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ग़ज़ल : कैसे कैसे ख़ुशी ढूँढ़ते हैं

बह्र : २१२ २१२ २१२२

 

दूसरों में कमी ढूँढ़ते हैं

कैसे कैसे ख़ुशी ढूँढ़ते हैं

 

प्रेमिका उर्वशी ढूँढ़ते हैं

पर वधू जानकी ढूँढ़ते हैं

 

हर जगह गुदगुदी ढूँढ़ते हैं

घास भी मखमली ढूँढ़ते हैं

 

वोदका पीजिए आप, हम तो

दो नयन शर्बती ढूँढ़ते हैं

 

वो तो शैतान है जिसके बंदे

क़त्ल में बंदगी ढूँढ़ते हैं

आज भी हम समय की नदी में

बह गई ज़िन्दगी ढूँढ़ते हैं

----------

(मौलिक एवं अप्रकाशित)

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Comment

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Comment by Manan Kumar singh on April 5, 2015 at 12:06pm

बहुत बढ़िया 

Comment by narendrasinh chauhan on April 1, 2015 at 12:22pm

खूब सुन्दर ग़ज़ल के लिए बधाई

Comment by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on April 1, 2015 at 10:37am
शुक्रिया आ. नीलेश जी
Comment by Nilesh Shevgaonkar on March 25, 2015 at 8:16am

.

प्रेमिका उर्वशी ढूँढ़ते हैं

पर वधू जानकी ढूँढ़ते हैं

करारा ....बधाई 

Comment by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on March 16, 2015 at 10:27am
तह-द-दिल से शुक्रगुज़ार हूँ आदरणीय सौरभ जी, स्नेह बना रहे।

सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on March 15, 2015 at 9:33pm

सभी शेर पसंद आये हैं लेकिन इन दो शेरों के लिए विशेष बधाई -

वो तो शैतान है जिसके बंदे

क़त्ल में बंदगी ढूँढ़ते हैं

आज भी हम समय की नदी में

बह गई ज़िन्दगी ढूँढ़ते हैं

आदरणीय धर्मेन्द्रजी, इस ग़ज़ल के लिए दिली दाद स्वीकारिये.

Comment by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on March 2, 2015 at 12:59pm
बहुत बहुत शुक्रिया कृष्ण मिश्रा जी
Comment by Krish mishra 'jaan' gorakhpuri on February 26, 2015 at 4:47pm

प्रेमिका उर्वशी ढूँढ़ते हैं

पर वधू जानकी ढूँढ़ते हैं

अहा! क्या बात है..आपकी इन पंक्तियों ने तो मुरीद बना दिया..आपको बधाई! धर्मेद्र भाई जी!

Comment by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on February 19, 2015 at 11:06am

बहुत बहुत शुक्रिया somesh kumar  जी

Comment by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on February 19, 2015 at 11:06am

बहुत बहुत धन्यवाद  laxman dhami जी

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