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धुंध का परदा हटाओ - लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'

2122    2122    2122    212
*******************************
झील के पानी  को  फिर से बादलों ताजा करो
नीर हो  झरते  रहो तुम मत कभी ठहरा करो
***
सिर्फ गर्जन  के लिए  कब  धूप जनती है तुम्हें
प्यास  खेतों  की  बुझाओ  खेल  से  तौबा करो
***
जान का भय  किसलिए है परहितों की बात जब
धुंध  का  परदा   हटाओ   दूर   तक   देखा   करो
***
सूर्य  के  तुम  वंशजों  में  छोड़   दो  मायूसियाँ
त्याग दो  जीवन भले ही तम को मत पूजा करो
***
यूँ अँधेरों की  तिजारत  करके हासिल क्या हुआ
होश  में   आओ  जरा   अब   रौशनी  बाँटा करो
**
मौलिक और अप्रकाशित

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Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on March 8, 2015 at 12:44pm

आ0 प्रबुद्ध जानो का ग़ज़ल पर उपस्थिति और उत्साहवर्धन के लिए कोटि कोटि धन्यवाद . आशा है स्नेह बनाए रखेंगे 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on February 26, 2015 at 7:42pm

सुन्दर सार्थक ग़ज़ल लिखी है बहुत बढ़िया ...हार्दिक बधाई आ० लक्ष्मण भैया 

Comment by JAWAHAR LAL SINGH on February 26, 2015 at 7:17pm

बहुत सुन्दर रचना सन्देश के साथ ...अभिनन्दन आपका धामी साहब!

Comment by khursheed khairadi on February 26, 2015 at 9:57am

यूँ अँधेरों की  तिजारत  करके हासिल क्या हुआ
होश  में   आओ  जरा   अब   रौशनी  बाँटा करो

आदरणीय लक्ष्मण सर ,उम्दा ग़ज़ल हुई है |हार्दिक बधाई स्वीकार करें साहब |मतला काफ़ी पसंद आया साहब ,,सादर अभिनन्दन |


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on February 25, 2015 at 10:37pm

आदरनीय लक्ष्मण भाई , बहुत अच्छी ग़ज़ल हुई है , हर शे र मे एक संदेश है । आपको हार्दिक बधाई ॥ आ. मिथिलेश भाई की बात से मै भी सहमत हूँ , एक बार सोच लीजियेगा ।


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on February 25, 2015 at 7:36pm
आदरणीय लक्ष्मण धामी सर जी उम्दा ग़ज़ल हुई है । शेर दर शेर दिल से दाद कुबूल फरमाये।
सभी अशआर बेहतरीन हुए है। एक निवेदन यदि आपको उचित लगे तो...

सूर्य के तुम वंशजों सब छोड़ दो मायूसियाँ।
में के स्थान पर सब। सादर।
Comment by Sushil Sarna on February 25, 2015 at 7:22pm

यूँ अँधेरों की तिजारत करके हासिल क्या हुआ
होश में आओ जरा अब रौशनी बाँटा करो .... वाह आदरणीय वाह क्या गज़ब की बात कह गए .... सलाम आपकी कलम और कल्पना को … हार्दिक बधाई कबूल फरमाएं सर।

Comment by maharshi tripathi on February 25, 2015 at 6:10pm

एक और उम्दा गजल पर आपको पुनः बधाई आ, मुसाफिर जी |

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on February 25, 2015 at 4:49pm

धामी जी

आपकी गजल  मुझे बहुत अच्छी लगी i सादर i

Comment by Pari M Shlok on February 25, 2015 at 2:44pm
यूँ अँधेरों की तिजारत करके हासिल क्या हुआ
होश में आओ जरा अब रौशनी बाँटा करो

सूर्य के तुम वंशजों में छोड़ दो मायूसियाँ
त्याग दो जीवन भले ही तम को मत पूजा करो

सुन्दर ग़ज़ल..... आदरणीय लक्षमण धामी जी.. बधाई

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