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January 2018 Blog Posts

ग़ज़ल...धूल की परतें-बृजेश कुमार 'ब्रज

1222 1222 1222 1222

गुलाबों से किताबों तक समाईं धूल की परतें

जरा देखो तो अब माथे पे आईं धूल की परतें!!

ये किस आगोश ने सारे शहर को घेर के रक्खा

घना है कोहरा या फिर हैं छाईं धूल की परतें?

गया इक वक़्त वो आया न तो सन्देश ही आया

हमीं ने रिश्ते नातों पर चढ़ाईं धूल की परतें

गिला इस बात का उनसे करें भी तो करें कैसे

गमे दिल ने मेरे लब पर सजाईं धूल की परतें

बड़े ही फख्र से छोड़ी थीं अपने गाँव की गलियां

मगर 'ब्रज'…

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Added by बृजेश कुमार 'ब्रज' on January 21, 2018 at 7:00pm — 23 Comments

ताकत कलम की

हे भारत के वीर युवाओं,

कर लो नमन माँ सरस्वती को,

दिखा दो ताकत दुनियाँ को,

कितनी शक्ति है तेरे कलमों में!!

कोई बाँट ना पाये हमको,

ऐसा इतिहास लिखो युवाओं,

हर घर में वीर जन्मा है,

बस कोई उन्हें जगा दो!!

तलवार नहीं अपनी-अपनी कलम उठाओ,

देश में ऐसा क्रान्ति लाओ,

लूटेरे और भ्रष्टाचारियों को,

अपनी कलम की ताकत दिखा दो!!

कलम की ताकत को समझ लो युवाओं,

ये बिन चिंगारी के भी आग जलाती है,

देश के गद्दारों और दुश्मनों को, …

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Added by Sushil Kumar Verma on January 21, 2018 at 12:00pm — 1 Comment

कविता- बसंत


हृदय की फुलवारी में
राग-बसंती छिड़ गया
अंग-प्रत्यंग प्रफुल्लित
आनंदित हो गया
चहुँदिश दिशा में
छा गया यौवन
लग गया बाग़ों में फिर से
सरसों , जूही , केतकी का मेला
चटखने लगी कमसिन कलियाँ
उन्हें भी प्रेम निमंत्रण मिलने लगा
मतवाले भँवरों का कारवाँ चला
देखो, कामदेव का जादू फिर चला ।
मौलिक एवं अप्रकाशित ।

Added by Mohammed Arif on January 21, 2018 at 10:06am — 19 Comments

अक़्ल पर ताले (लघुकथा)

शहर की व्यस्ततम सड़क पर रुके वाहनों और उनके हॉर्न्स की आवाज़ों पर किसी धनाढ्य परिवार की बारात का डीजे बैन्ड हावी हो चुका था। लोग लाइट्स से घिरे दूल्हे के नज़दीक चल रहे डांस के मज़े ले रहे थे। दुकानों पर खड़े ग्राहक भी किसी तरह झांक-झांक कर सजे-धजे युवा बारातियों का नृत्य देखने और आँखें सेंकने की कोशिश कर रहे थे। वहीं पास की पान की दुकान पर खड़े एक बुज़ुर्ग ने नज़दीक़ खड़े परिचित युवक से पूछा - "ये कौन से गाने पर डांस कर रहे हैं , मुझे तो बोल समझ में ही नहीं आ पा रहे…
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Added by Sheikh Shahzad Usmani on January 20, 2018 at 10:35pm — 7 Comments

लघुकथा - गवाह –

 लघुकथा - गवाह –

नेताजी की हवेली में काम करने वाली चंपा की नाबालिग लड़की रूपा की नेताजी के लड़के ने ज़बरन इज्जत लूट ली। नेताजी ने साम, दाम, दंड और भेद सब हथकंडे अपना लिये, लेकिन चंपा किसी भी तरह मामले को रफ़ा दफ़ा करने को राजी नहीं हुयी।

आखिरकार नेताजी अपनी औक़ात पर आ गये। चंपा को बोल दिया,"जा जो तेरी मर्जी हो कर ले"।

चंपा भी इतनी आसानी से हार मानने वाली नहीं थी। चीख चीख कर सारी बस्ती इकट्ठा कर ली। चंपा के दो चार पुराने शुभ चिंतकों ने मशविरा दे डाला कि सब जुलूस लेकर थाने चलो…

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Added by TEJ VEER SINGH on January 20, 2018 at 8:54pm — 8 Comments

तेरे नज़दीक ही हर वक़्त ....”संतोष”

 

फ़ाइलातुन फ़ईलातुन फ़ईलातुन फ़ेलुन

तेरे नज़दीक ही हर वक़्त भटकता क्यों हूँ

तू बता फूल के जैसा मैं महकता क्यों हूँ

मैं न रातों का हूँ जुगनू न कोई तारा पर

उसकी आँखों में मगर फिर भी चमकता क्यों हूँ

इस पहेली का कोई हल तो बताओ यारो

हिज्र की रातों में आतिश सा दहकता क्यों हूँ

घर बनाया है तेरे दिल में उसी दिन से सनम

सारी दुनिया की निगाहों में खटकता क्यों हूँ

हासिदों को बड़ी तश्वीश है इसकी…

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Added by santosh khirwadkar on January 20, 2018 at 11:21am — 8 Comments

वो कहते हैं मेरी पहचान को मिटटी में मिला डाला

वो कहते हैं मेरी पहचान को मिटटी में मिला डाला

बह्र-1222-1222-1222-1222

वो कहतें हैं मेरी पहचान को मिटटी में मिला डाला।।

मैं कहता हूँ पुरानी थी नया रिश्ता बना डाला।।

न भूला कर की रिश्ते में मैं तेरा बाप हूँ बेटा।

कहाँ भूला यही तो सोंच उल्फत को भुना डाला।।

मैं कहता हूँ मेरी पहचान इक दिन आप की होगी।

वो बोले तुझ से कितने  बीज बो कर के उगा डाला ।।

मुझे अब तक यकीं होता न उल्फत की मिसालों पर।

मुहब्बत नाम है किसका उसे किसका बना…

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Added by amod shrivastav (bindouri) on January 19, 2018 at 7:29pm — 2 Comments

मुझे है भला क्या कमी जिंदगी से

बह्र- 122-122-122-122

मुझे है भला क्या कमी जिंदगी से।।

है रिश्ता मेरा तीरगी ,रौशनी से।।

मुझे बज्म इतना न पहचां रही है।

है पहचान मेरी-तेरी माशुकी से।।

कई बार गुजरे हैं तेरे शह्र से।

तेरी आशिक़ी से तेरी बेरुख़ी से।।

मुहब्बत के कुछ ऐसे क़िस्से सुने हैं।

की डर लगता है आज की आशिक़ी से।।

दिये की जरुरत किसे अब नही है?

बता किसकी कब है बनी तीरगी से??

पता मुझको उस शख्स का भी जरा…

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Added by amod shrivastav (bindouri) on January 19, 2018 at 5:24pm — 5 Comments

ग़ज़ल - आजकल

2122 2122 212



बेखुदी की जिंदगी है आजकल ।

खूब सस्ता आदमी है आजकल ।।

जी रहे मजबूरियों में लोग सब।

महफिलों में ख़ामुशी है आजकल ।।

लग रही दूकान अब इंसाफ की ।

हर तरफ़ कुछ ज़्यादती है आजकल।।

छोड़ कर तन्हा मुझे मत जाइए ।

कुछ जरूरत आपकी है आजकल ।।

अब नहीं मिलता कोई मुझसे यहां।

बर्फ रिश्तों पर जमी है…

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Added by Naveen Mani Tripathi on January 19, 2018 at 1:07pm — 5 Comments

ग़ज़ल ( निकल कर तो आओ कभी रोशनी में )

ग़ज़ल ( निकल कर तो आओ कभी रोशनी में )

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(फऊलन-फऊलन-फऊलन-फऊलन)

चलाओ न तीरे नज़र तीरगी में |

निकल कर तो आओ कभी रोशनी में |

कमी दर्दे दिल में तो अब भी नहीं है

मज़ा आ रहा है तुम्हें दिल लगी में |

मेरी ही नहीं है यह सबकी ज़ुबा पर

लुटे क़ाफ़िले सब तेरी रहबरी में |

करूँ फ़ख़्र मैं क्यूँ न क़िस्मत पे अपनी

दिवाना हुआ हूँ तुम्हारी गली में |

यूँ…

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Added by Tasdiq Ahmed Khan on January 18, 2018 at 9:59pm — 10 Comments

मकड़जाल (लघुकथा)

प्रिय शेखर,

दोस्त! तुम मेरे सब से अच्छे दोस्त रहे हो, अब तुमसे क्या छुपाऊं? मैं इन दिनों बहुत परेशान हूँ, तुम्हें तो पता है मैं क्रेडिट कार्ड इस्तेमाल करता आया हूँ| मेरी और तुम्हारी जॉब एक साथ ही लगी थी, कितने खुश थे न हम दोनों! अच्छा पैकेज पाकर ,मैं हवा में उड़ने लगा,तुमने कई बार मुझे टोका भी; पर मैं अपनी ही उड़ान भरता रहा, मैं यह भूल गया था कि प्राइवेट सेक्टर में जॉब; बरक़रार रहे जरुरी नहीं ,और ऐसा ही हुआ।सात महीनों से जॉब के लिए दर-दर भटक रहा हूँ, और दूसरी तरफ़ बैंक के क़र्ज़ तले दबता जा…

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Added by KALPANA BHATT ('रौनक़') on January 18, 2018 at 9:58pm — 8 Comments

ग़ज़ल (शिकायत भला हम करें क्या किसी से )

ग़ज़ल (शिकायत भला हम करें क्या किसी से )

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(फऊलन- फऊलन-फऊलन-फऊलन)

चुने हैं ग़मे यार अपनी ख़ुशी से |

शिकायत भला हम करें क्या किसी से |

मिले सिर्फ़ धोके ही अपनों से हम को

वफ़ा अब करेंगे किसी अजनबी से |

खिज़ाओं ख़बरदार उनकी है आमद

सदा फूल खिलते हैं जिनकी हँसी से |

मिला कर नज़र से नज़र यह बताएँ

हुआ दिल ये बर्बाद किस की कमी से |

कभी दोस्तों…

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Added by Tasdiq Ahmed Khan on January 18, 2018 at 9:33pm — 10 Comments

विरह अग्नि में दह-दह कर के

गीत 

मात्र भार १६ १६ 

बहला रहा रोज इस दिल को,  

किस्से बचपन के कह कर के.

तेरी महकी महकी यादें,

मैंने रख लीं हैं तह कर के.

 

प्रथम दृष्टि का वह सम्मोहन,

भूल नहीं अब तक मैं पाया.…

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Added by बसंत कुमार शर्मा on January 18, 2018 at 8:30pm — 2 Comments

चाँद से पूछें...

चाँद से पूछें.....

आखिर

ख़्वाब टूटने का सबब

क्या है

चलो

चाँद से पूछें

करते हैं

जो दिल की मुरादें पूरी

उन तारों का पता

चलो

चाँद से पूछें

मुहब्बत में

अश्कों का निज़ाम

किसने बनाया

चलो

चाँद से पूछें

धड़कनों के पैग़ाम

क्यूँ हुए रुसवा

चलो

चाँद से पूछें

क्यूँ पूनम का अंजाम

बना अमावस

चलो

चाँद से पूछें

पेशानी पे मुहब्बत की…

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Added by Sushil Sarna on January 18, 2018 at 1:18pm — 4 Comments

समय का फेर(लघु कथा)

कभी उनकी खूब चलती थी।कोर्ट-कचहरी सब वही थे।और सरकार तो थे ही।सचिव लोग गाहे-बेगाहे जरूरी फाइलें लेकर उनके आवास जाते,तो झिड़की मिलती।टका-सा मुँह लिए लौट आते।अपने नसीब को रोते कि कहाँ से कहाँ कलक्टर हुए,अर्दली ही रहते तो बेहतर होता।चैता के ताल पर 'रे ठीक से नाच बुरबक' तो न सुनना पड़ता। सुरती ठोंककर हाकिम को तो नहीं खिलानी पड़ती। उन्हें अपने लिए 'हाकिम,साहिब' जैसे शब्द गाली लगने लगे थे।वैसे अब हाकिम-सरकार के लोग इन लोगों को अर्दली जैसे ही समझते थे,आर्डर देते थे।

फिर समय ने करवट बदली। साहब जी…

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Added by Manan Kumar singh on January 18, 2018 at 9:45am — 3 Comments

ग़ज़ल जला गया जो गली से अभी गुजर के मुझे

1212 1122 1212 22

सिला दिया है मेरे दिल में कुछ उतर के मुझे ।

जला गया जो गली से अभी गुजर के मुझे ।।

किया हवन तो जला हाथ इस कदर अपना ।

मिले हैं दर्द पुराने सभी उभर के मुझे ।।

तमाम जुल्म सहे रोज आजमाइस में ।

चुनौतियों से मिली जिंदगी निखर के मुझे ।।

अजीब दौर है किस किस की आरजू देखूँ ।

बुला रही है क़ज़ा भी यहाँ सँवर के मुझे ।।

मिटा रहे हैं…

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Added by Naveen Mani Tripathi on January 17, 2018 at 6:26pm — 1 Comment

बहाने पर ज़माना चल रहा है-ग़ज़ल

1222 1222 122

बहाना ही बहाना चल रहा है
बहाने पर ज़माना चल रहा है

बदलना रंग है फ़ितरत जहाँ की
अटल सच पर दिवाना चल रहा है

नही गम में हँसा जाता है फिर भी
अबस इक मुस्कुराना चल रहा है

निवाला बन गया अपमान मेरा
ये कैसा आबो दाना चल रहा है

वफा मेरी मुनासिब है तो फिर क्यों
अगन सेआजमाना चल रहा है

नहीं रिश्ता है पहले-सा हमारा
मग़र मिलना-मिलाना चल रहा है

मौलिक एवं अप्रकाशित

Added by सतविन्द्र कुमार राणा on January 17, 2018 at 6:16pm — 8 Comments

जुनून--लघुकथा

बस आज की रात निकल जाए किसी तरह से, फिर सोचेंगे, यही चल रहा था उसके दिमाग में| दिन तो किसी तरह कट गया लेकिन रात तो जैसे हर अनदेखा और अनसोचा डर सामने लेकर आ खड़ी होती है और आज की रात तो जैसे अपनी पूरी भयावहता के साथ बीत रही थी| डॉक्टर की दी हुई हिदायत कि आज की रात बहुत भारी है, उसे रह रह कर डरा देती थी|

कितनी बार उसने दबे स्वर में मना भी किया था कि जिंदगी के प्रति इतने लापरवाह भी मत रहो| लेकिन राजन ने कभी सुनी थी उसकी, बस एक बड़े ठहाके में उसकी हर बात उड़ा देता| "जिंदगी उनका वरण करती है जो…

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Added by विनय कुमार on January 17, 2018 at 3:00pm — 4 Comments

ग़ज़ल -महात्मा जो हैं, वो करम देखते हैं=कालीपद 'प्रसद'

काफिया : अम   रदीफ़: देखते हैं

बह्र : १२२  १२२  १२२  १२२

महात्मा जो हैं, वो करम देखते हैं

अधम लोग उसका, जनम देखते हैं |

बहुत है दुखी कौम  गम देखते हैं

सुखी कौम गम को तो’ कम देखते हैं |

अतिथि मुल्क में जो भी’ आये यहाँ पर  

मनोहर बियाबाँ, इरम देखते है |

दिशा हीन सब नौजवान और करते क्या

वज़ीरों के’ नक़्शे कदम देखते हैं |

किया देश हित काम जनता ही’ देखे

विपक्षी तो’ केवल सितम देखते हैं…

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Added by Kalipad Prasad Mandal on January 17, 2018 at 11:30am — 2 Comments

जो शख्स मेरे चाँद सितारों की तरह है

221 1221 1221 122

बुझते हुए से आज चराग़ों की तरह है ।

जो शख्स मेरे चाँद सितारों की तरह है ।।

करता है वही कत्ल मिरे दिल का सरेआम ।

मिलता मुझे जो आदमी अपनों की तरह है ।।

रह रह वो कई बार मुझे देखते हैं अब ।

अंदाज मुहब्बत के इशारों की तरह है ।।

कुछ रोज से चेहरे की तबस्सुम पे फिदा वो ।

किसने कहा वो आज भी गैरों की तरह है ।।

यूँ न बिखर जाए कहीं टूट के…

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Added by Naveen Mani Tripathi on January 16, 2018 at 9:06pm — 2 Comments

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