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Welcome, ajay sharma!

Profile Information

Gender
Male
City State
lakhimpur kheri
Native Place
lakhimpur kheri
Profession
banking employee
About me
so cute when listened , real hope for pessimists

सदियों रहा गुलाम है ये आम आदमी 

होता रहा नीलाम है  ये आम आदमी 

रोता है बिलखता है जाता है  बहल फिर
 बच्चों सा ही मासूम है  ये आम आदमी 
जीने का हक़ मिला था जिसे कल ही आज वो 
मरने का सबब ढूंढ रहा आम आदमी 
इस दौर-इ-तरक्की में बदल जायेंगे सभी
लेकिन रहेगा आम ही ये आम आदमी 
ऊँची हवेलियों के चिरागों के वास्ते 
ढलता है बनके शाम यही आम आदमी 

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Ajay sharma's Blog

इक तेरे जाने के बाद...........

कोई भी लगता नहीं अपना , तेरे जाने के बाद

हो गया ऐसा भी क्या , इक तेरे जाने के बाद १

ढूँढता रहता हूँ , हर इक सूरत में

खो गया मेरा भला क्या , इक तेरे जाने के बाद २

न महफिलें कल थी , ना है दोस्त आज भी कोई

अब मगर तन्हा बहुत हूँ , इक तेरे जाने के बाद ३

बिन बुलाए ख़ामोशी , तन्हाई , बे -परवाहपन

टिक गये हैं घर में मेरे , इक तेरे जाने के बाद ४

पूँछते हैं सब दरोदिवार मेरे , पहचान मेरी

अब तलक लौटा नहीं घर , इक तेरे जाने के बाद ५

तोड़ कर सब रख दिए मैंने ,…

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Posted on August 28, 2017 at 11:46pm — 3 Comments

देख कर तुझको , निखर जाएॅगे.

देख कर तुझको , निखर जाएॅगे।

हम आइना बनके , सॅवर जाएॅगे ।.

तिनका-तिनका है मेरा, पास तेरे

तुझसे बिछडे तो , बिखर जाएॅगे ।

दिल हमारा औ तुम्हारा है , इक

घर से निकले , तो भी घर जाएॅगे।

दूरियों में ही , रहे महफूज हैं हम

पास जो आये , तो डर जाएॅगे ।

वो समन्दर था , मगर भटका नहीं

हम तो दरिया हैं , किधर जाएॅगे ।

दोस्ती भीड औ धुॅये से कर ली , अब

छोडकर गाॅव अपना शहर जाएॅगे ।

सच्चे इक प्यार के मोती के लिये

हम कई समंदर में , उतर जाएॅगे…

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Posted on January 8, 2016 at 12:05am — 6 Comments

चलते चल्ते जब भी हम रुक जाएँगे..................

चलते चल्ते जब भी हम रुक जाएँगे

तेरी बाहों में हम छुप जाएँगे ................

जब छा जाएँगे रिश्तों के निपट अंधेरे

और थकन की धूल पाँव से सर तक बोलेगी

थकते थकते जब इक दिन चुक जाएँगे

तेरी बाहों में हम छुप जाएँगे................

जब जब बोले हैं , बोले हैं खामोशी से हम

और प्रति-उत्तर भी पाए हैं , वैसे ही हमने

मिलते मिलते मौन कहीं जब थक जाएँगे

तेरी बाहों में हम छुप…

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Posted on April 1, 2015 at 11:29pm — 7 Comments

मैं अज़ीज़ सबका था , ज़रूरत पे , मगर..........

बद -गुमानी थी मुझे क़िस्मत पे , मगर

मैं अज़ीज़ सबका था , ज़रूरत पे , मगर

हज़ार बार मुझे टोंका उसने , सलाह दी ,

ख़याल आया मुझे उसका , ठोकर पे , मगर

सुबह से हो गयी शाम और अब रात भी

पैर हैं कि थकने का , नाम नहीं लेते , मगर

वो खरीददार है , कोई क़ीमत भी दे सकता है

अभी आया है कहाँ , वो मेरी चौखट पे , मगर



करो गुस्सा या कि नाराज़ हो जायो "अजय"

सितम जो भी करो , करो खुद पे , मगर

अजय कुमार…

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Posted on March 10, 2015 at 11:59pm — 9 Comments

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At 11:39pm on July 4, 2013, सानी करतारपुरी said…

आदरणीय अजय जी, हौंसला-अफजाई के लिए शुक्रगुज़ार हूँ .. आपकी दाद मेरे लिए कीमती है ..

At 11:03pm on October 15, 2012, डॉ. सूर्या बाली "सूरज" said…

अजय जी नमस्कार ! आपको मेरी ग़ज़ल के चंद शेर पसंद आए और आपकी स्नेह भरी प्रतिक्रिया मिली बहुत अच्छा लगा। आपका बहुत बहुत शुक्रिया। 

 
 
 

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"जी ! उत्तम. सादर नमस्कार. आदरणीय बागी जी. सादर."
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"आदरणीय बागी जी सादर प्रस्तुति पर आपकी उत्साहवर्धक प्रतिक्रिया हेतु आपका हृदय से आभार आदरणीय "
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