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ग़ज़ल -- हर तरफ है ज़ह्र फैला , आज शंकर कौन होगा ( गिरिराज भंडारी )

2122     2122      2122      2122  

कौन सागर को मथेगा, और सागर कौन होगा

हर तरफ है ज़ह्र फैला , आज शंकर कौन होगा

 

कौन पर्वत से लिपट के पूँछ-मुँह बांटे किसी को

सब की बरक़त चाहता हो, ऐसा विषधर कौन होगा

 

चिलमनों से झाँक के सारे नज़ारे देखते हैं

आज सड़कों पे उतरने घर से बाहर कौन होगा

 

आज ज़िंदाँ की सलाखें सोचतीं हैं देख कर ये

सर परस्ती सब को हासिल, आज अंदर कौन होगा

 

ये ज़मीं तो चाहती है सब बराबर ही रहें पर

हैं अना के जंग सारे , अब सिकंदर कौन होगा

 

सर्प कोई रोज मेरी सभ्यता को डस रहा है

सोचता हूँ आज लिपटेगा वो अजगर कौन होगा

 

धुंध , आंधी और तूफ़ाँ , उसपे हर सू है अँधेरा

पर जलाता है दिया जो शख़्स अक्सर , कौन होगा ?

 

झाँकता हूँ ख़ुद के अन्दर तो मेरा दिल बोलता है

क्यूँ ग़ज़ल कहता है भाई , तुझसे बदतर कौन होगा

************************************************

मौलिक एवँ अप्रकाशित

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सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on February 18, 2015 at 9:19pm

आदरणीया राजेश जी , हौसला अफज़ाई के लिये आपका तहे दिल से शुक्रिया ॥


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on February 18, 2015 at 9:18pm

आदरणीय सोमेश भाई , उत्साह वर्धन के लिये आपका हृदय से आभार ॥


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on February 18, 2015 at 9:16pm

आदरणीय लक्ष्मण धामी भाई , उत्साह वर्धन के लिये आपका हार्दिक आभार ॥


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on February 18, 2015 at 9:15pm

आदारणीय , परि एम श्लोक भाई , हौसला अफज़ाई का तहे दिल से शुक्रिया ॥


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on February 18, 2015 at 8:14pm

आज के परिवेश  में बहुत से गंभीर प्रश्नों को सम्मुख रखती शानदार ग़ज़ल ,सभी शेर उम्दा हैं बहुत बहुत दाद कबूलें आ० गिरिराज जी. 

Comment by somesh kumar on February 18, 2015 at 8:09pm

सागर मंथन के बहाने आपने कितनी सुन्दरता से विचार मंथन कर दिया |बधाई इस सुंदर प्रस्तुति पर आदरणीय |

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on February 18, 2015 at 12:12pm

चिलमनों से झाँक के सारे नज़ारे देखते हैं

आज सड़कों पे उतरने घर से बाहर कौन होगा

 बहुत खूब ... आद० भाई गिरिराज जी , सम्पूर्ण ग़ज़ल के लिए हार्दिक बधाई l

Comment by Pari M Shlok on February 18, 2015 at 10:09am
ये ज़मीं तो चाहती है सब बराबर ही रहें पर
हैं अना के जंग सारे , अब सिकंदर कौन होगा

आज ज़िंदाँ की सलाखें सोचतीं हैं देख कर ये
सर परस्ती सब को हासिल, आज अंदर कौन होगा

वाह गज़ब की ग़ज़ल ....बेहद मुबारक आपको

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on February 17, 2015 at 8:12pm

आदरणीय धर्मेन्द्र भाई , आपसे सराहना पाके गज़ल मुकम्मल हो गई । आपका तहे दिल से शुक्रिया ॥


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on February 17, 2015 at 8:11pm

आदरणीय जीतेन्द्र भाई , गज़ल की तरीफ कर हौसला अफजाई करने का शुक्रिया ॥

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