 in the group चित्र से काव्य तक
"अमराई में उत्सव छाया,कोयल को न्यौता भिजवाया। मौसम बदले कपड़े -लत्ते, लगे झूमने पत्ते-…"
Tuesday
Ashok Kumar Raktale replied to Admin's discussion 'ओबीओ चित्र से काव्य तक' छंदोत्सव अंक 177 in the group चित्र से काव्य तक
"ठण्ड गई तो फागुन आया। जन मानस में खुशियाँ लाया॥ आम  लगे सब हैं बौराने। पंछी गाते सुर में…"
Tuesday
pratibha pande replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-132 (विषय मुक्त)
"लघुकथा किसी विसंगति से उभरती है और अपने पीछे पाठको के पीछे एक प्रश्न छोड़ जाती है। सबकुछ खुलकर…"
Tuesday

© 2026   Created by Admin.   Powered by

Badges  |  Report an Issue  |  Terms of Service