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मिलते ही धूप का ठण्डा हो जाना

तुम्हारा मुझसे मिलना 
मिलते ही धूप का ठण्डा हो जाना
ये बडा ही अनौखा विज्ञान था मेरे लिये 

जिसे मैं आज तक नहीं समझा हूँ
.
काँटों से भरे रास्तों पर
तुम्हारे साथ साथ दूर तक चले जाना
तलवों में बने काँटों के निशान
एक असीम आनन्द देते थे
ये कैसा विज्ञान था पता नहीं 
.
क्या तुम्हें याद है 
जब साथ साथ की थी हमने नदी की सैर
छेद हुयी टूटी नौका में बैठकर
और लिया था डूबने का आनन्द
ये कैसे सम्भव हुआ था 
इस विज्ञान से भी अनभिज्ञ ही हूँ मैं
.
पर तुम्हारे दूर जाने के बाद
धूप मुझे जलाती है 
काँटे घाव देते हैं
उफनती हुयी नदी मुझे डराती है
तुम्हारे साथ में और आज में
अन्तर हो गया है
बहुत अन्तर हो गया है 

उमेश कटारा
मौलिक व अप्रकाशित
 

Views: 521

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Comment by umesh katara on February 26, 2015 at 9:14am

somesh kumar जी आभार

Comment by umesh katara on February 26, 2015 at 9:14am

maharshi tripathi जी आभार

Comment by umesh katara on February 26, 2015 at 9:14am

Hari Prakash Dubey जी आभार

Comment by umesh katara on February 26, 2015 at 9:14am
Comment by जितेन्द्र पस्टारिया on February 25, 2015 at 10:52am

मिलन और विरह को बहुत सुंदर भाव दिए आपकी रचना में. बहुत-बहुत बधाई आदरणीय उमेश जी.

Comment by Hari Prakash Dubey on February 25, 2015 at 10:52am

आदरणीय उमेश कटारा जी ,सुन्दर रचना बधाई आपको !

Comment by maharshi tripathi on February 24, 2015 at 10:54pm

अच्छी भावपूर्ण रचना पर ,,बधाई स्वीकार करें आ. उमेश जी |

Comment by somesh kumar on February 24, 2015 at 9:55pm

शायद प्रेम की शक्ति और विश्वास जागृत करता है ये साथ |सीधी पर भावपूर्ण कविता |

Comment by umesh katara on February 24, 2015 at 8:24pm
Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on February 24, 2015 at 12:30pm

आ० कटारा जी

आपकी कवितायेँ निरंतर निखर रही है i आपके श्रम और संवेदना की पूंजी है यह i आपको बधाई i

कृपया ध्यान दे...

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